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सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

अकाल मृत्यु २६
तले कड़ाहै तेल जलाया । भर भर करछे छौंक लगाया ॥
बहुतन पकरि कुण्ड में डारे । जिन सिर कागा चोंचन मारे ॥
कहँ लग कहूँ त्रास बहुतेरे । छप्पन त्रास कहे गुरु मेरे ॥
जम पेरत हैं सकल मँझारी । सबही भुगतैं नर कहा नारी ॥
फिरि फिरि मूँड़ो जाय कुटावैं । सहजो कहै नहीं सकुचावैं ॥१०६॥
॥ दोहा ॥
जम का लिंग सरीर है, पापी लिंग सरीर ।
जैसे कूँ तैसे गहै, वैसी वा कूँ पीर ॥१०७॥
त्रास दहन जम के कहे, सुन भजियो नर नारि ।
अब चौरासी कहत हूँ, भिन्न भिन्न बिस्तार ॥१०८॥
॥ चौपाई ॥
नौलख जल के जीव बताये । बहुत जन्म इन में भुगताये ॥
पंछी जाति कही दस लाखा । आगू सूँ चलि आई साखा ॥
ग्यारह लख कृमकीट लखाऊँ । जिमीं माहिं जो चलत दिखाऊँ ॥
बीस लाख थावर बिस्तारा । भरमत भरमत ही पचि हारा ॥
तीस लाख पसु जोनि सुनाया । घनी बार सो पहिरी काया ॥
चारहु लाख मनुख्खा देही । लख चौरासी यह सुनि लेही ॥
इक इक बार सबै तुम भये । कहिये कहा बहुत दुख सहे ॥
दुख खे खे करि यह तन पायौ । सहजो हरि गुरु बिना गँवायौ ॥
चरनदास गुरु पूरे पाये । चौरासी जम दंड छुटाये ॥१०९॥
नाम का अंग
॥ दोहा ॥
लख चौरासी यह कही, फेर फेर भुगतन्त ।
जन्म मरन छूटै नहीं, बिना सरन भगवन्त ॥ १ ॥
जज्ञ दान तीरथ करै, पूजा भाँति अनेक ।
मुक्ति न पावै सहजिया, बिना भक्त हरि एक ॥ २ ॥

ौ भी अधिको नाम । १४॥Wait, let's look at”ठो: Wait, is that a quotation mark? Yes, ”or^? It looks like ”. Wait, let's look at the danda before 14: पर्बत ”ठो तप करै, तौ भी अधिको नाम । १४॥- note there is a single danda।before१४॥! Yes, in line 18, it's नाम । १४॥(single danda, then space, then १४॥). Let's check line 10:भगवान ॥ ७ ॥Line 12:खोय ॥ ८ ॥Line 14:भूप ॥ ६ ॥Line 16:मँझधार ॥१०॥(no space around १०) Line 18:तोर ॥११॥Line 20:अन्ध ॥१२॥Line 22:समान ॥१३॥Line 24:नाम । १४॥`

Wait, let's count the lines carefully:
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३० on the left, सहजो बाई in center.

Let's check footnotes at the bottom:
Divider line
`(१) आयु। (२) बहाउ। (३) घूस, रिश्वत—यहाँ मतलब न्योछावर से

