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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 31

काल मृत्यु २७
॥ चौपाई ॥
कोई कहै भज रामहि रामा । सहजो कहै कौन अब कामा ॥
आगू सूँ हरि सुमरे नाहीं । पचि पचि मुआ कुटँब के माहीं ॥
हिरदे रखता राम सँगातो । तौ रच्छा अब सब बनि आतो ॥
आगू सूँ अभ्यास जो रहता । तौ अब मुखसूँ हरि हरि कहता ॥
तन की पीड़ा सब मिटि जाती । जम की तो पै कहा बसाती ॥
राम राम मरते तू कहता । जो आगू सूँ कहता रहता ॥
तैं मन दिया कुटँब के साथा । हो बैठा घर बाहर नाथा ॥
अपना किया भुगत रे जोया । जो गुरु पूरा ढूँढ़ न कीया ॥६३॥
॥ दोहा ॥
पकरि बाँधि जम लै चले, धर्मराय के पास ।
कई बार आगे गये, छप्पन जहाँ तिरास ॥६४॥
कई भाँति के दंड हैं, सहजो नाना त्रास ।
नरक कुण्ड दुख भुगत करि, फिर चौरासी बास ॥६५॥
काल मृत्यु
॥ दोहा ॥
काल मृत्यु अब कहत हूँ, चौंक उठै अज्ञान ।
समझैगा कोइ साध जन, कै कोइ बिद्यावान ॥६६॥
जगत बिषय की वासना, हरि सूँ नाहीं हेत ।
काल मृत्यु कोई मरै, निस्चै होय परेत ॥६७॥
चार पहर का तेल भर, राखै दीवा बाल ।
तेल निबड़ बाती बुझै, सहजो पूरा काल ॥६८॥
कै मानुष कै वायु सूँ, कै पतंग करि देय ।
तेल रहै लोई बुझै, अकाल मृत्यु यों होय¹ ॥६६॥
॥ चौपाई ॥
बूढ़ा बाला कै ह तरुणा । काल मृत्यु इक कालहि मरना ॥१००॥
(१) कहि तेय।