सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 68 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 38

३४ सहजो बाई
ऊँचे उज्जल भाग सूँ, आय मिले गुरुदेव ।
प्रेम दिया नन्हा किया, पूरन पायो भेव ॥१४॥
सहजो पूरन भाग सूँ, पाय लिये सुखदान ।
नख सिख आई दीनता, भजे बड़ाई मान ॥१५॥
सहजो पूरन भाग सूँ, पाय लिये सुखदैन ।
गये कुलच्छन देह सूँ, सुलच्छन पायो चैन ॥१६॥
औगुन थे सो सब गये, राज करैं उनतीस१।
प्रेम मिला प्रीतम मिला, सहजो वारा सीस ॥१७॥
प्रेम का अङ्ग
चरनदास सतगुरु दियो, प्रेम पियाला ज्ञान ।
सहजो मतवारे भये, तुरिया तत गलतान ॥ १ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, मन भयो चकनाचूर ।
छके रहैं घूमत रहैं, सहजो देख हजूर ॥ २ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, प्रीतम के रँग माहिं ।
सहजो सुधि बुधि सब गई, तन की सीधी नाहिं ॥ ३ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, पलटि गयो सब रूप ।
सहजो दृष्टि न आवई, कहा रंक कहा भूप ॥ ४ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, कहैं बहकते बैन ।
सहजो मुख हाँसो छुटै, कबहू टपकै नैन ॥ ५ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, जाति बरन गइ छूट ।
सहजो जग बौरा कहै, लोग गये सब फूट ॥ ६ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, नेम धरम गयो खोय ।
सहजो नर नारी हँसैं, वा मन आनँद होय ॥ ७ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, सहजो डिगमिग देह२ ।
पाँव पड़ै कितकें किती, हरि सम्हाल जब लेह ॥ ८ ॥
(१) मन और ३ गुण और २५ प्रकृतियाँ । (२) शरीर ।