नाम का अंग ३१
चरनदास हरि नाम को, महिमा कही अपार।
सो सहजो हिरदे धरी, अचल धारना धार ॥१५॥
सहजो सुमिरन कीजिये, हिरदे माहिं दुराय¹।
होठ होठ सूं ना हिलै, सकै नहीं कोइ पाय ॥१६॥
राम नाम यों लीजिये, जानै सुमिरनहार।
सहजो कै कर्तार ही, जानै ना संसार ॥१७॥
बैठे लेटे चालते, खान पान ब्यौहार।
जहाँ तहाँ सुमिरन करै, सहजो हिये निहार ॥१८॥
जागत में सुमिरन करै, सोवत में लौ लाय।
सहजो एकरस ही रहै, तार टूटि नहिं जाय ॥१९॥
आठ पहर सुमिरन करै, बिसरै ना छिन एक।
अष्टादस और चार में, सहजो यही बिसेष ॥२०॥
सहजो सुमिरन सब करैं, सुमिरन माहिं बिबेक।
सुमिरन कोई जानि है, कोटों मद्धे एक ॥२१॥
जन्म मरन बन्धन कटै, टूटै जम की फाँस।
राम नाम ले सहजिया, होय नहीं जग हाँस ॥२२॥
चौरासी के दुख छुटैं, छप्पन नर्क तिरास।
राम नाम ले सहजिया, जम पुर मिलै न बास ॥२३॥
गर्भ बास संकट मिटै, जठर अगिन की आँच।
राम नाम ले सहजिया, मुख सूं बोलो साँच ॥२४॥
सील छिमा संतोष गहि, पाँचो इन्द्री जीत।
राम नाम ले सहजिया, मुक्ति होन की रीत ॥२५॥
काम क्रोध लोभ मोह मद, तजि भज हरि को नाम।
निश्चै सहजो मुक्ति ह्वै, लहै अमरपुर धाम ॥२६॥
(१) छिपाकर, गुप्त।
५

काम क्रोध मोह लोभ तन, ले सुमिरै हरि नाम ।
मुक्ति न पावै सहजिया, ना रीझैंगे राम ॥२७॥
कामी मति भिष्टल¹ सदा, चलै चाल बिपरीत ।
सील नहीं सहजो कहै, नैनन माहिं अनीत ॥२८॥
सदा रहै चित भंग ही, हिरदे थिरता नाहिं ।
राम नाम के फल जिते, काम लहर बहि जाहिं ॥२६॥
सहजो क्रोधी अति बुरो, उलटी समझै बात ।
सबही सूँ ऐंठो रहै, करै बचन की घात ॥३०॥
कूकर ज्यों भूसत फिरै, तामस मिलवाँ बोल ।
घर बाहर दुख रूप है, बुधि रहै डाँवाडोल ॥३१॥
मन मैला तन छीन है, हरि सूँ लगे न नेह ।
दुखी रहै सहजो कहै, मोह बसै जा देह ॥३२॥
मोह मिरग काया बसै, कैसे उबरै खेत ।
जो बोवै सोई चरै, लगै न हरि सूँ हेत ॥३३॥
नीच लोभ जा घट बसै, झूठ कपट सूँ काम ।
बौरायो चहुँ दिसि फिरै, सहजो कारन दाम ॥३४॥
द्रव्य हेत हरि कूँ भजै, धन ही की परतीत ।
स्वारथ ले सब सूँ मिलै, अन्तर की नहिं प्रीत ॥३५॥
अभिमानी मुख धूर है, चहै बड़ाई आप ।
डिंभ लिये फूलो फिरै, करतो डरै न पाप ॥३६॥
प्रभुताई कूँ चहत है, प्रभु को चहै न कोइ ।
अभिमानी घट नीच है, सहजो ऊँच न होय ॥३७॥
नन्हा महा उत्तम का अंग
॥ दोहा ॥
धन छोटापन सुख महा, धिरग बड़ाई ख्वार² ।
सहजो नन्हा हूजिये, गुरु के बचन सम्हार ॥ १ ॥
(१) भ्रष्ट, गन्दी । (२) खराब ।

