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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 68 में से

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पृष्ठ 36

काम क्रोध मोह लोभ तन, ले सुमिरै हरि नाम ।
मुक्ति न पावै सहजिया, ना रीझैंगे राम ॥२७॥
कामी मति भिष्टल¹ सदा, चलै चाल बिपरीत ।
सील नहीं सहजो कहै, नैनन माहिं अनीत ॥२८॥
सदा रहै चित भंग ही, हिरदे थिरता नाहिं ।
राम नाम के फल जिते, काम लहर बहि जाहिं ॥२६॥
सहजो क्रोधी अति बुरो, उलटी समझै बात ।
सबही सूँ ऐंठो रहै, करै बचन की घात ॥३०॥
कूकर ज्यों भूसत फिरै, तामस मिलवाँ बोल ।
घर बाहर दुख रूप है, बुधि रहै डाँवाडोल ॥३१॥
मन मैला तन छीन है, हरि सूँ लगे न नेह ।
दुखी रहै सहजो कहै, मोह बसै जा देह ॥३२॥
मोह मिरग काया बसै, कैसे उबरै खेत ।
जो बोवै सोई चरै, लगै न हरि सूँ हेत ॥३३॥
नीच लोभ जा घट बसै, झूठ कपट सूँ काम ।
बौरायो चहुँ दिसि फिरै, सहजो कारन दाम ॥३४॥
द्रव्य हेत हरि कूँ भजै, धन ही की परतीत ।
स्वारथ ले सब सूँ मिलै, अन्तर की नहिं प्रीत ॥३५॥
अभिमानी मुख धूर है, चहै बड़ाई आप ।
डिंभ लिये फूलो फिरै, करतो डरै न पाप ॥३६॥
प्रभुताई कूँ चहत है, प्रभु को चहै न कोइ ।
अभिमानी घट नीच है, सहजो ऊँच न होय ॥३७॥
नन्हा महा उत्तम का अंग
॥ दोहा ॥
धन छोटापन सुख महा, धिरग बड़ाई ख्वार² ।
सहजो नन्हा हूजिये, गुरु के बचन सम्हार ॥ १ ॥
(१) भ्रष्ट, गन्दी । (२) खराब ।