सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 32, कुल 68 में से
संदर्भ में पढ़ें२८ सहजो बाई
अकाल मृत्यु
॥ चौपाई ॥
काल मौत जो आगे गाई। अकाल मृत्यु कहै सहजो बाई॥
सस्तर मौत मरै जो कोई। यह भी मौत अकालहि होई॥
बिगड़ै रोग पथ्य नहिं कीन्हो। यह भी मौत अकालहि चीन्हो॥
कोई भाँति जो बिष खा मरै। और जीवत पावक में जरै॥
जल में डूबि जाय कोइ कैसे। लागे प्रेत मरै कोइ ऐसे॥
साँप डसे छूटै जो काया। महलापतनी१ तें दबि जाया॥
कोऊ ठग फाँसी दे मारै। जंगल पसू तोड़ जो डारै॥
ये सब मृत्यु अकाल दिखाई। मुए सुँ योनिपिसाचर पाई॥१०१॥
॥ दोहा ॥
प्रेत योनि कँ पाय कै, दुखा भये अज्ञान।
आप दुखी दुख देत हैं, उठ गइ सब पहिचान॥१०२॥
॥ चौपाई ॥
पेट बड़ा मुख सुई समाना। भूख प्यास में फिरै दिवाना॥
भटकत फिरै ठौर नहिं पावै। लागत फिरै जूतियाँ खावै॥
बासा लहै कुचौल ठिकाना। आप कुचोल कुचोलहि बाना॥
पाप करै हरि कूँ बिसरावै। सहजो कहै सो यह गति पावै॥१०३॥
॥ दोहा ॥
रही सो आयुर्दा कटै, मृत्यु लोक के माहिं।
जब हो पूरी हो चुकेँ, बाँधे नर्कहि जाहिँ॥१०४॥
अति कुचौल वह ठौर है, महा घोर भयमान।
त्राहि त्राहि पापी करैं, सुनैं न कानों कान॥१०५॥
॥ चौपाई ॥
बहुतक घोर नरक में पड़े। बहुतक थंभन बाँधे खड़े॥
बहुतन के सिर आरे धरिये। बहुतक पापी गुरजों२ गढ़िये॥
बहुतों का सिर नीचे किया। ऊपर बाँधि पाँव जो दिया॥
(१) मकान के गिरने से। (२) गदा।