नन्हा महा उत्तम का अङ्ग ३३
सहजो तारे सब सुखी, गहै१ चन्द और सूर ।
साधू चाहै दीनता, चहै बड़ाई क्रूर२ ॥ २ ॥
अभिमानी नाहर बड़ो, भरमत फिरत उजाड़ ।
सहजो नन्ही बाकरी, प्यार करै संसार ॥ ३ ॥
सीस कान मुख नासिका, ऊँचे ऊँचे नाँव ।
सहजो नीचे कारने, सब कोउ पूजै पाँव ॥ ४ ॥
नन्ही चींटी भवन में, जहाँ तहाँ रस लेह ।
सहजो कुञ्जर अति बड़ो, सिर में डारै खेह ॥ ५ ॥
सहजो चन्दा दूज का, दरस करै सब कोय ।
नन्हे सूँ दिन दिन बढ़ै, अधिको चाँदन होय ॥ ६ ॥
बड़ा भये आदर नहीं, सहजो आँखिन देख ।
कला सभी घट जायगो, कछू न रहसी रेख ॥ ७ ॥
सहजो नन्हा बालका, महल भप के जाय ।
नारी परदा ना करै, गोदहि गोद खेलाय ॥ ८ ॥
बड़ा न जाने पाइहै, साहेब के दरबार ।
द्वारे ही सूँ लागि है, सहजो मोटी मार ॥ ६ ॥
बारे दीवे चाँदना, बड़ा भये अँधियार३ ।
सहजो तृन हलका तिरै, डूबै पत्थर भार ॥१०॥
भली गरीबी नवनता, सकै नहीं कोइ मार ।
सहजो रुई कपास की, काटै ना तरवार ॥११॥
चरनदास सतगुरु कही, सहजो कूँ यह चाल ।
सकौ तो छोटा हूजिये, छूटै सब जंजाल ॥१२॥
साहन कूँ तो भय घना, सहजो निर्भय रंक ।
कुञ्जर के पग बेड़ियाँ, चींटी फिरै निसंक ॥१३॥


(१) ग्रहन लगता है। (२) दुष्ट। (३) दीवा या रोशनी “बढ़ा” देना मुहावरे में
चिराग़ बुझा देने को कहते हैं—इस साखी का अर्थ यह है कि नन्हा सा दीवा जब बाला
गया तो चाँदना करता है और जब “बढ़ाया” (बुझाया) गया तो अँधेरा हो जाता है।

३४ सहजो बाई
ऊँचे उज्जल भाग सूँ, आय मिले गुरुदेव ।
प्रेम दिया नन्हा किया, पूरन पायो भेव ॥१४॥
सहजो पूरन भाग सूँ, पाय लिये सुखदान ।
नख सिख आई दीनता, भजे बड़ाई मान ॥१५॥
सहजो पूरन भाग सूँ, पाय लिये सुखदैन ।
गये कुलच्छन देह सूँ, सुलच्छन पायो चैन ॥१६॥
औगुन थे सो सब गये, राज करैं उनतीस१।
प्रेम मिला प्रीतम मिला, सहजो वारा सीस ॥१७॥
प्रेम का अङ्ग
चरनदास सतगुरु दियो, प्रेम पियाला ज्ञान ।
सहजो मतवारे भये, तुरिया तत गलतान ॥ १ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, मन भयो चकनाचूर ।
छके रहैं घूमत रहैं, सहजो देख हजूर ॥ २ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, प्रीतम के रँग माहिं ।
सहजो सुधि बुधि सब गई, तन की सीधी नाहिं ॥ ३ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, पलटि गयो सब रूप ।
सहजो दृष्टि न आवई, कहा रंक कहा भूप ॥ ४ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, कहैं बहकते बैन ।
सहजो मुख हाँसो छुटै, कबहू टपकै नैन ॥ ५ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, जाति बरन गइ छूट ।
सहजो जग बौरा कहै, लोग गये सब फूट ॥ ६ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, नेम धरम गयो खोय ।
सहजो नर नारी हँसैं, वा मन आनँद होय ॥ ७ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, सहजो डिगमिग देह२ ।
पाँव पड़ै कितकें किती, हरि सम्हाल जब लेह ॥ ८ ॥
(१) मन और ३ गुण और २५ प्रकृतियाँ । (२) शरीर ।

