सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्त बैराग जगत मिथ्या का अंग ३५
कबहुँ हकधक हो रहै, उठै प्रेम हित गाय।
सहजो आँख मूँदी रहै, कबहुँ सुधि हो जाय॥ ६॥
मन में तो आनँद रहै, तन बौरा सब अंग।
ना काहू के संग है, सहजो ना कोई संग॥१०॥
प्रेम लटक दुर्लभ महा, पावै गुरु के ध्यान।
अजपा सुमिरन कहत हूँ, उपजै केवल ज्ञान॥११॥
अजपा गायत्री का अंग
ऐसा सुमिरन कीजिये, सहज रहै लौ लाय।।
बिनु जिभ्या बिनु तालुवै, अन्तर सुरत लगाय॥ १॥
हंसा सोहं तार कर, सुरति मकरिया पोय।
उतर उतर फिरि फिरि चढ़ै, सहजो सुमिरन होय॥ २॥
बरत१ बाँध कर धरन में, कला गगन में खाय।
अ्रर्ध उध नट ज्यों फिरै, सहजो राम रिझाय॥ ३॥
लगै सुन्न में टकटकी, आसन पदम लगाय।
नाभि नासिका माहिं करि, सहजो रहै समाय॥ ४॥
सहज स्वाँस तीरथ बहै, सहजो जो कोई न्हाय।
पाप पुन्न दोनों छुटैं, हरि पद पहुँचे जाय॥ ५॥
हक्कारे२ उठि नाम सूँ, सक्कारे होय लीन।
सहजो अजपा जाप यह, चरनदास कहि दीन॥ ६॥
सब घट अजपा जाप है, हंसा सोहं पुर्ष।
सुरत हिये ठहराय के, सहजो या बिधि निखै॥ ७॥
सब घट ब्यापक राम है, देही नाना भेष।
राव रंक चंडाल घर, सहजो दीपक एक॥ ८॥
सत्त बैराग जगत मिथ्या का अंग
॥ दोहा॥
आतम में जागत नहीं, सपने सोवत लोग।
सहजो सपने होत हैं, रोग भोग और जोग॥ १॥
(१) रस्सी। (२) पुकारै।