सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 33, कुल 68 में से
संदर्भ में पढ़ेंअकाल मृत्यु २६
तले कड़ाहै तेल जलाया । भर भर करछे छौंक लगाया ॥
बहुतन पकरि कुण्ड में डारे । जिन सिर कागा चोंचन मारे ॥
कहँ लग कहूँ त्रास बहुतेरे । छप्पन त्रास कहे गुरु मेरे ॥
जम पेरत हैं सकल मँझारी । सबही भुगतैं नर कहा नारी ॥
फिरि फिरि मूँड़ो जाय कुटावैं । सहजो कहै नहीं सकुचावैं ॥१०६॥
॥ दोहा ॥
जम का लिंग सरीर है, पापी लिंग सरीर ।
जैसे कूँ तैसे गहै, वैसी वा कूँ पीर ॥१०७॥
त्रास दहन जम के कहे, सुन भजियो नर नारि ।
अब चौरासी कहत हूँ, भिन्न भिन्न बिस्तार ॥१०८॥
॥ चौपाई ॥
नौलख जल के जीव बताये । बहुत जन्म इन में भुगताये ॥
पंछी जाति कही दस लाखा । आगू सूँ चलि आई साखा ॥
ग्यारह लख कृमकीट लखाऊँ । जिमीं माहिं जो चलत दिखाऊँ ॥
बीस लाख थावर बिस्तारा । भरमत भरमत ही पचि हारा ॥
तीस लाख पसु जोनि सुनाया । घनी बार सो पहिरी काया ॥
चारहु लाख मनुख्खा देही । लख चौरासी यह सुनि लेही ॥
इक इक बार सबै तुम भये । कहिये कहा बहुत दुख सहे ॥
दुख खे खे करि यह तन पायौ । सहजो हरि गुरु बिना गँवायौ ॥
चरनदास गुरु पूरे पाये । चौरासी जम दंड छुटाये ॥१०९॥
नाम का अंग
॥ दोहा ॥
लख चौरासी यह कही, फेर फेर भुगतन्त ।
जन्म मरन छूटै नहीं, बिना सरन भगवन्त ॥ १ ॥
जज्ञ दान तीरथ करै, पूजा भाँति अनेक ।
मुक्ति न पावै सहजिया, बिना भक्त हरि एक ॥ २ ॥