द्वितीय भाग: रागबद्ध पद, सहज-समाधि एवं सहज प्रकाश उपसंहार

सत्त बैराग जगत मिथ्या का अंग ३५
कबहुँ हकधक हो रहै, उठै प्रेम हित गाय।
सहजो आँख मूँदी रहै, कबहुँ सुधि हो जाय॥ ६॥
मन में तो आनँद रहै, तन बौरा सब अंग।
ना काहू के संग है, सहजो ना कोई संग॥१०॥
प्रेम लटक दुर्लभ महा, पावै गुरु के ध्यान।
अजपा सुमिरन कहत हूँ, उपजै केवल ज्ञान॥११॥
अजपा गायत्री का अंग
ऐसा सुमिरन कीजिये, सहज रहै लौ लाय।।
बिनु जिभ्या बिनु तालुवै, अन्तर सुरत लगाय॥ १॥
हंसा सोहं तार कर, सुरति मकरिया पोय।
उतर उतर फिरि फिरि चढ़ै, सहजो सुमिरन होय॥ २॥
बरत१ बाँध कर धरन में, कला गगन में खाय।
अ्रर्ध उध नट ज्यों फिरै, सहजो राम रिझाय॥ ३॥
लगै सुन्न में टकटकी, आसन पदम लगाय।
नाभि नासिका माहिं करि, सहजो रहै समाय॥ ४॥
सहज स्वाँस तीरथ बहै, सहजो जो कोई न्हाय।
पाप पुन्न दोनों छुटैं, हरि पद पहुँचे जाय॥ ५॥
हक्कारे२ उठि नाम सूँ, सक्कारे होय लीन।
सहजो अजपा जाप यह, चरनदास कहि दीन॥ ६॥
सब घट अजपा जाप है, हंसा सोहं पुर्ष।
सुरत हिये ठहराय के, सहजो या बिधि निखै॥ ७॥
सब घट ब्यापक राम है, देही नाना भेष।
राव रंक चंडाल घर, सहजो दीपक एक॥ ८॥
सत्त बैराग जगत मिथ्या का अंग
॥ दोहा॥
आतम में जागत नहीं, सपने सोवत लोग।
सहजो सपने होत हैं, रोग भोग और जोग॥ १॥
(१) रस्सी। (२) पुकारै।

३६ सहजो बाई
कोटि बरस इक छिन लगे, ज्ञान दृष्टि जो होय ।
बिसरि जगत औरै बनै, सहजो सुपने सोय ॥२॥
ऐसे ही सब स्वप्न है, स्वर्ग मिर्तु पाताल ।
तीन लोक छल रूप है, सहजो इन्दरजाल ॥३॥
अज्ञानी जानत नहीं, लिप्त भया करि भोग ।
ज्ञानी तौ दृष्टा भये, सहजो खुसी न सोग ॥४॥
मन माहीं बैराग है, ब्रह्म माहिं गलतान ।
सहजो जगत अनित्य है, आतम कूँ नित जान ॥५॥
सहजो सुपने एक पल, बीतै बरस पचास ।
आँख खुलै जब झूठ है, ऐसे ही घर बास ॥६॥
मृग तृस्ना जल साँच है, जब लग निकट न जाय ।
सहजो तब लग जग बन्यौ, सतगुरु दृष्टि न पाय ॥७॥
जैसे बालक जल बिषे, देखि देखि डरपाय ।
समझ भई जब भर्म था, सहजो रहे खिसाय ॥८॥
ज्ञानी को जग झूठ है, अज्ञानी कूँ साँच ।
कोटि लाल कागद लिखे, सहजो बैठा बाँच ॥६॥
जगत तरैयाँ भोर की, सहजो ठहरत नाहिं ।
जैसे मोती ओस की, पानी अँजुली माहिं ॥१०॥
धूवाँ कौ सो गढ़ बन्यो, मन में राज सँजोय ।
भाँईं माई सहजिया, कबहूँ साँच न होय ॥११॥
ऐसे ही जग झूठ है, आतम कूँ नित जान ।
सहजो काल न खा सकै, ऐसो रूप पिछान ॥१२॥
सच्चिदानंद का अंग
॥ दोहा ॥
नया पुराना होय ना, घुन नहिं लागै जासु ।
सहजो मारा ना मरै, भय नहिं ब्यापै तासु । १ ॥

