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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 68 में से

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पृष्ठ 28

२४ सहजो बाई
॥ दोहा ॥
तरुणापा फिर आइया, पाँच भूत लै संग।
जोबन मद मातो रहै, पियै बिषय को रंग ॥७६॥
॥ चौपाई ॥
तरुणापा भया सकल सरीरा। अंधा भया बिसरि हरि हीरा ॥
बिषय बासना के मद मातो। अहं आपदा के रंग रातो ॥
मूँछ मरोड़ अकड़ता डोलै। काहू तें मुख मीठ न बोलै ॥
कहै बराबर मेरे नाहीं। बुद्धिवान कोइ या जग माहीं ॥
मैं बलवन्त सबन पर भारी। द्रब्य कमाऊँ नरन अगारी ॥
महा दुखी सुख मान लियो है। मोह अमल अज्ञान पियो है ॥
भया कुटुम्बी जब सुख कैसा। सहजो बन्ध१ पड़ै कोइ जैसा ॥
सुत पुत्री उपजै मरि जावै। सोच सोच तन मन दुख पावै ॥७७॥
॥ दोहा ॥
द्रब्यहीन भटकत फिरै, ज्यों सराय को स्वान।
झिड़कि दियो जेहि घर गया, सहजो रह्यौ न मान ॥७८॥
॥ चौपाई ॥
द्रब्यहीन सब को मुख जोहै। जाति बरन देखै नहिं को है ॥
निहुरि निहुरि ज्यों बन्दर नाचै। राम तजो इन बातन राचै ॥
बेटी ब्याह जोग घर माहीं। और भूखे सब कित सूँ खाहीं ॥
कहै हवेली एक बनाऊँ। अपने कुल में इज्जत पाऊँ ॥
कलपै बहुत सीस धुनि माथा। सहजो दुखी कुटँब के साथा ॥
आवै न सतसंगति माहीं। कुटँब जाल छुटकारा नाहीं ॥
हरि की भक्ति नहीं लौ लाई। दारा सुत धन की गुमराई२ ॥
दुख धन्धा करि जन्म गँवाया। सहज सहज बूढ़ापन आया॥७६॥
वृद्ध अवस्था
॥ दोहा ॥
सहजो धौले३ आइया, झड़ने लागे दाँत।
तन गु'भल४ पड़ने लगो, सूखन लागी आँत ॥८०॥
(१) कैदखाना। (२) गुमराही, अभिमान। (३) सफेद बाल। (४) झुर्री, गुलझट।