सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृद्ध अवस्था २५
॥ चौपाई ॥
डबडबाय आँखन में पानी । बूढ़े तन की यही निसानी ॥
नैनन में जल भरि भरि आवै । दाँत हिलै दारुन दुख पावै ॥
गोड़े थके दरद बाई का । कफ खाँसी हिये दुख वाही का ॥
खों खों करै नींद नहिं आवै । आप जगै और लोग जगावै ॥
बेबस इन्द्री सिथल भई हैं । अब क्या जीतै सहज गई हैं ॥
पूत बहू लख नाक चढ़ावैं । बहुत पुकारै निकट न आवैं ॥
निहुरि चलै लकड़ी लै हाथा । स्वजन कुटँब नहिं दुख के साथा ॥
असी बरस लग बीते साठी१ । सहजो कहै बहक बुधि नाठी२ ॥८१॥
॥ दोहा ॥
असी बरस ऊपर लगी, बिरध अवस्था होय ।
आगे की थिरता नहीं, पिछली गइ सब खोय ॥८२॥
तीन अवस्था बीत कर, चौथी आई मन्द ।
वृद्ध अवस्था सिर चढ़ी, तहु न चेता अन्ध ॥८३॥
॥ चौपाई ॥
लागी बिरध अवस्था चौथी । सहजो आगे मौत हि मौतौ ॥
हाथ पैर सिर काँपन लागे । नैन भये बिनु जोति अभागे ॥
सर्वैन तें कछु सुनियत नाहीं । दाँत दाढ़ नहिं मुख के माहीं ॥
कंठ रुके कफ बाई घेरे । हाड़ हाड़ सब दुख में पेरे ॥
बात कहै घर बाहर हाँसा । कुटँब दियौ मिल पौरी३ बासा ॥
मन चालै सब रस कूँ तरसै । नर नारी कोइ हितू न दरसै ॥
आप आप कूँ इत उतै डोलै । बिन पौरुष कोइ मुखहुँ न बोलै ॥
जिन कारन पचिया दिन राती । बात करैं नहिं कुटँब सँगाती ॥
सुत पोते दुर्गंध घिनावैं । टहल करैं तब नाक चढ़ावैं ॥
तिन के मोह तजे जगदीसा । अब मन में कलपै धुनि सीसा ॥
चरनदास गुरु कही बिसेषी । हरि बिन यों जग जाता देखी ॥८४॥
(१) सठिया गया । (२) जाती रही । (३) द्वारे ।