सच्चिदानंद का अंग ३७
किरै१ घटै छीजै नहीं, ताहि न भिजवै नीर।
ना काहू के आसरे, ना काहू के सोर ॥ २ ॥
रूप बरन वा के नहीं, सहजो रंग न देह।
मीत इष्ट वा के नहीं, जाति पाँति नहिं गेह ॥ ३ ॥
सहजो उपजै ना मरै, सदबासी नहिं होय।
रात दिवस ता में नहीं, सीत ऊस्न नहिं सोय ॥ ४ ॥
आग जलाय सकै नहीं, सस्तर सकै न काटि।
धूप सुखाय सकै नहीं, पवन सकै नहिं आटि२ ॥ ५ ॥
मात पिता वा के नहीं, नहीं कुटुंब को साज।
सहजो वाहि न रंकता, ना काहू को राज ॥ ६ ॥
आदि अन्त ता के नहीं, मध्य नहीं तेहि माहिं।
वार पार नहिं सहजिया, लघू दीर्घ भी नाहिं ॥ ७ ॥
परलय में आवै नहीं, उत्पति होय न फेर।
ब्रह्म अनादी सहजिया, घने हिराने हेर ॥ ८ ॥
जाके किरिया करम ना, षट दर्सन को भेस।
गुन औगुन ना सहजिया, ऐसो पुरुष अलेस ॥ ६ ॥
रूप नाम गुन सूँ रहित, पाँच तत्त सूँ दूर।
चरनदास गुरु ने कही, सहजो छिपा हजूर ॥१०॥
आपा खोजे पाइये, और जतन नहिं कोय।
नीर छोर निर्ताय के, सहजो सुरति समोय ॥११॥
नित्य अनित्य सांख्य मत का अंग
भिन्न भिन्न दोनों करै, वही सांख्य मति भेद।
जोवन और बिदेह सूँ, मुक्ति पाय तजि खेद ॥ १ ॥
जाग्रत और सुषोपती, स्वप्न अवस्था तीन।
काया ही सूँ होत है, घटै बढ़ै ह्वै छीन ॥ २ ॥
(१) कीड़ा लगे। (२) उड़ाना, हटाना।

" ?
It is: त with u-matra: "तु" !
Then "चा"!
IT IS "तुचा", NOT "त्वचा"!
Look closely at line 5:
"नासा तुचा न पाय ॥ ४ ॥"
Yes! It is clearly "तुचा" (त + ु + चा)!

Line :
"अनुभव ही सूँ जानिये, चित्त बुधि थकि थकि जाहिं ।"
Wait, is it "सूँ" with chandrabindu?
Yes, "सूँ"!
"चित बुधि" or "चित्त बुधि"?
Look at:
च with short-i: चि
Then: त (single त, not double त्त)!
Wait, look at "तत्त" in line 3: "तत्त" has the double-t horizontal line.
In line 6: "चित" has just a single त!
So it is "चित बुधि"!
"थकि थकि जाहिं ।" (notice dot on जाहिं).

Line :
"तीन भाँति हंकार की, सो भी पावै नाहिं ॥ ५ ॥"
Wait, "भाँति" has chandrabindu.
"हंकार" has anusvara (or chandrabindu? Just dot: हंकार).
"की," (comma).
"सो भी पावै नाहिं ॥ ५ ॥"

