सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनन्हा महा उत्तम का अङ्ग ३३
सहजो तारे सब सुखी, गहै१ चन्द और सूर ।
साधू चाहै दीनता, चहै बड़ाई क्रूर२ ॥ २ ॥
अभिमानी नाहर बड़ो, भरमत फिरत उजाड़ ।
सहजो नन्ही बाकरी, प्यार करै संसार ॥ ३ ॥
सीस कान मुख नासिका, ऊँचे ऊँचे नाँव ।
सहजो नीचे कारने, सब कोउ पूजै पाँव ॥ ४ ॥
नन्ही चींटी भवन में, जहाँ तहाँ रस लेह ।
सहजो कुञ्जर अति बड़ो, सिर में डारै खेह ॥ ५ ॥
सहजो चन्दा दूज का, दरस करै सब कोय ।
नन्हे सूँ दिन दिन बढ़ै, अधिको चाँदन होय ॥ ६ ॥
बड़ा भये आदर नहीं, सहजो आँखिन देख ।
कला सभी घट जायगो, कछू न रहसी रेख ॥ ७ ॥
सहजो नन्हा बालका, महल भप के जाय ।
नारी परदा ना करै, गोदहि गोद खेलाय ॥ ८ ॥
बड़ा न जाने पाइहै, साहेब के दरबार ।
द्वारे ही सूँ लागि है, सहजो मोटी मार ॥ ६ ॥
बारे दीवे चाँदना, बड़ा भये अँधियार३ ।
सहजो तृन हलका तिरै, डूबै पत्थर भार ॥१०॥
भली गरीबी नवनता, सकै नहीं कोइ मार ।
सहजो रुई कपास की, काटै ना तरवार ॥११॥
चरनदास सतगुरु कही, सहजो कूँ यह चाल ।
सकौ तो छोटा हूजिये, छूटै सब जंजाल ॥१२॥
साहन कूँ तो भय घना, सहजो निर्भय रंक ।
कुञ्जर के पग बेड़ियाँ, चींटी फिरै निसंक ॥१३॥
(१) ग्रहन लगता है। (२) दुष्ट। (३) दीवा या रोशनी “बढ़ा” देना मुहावरे में
चिराग़ बुझा देने को कहते हैं—इस साखी का अर्थ यह है कि नन्हा सा दीवा जब बाला
गया तो चाँदना करता है और जब “बढ़ाया” (बुझाया) गया तो अँधेरा हो जाता है।