Line :
"जाके रस नहिं रूप नहि

निर्गुन सगुन संशय निवारन भक्ति का अंग ३६
ता के रूप अनन्त हैं, जा के नाम अनेक ।
ता के कौतुक बहुत हैं, सहजो नाना भेष ॥ ८ ॥
गीता में श्रीकृश्नँ ने, बचन कहे सब खोल ।
सब जीवन में मैं बसूँ, कै चर कहा अडोल ॥ ६ ॥
मैं अखंड व्यापक सकल, सहज रहा भर पूर ।
ज्ञानो पावै निकट हीं, मूरख जानै दूर ॥१०॥
जोगी पावै जोग सूँ, ज्ञानी लहै बिचार ।
सहजो पावै भक्ति सूँ, जा के प्रेम अधार ॥११॥
धन्य जसोदा नन्द धन, धन बृजमंडल देस ।
आदि निरंजन सहजिया, भयो ग्वाल के भेष ॥१२॥
॥ चौपाई ॥
नेत नेत कहि बेद पुकारै । सो अधरन पर मुरली धारै ॥
जाकूँ ब्रह्मादिक मुनि ध्यावै । ताहि पूत कहि नन्द बुलावै ॥
सिव सनकादिक अन्त न पावै । सो सखियन सँग रास रचावै ॥
संजम साधन ध्यान न आवै । सो ग्वालन सँग खेल मचावै ॥
अनन्त लोक मेटै उपजावै । सो मोहन बृजराज कहावै ॥
निर्विकार निर्भय निर्बाना । कारन भक्त धरे तन नाना ॥
निर्गुन सगुन भेद न दोई । आदि अन्त मध एकहि होई ॥
गूँगे को सपनो यह बाता । सहजो कहै कौन के साथा ॥१३॥
॥ दोहा ॥
निर्गुन सगुन एक प्रभु, देख्यौ समझ विचार ।
सतगुरु ने आँखी दई, निस्चे कियौ निहार ॥१४॥
सहजो हरि बहु रङ्ग है, वही प्रगट वहि रूप ।
जल पाले में भेद ना, ज्यों सूरज अरु धूप ॥।१५॥
चरनदास गुरु की दया, गयो सकल सन्देह ।
छूटे बाद बिबाद सब, भई सहज गति लेह ॥१६॥

४० सहजो बाई
गुरु बिन मारग ना चलै, गुरु बिन लहै न ज्ञान ।
गुरु बिन सहजो धन्ध है, गुरु बिन पूरी हान ॥१७॥
सतगुरु बिन भटकत फिरै, परसत पाथर नीर ।
सहजो कैसे मिटत है, जम जालिम की पोर ॥१८॥
पूजै नौग्रह देवता, पित्तर सतो अकृत१ ।
सहजो कैसे सुलझिहै, है रहो सूत कसूत ॥१६॥
गुरु कूँ जानत है नहीं, बनिता सुत के मोह ।
साधन की निन्दा करै, हरि सूँ राखै द्रोह ॥२०॥
अनन्य भक्ति उपजै नहीं, गुरु सूँ नाहीं सीर२ ।
सहजो मिलै न सिन्ध कूँ, ज्यों तलाब को नीर ॥२१॥
जनक बिदेही परम गुरु, दादा गुरु सुकदेव ।
सहजो की डण्डौत है, चरनदास गुरु भेव ॥२२॥
॥ अड़ियल ॥
हरिप्रसाद की सुता, नाम है सहजो बाई ।
दूसर कुल में जन्म, सदा गुरु चरन सहाई ॥२३॥
चरनदास गुरुदेव, भेव मोहिं अगम बतायौ ।
जोग जुगत सूँ दुर्लभ, सुलभ करि दृष्टि दिखायौ ॥२४॥
॥ दोहा ॥
और साधन परनाम करि, कर जोड़ूँ सिर नाय ।
यही दान मोहि दीजिये, भक्ति करूँ चित लाय ॥२५॥
॥ दोहा ॥
फाग महीना अष्टमी, सुकल पाख बुधवार ।
संबत अठारे सै हुते, सहजो किया बिचार ॥
गुर अस्तुति के करन कूँ, बाढ़यौ अधिक हुलास ॥
होते होते हो गई, पोथी सहज प्रकास ॥
(१) अनंत । (२) निज की खेती ।

सोलह तिथि निर्णय ४१
दिल्ली सहर सुहावना, प्रोक्षितपुर में बास।
तहाँ समापत ही भई, नवका सहज प्रकास॥
सहज प्रकास पोथी कही, चरनदास परताप।
पढ़ै सुनै जो प्रीत सूं, भाजै सबही पाप॥
सोलह तिथि निर्णय
परनाम करूँ सुकदेव जी, तुम पर वारूँ प्रान।
सोलह तिथि अब कहत हूँ, इनका दीजै ज्ञान॥
चरनदास के चरन कूँ, निस दिन राखूँ ध्यान।
ज्ञान भक्ति और जोग कूँ, तिथि में करूँ बखान॥
॥ कुण्डलियाॅं ॥
मावस
ममा ररा दो अंक कूँ राखौ हिरदे माहिं।
धर्मराय जाँचे नहीं लेखा माँगे नाहिं॥
लेखा माँगे नाहिं जाय नहिं जमपुर बंधा।
ऐसे निर्मल नाम को बिसरै सो अंधा॥
टीका चारो बेद का महिमा कही न जाय।
औसर बीतौ जात है सहजो सुमिर अघाय॥
॥ पड़िवा ॥
पानी का सा बुलबुला यह तन ऐसा होय।
पीव मिलन की ठानिये रहिये ना पड़ि सोय॥
रहिये ना पड़ि सोय बहुर नहिं मनुखा देही।
आपन ही कूँ खोज मिलै जब राम सनेही॥
हरि कूँ भूले जो फिरैं सहजो जीवन छार।
सुखिया जब ही होयगो सुमिरैगो करतार॥
॥ दूज ॥
दोयज धंधा जगत का लागि रहै दिन रैन।
कुटुँब महा दुख देत है कैसे पावै चैन॥

४२ सहजो बाई
कैसे पावै चैन बिना साधू की संगत ।
दुनिया रंग पतंग मजीठी गुरु की रंगत ॥
जन्म मरन ता सूँ छुटै सहजो दरसै राम ।
चौरासी के दुख मिटै पावै निज पुर धाम ॥
॥ तीज ॥
तीज तनिक सुख कारने बहुत फसायो जीव ।
लालच लगि ऐसो गिरै जैसे मक्खी घीव ॥
जैसे मक्खी घीव डूब करि निकसै नाहीं ।
ऐसे यह नर बूड़ि रहै कुनबे के माहीं ॥
मनुखा देही पाय कै सहजो डारी खोय ।
जमपुर बाँधे वे चले चौरासी दुख होय ॥
॥ चौथ ॥
चौथ चहूँ दिस तिमिर है महा घोर भयमान ।
मूरख जन सोवत तहाँ मिथ्या ते अज्ञान ॥
मिथ्या ते अज्ञान सत्य कूँ जानत नाहीं ।
बन बन ढूँढ़त फिरत राम अपने ही माहीं ॥
ज्यों मिंहदी में रंग है लकड़ी मध्य हु तास ।
सहजो काया खोजि ले काहे रहत उदास ॥
॥ पाँचै ॥
पाँचौ इन्द्री बस करौ मन जीतन की ठान ।
पवन रोक अनहद लगौ पावौ पद निर्बान ॥
पावौ पद निर्बान करौ तुम ऐसी करनी ।
आसन संजम साध बन्ध लागै जब धरनी ॥
चित मन बुधि हंकार कूँ करौ इकट्ठे आन ।
सहजो निज मन होय जब निश्चल लागै ध्यान ॥
॥ छठ् ॥
छहूँ कँवल कूँ देख करि सतवें में घर छाव ।
रसना उलटि लगाव करि जब आगे कूँ धाव ॥

सोलह तिथि निर्णय ४३
जब आगे कूँ धाव देख करि जगमग जोती ।
बिन दामिनि चमकार सीप बिन उपजै मोती ॥
हंस हिंस जहँ होत है ओअं ओअं¹ होय ।
चरनदास यों कहत हैं सहजो सुरति समोय ॥
॥ सातें ॥
सतसंगति ही कीजिये सत ही कथिये ज्ञान ।
सत ही मुख सूँ बोलिये सत ही कीजै ध्यान ॥
सत ही कीजै ध्यान हद तजि बेहद लागौ ।
तीन अवस्था छोड़ि जाय तुरिया सूँ पागौ ॥
निराकार निर्गुन तहाँ एकरस चेतन रूप ।
रात दिना सहजो नहीं नहीं छाँह नहि धूप ॥
॥ आठें ॥
आठन कूँ जाने नहीं दस कूँ नाहीं भेद ।
चौबीसो समझै नहीं कैसे छूटै खेद ॥
कैसे छूटै खेद पंच कूँ जीतै नाहीं ।
और पचीसौ संग रहै उनके² ही माहीं ॥
दोय सदा लागो रहै चौरासी के फेर ।
चरनदास यों कहत हैं सहजो आपा हेर ॥
॥ नौमी ॥
निन्दा हिंसा त्याग करि तामस कूँ दे पीठ ।
चित कूँ अस्थिर कीजिये नासा आगे दीठ ॥
नासा आगे दीठ जहाँ कछु देखौ भाई ।
पाँच तत्त दरसायँ और अचरज दरसाई ॥
तिरदेवा और आठ सिधि देखौ इन्दूर³ भूप ।
चरनदास कहैं सहजिया साधन अधिक अनूप ॥
(१) ओंओं जहँ । (२) उन्हीं के । (३) चांद ।

४४ सहजो बाई
॥ दसमी ॥
दसो दिसा भर पूर है ता में ये सब पिंड ।
ज्यों सरवर में बुदबुदे ब्रह्म बीच ब्रह्मांड ॥
ब्रह्म बीच ब्रह्मांड तासु को वार न पारा ।
ऐसो तत्त अगाध नेत कहि निगम पुकारा ॥
चरनदास कहें सहजिया गुरु से लेवौ ज्ञान ।
नैना होहिं अनन्त ही जब यह पावै जान ॥
॥ एकादसी ॥
ग्यारह गति जो चहत हौ तजौ जगत की आस ।
कलह कल्पना छाँड़ि के आतम में करि बास ॥
आतम में करि बास खैंच इन्द्री दस लावौ ।
मन इस्थिर जब होय सुरति और निरति मिलावौ ॥
ध्याता थाके ध्यान में ध्यान ध्येय के माहिं ।
जनम मरन मिटि सहजिया उपजै बिनसै नाहिं ॥
॥ द्वादसी ॥
द्वादस दावा दूर करि दावे ही में दुख ।
राग दोष और आपदा अकस निवारे सुख ॥
अकस निवारे सुख मोहिं चरनदास दुहाई ।
तामस सब हो त्याग तासु में बहुत भलाई ॥
काम क्रोध मद लोभ कूँ ज्ञान अगिन सूँ जार ।
जब निर्मल ह्वै सहजियो आनँद लहै अपार ॥
॥ तेरस ॥
तेरस तन अचरज महा छिनभंगी छल रूप ।
देखत ही देखत गये कहा रंक कहा भूप ॥
कहा रंक कहा भूप कोई रहने नहिं पावै ।
इत सूँ सबही जाहि बहुरि उत सूँ नहिं आवै ॥
इतने ऊपर घर करै महल दरब सन्तान ।
हाँसो आवै सहजिया ये मूरख मस्तान ॥

सात वार निर्णय ४५
॥ चौदस ॥
चौरासी भुगती घनी बहुत सही जम मार ।
भरम फिरे तिहुँ लोक में तहू न मानी हार ॥
तहू न मानी हार मुक्ति की चाह न कीन्ही ।
हीरो देही पाय मोल माटी के दीन्ही ॥
मूरख नर समझै नहीं समझाया बहु बार ।
चरनदास कहैं सहजिया सुमिरै ना करतार ॥
॥ पूनो ॥
पूनो पूरा गुरु मिलै मेटै सब सन्देह ।
सोवत सूँ चेतन्न होय देखै जाग्रत गेह ॥
देखै जाग्रत गेह जहाँ सूँ सपने आयौ ।
जग कूँ जान्यौ साँच रूप अपनो बिसरायौ ॥
चरनदास कहैं सहजिया गुरु चरनन चित लाव ।
तिमिर मिटै अज्ञान कूँ ज्ञान चाँदनो पाव ॥
॥ दोहा ॥
सोलह तिथि पूरन भई, सहजो करो बखान ।
चरनदास की दया सूँ, मिटौ सकल अज्ञान ॥
लिखै पढ़ै सुनै प्रीत सूँ, ता को पाप नसाहि ।
और ऐसी करनी करै, मुक्ति रूप ह्वै जाहि ॥
॥ सात वार निर्णय ।'
॥ दोहा ॥
नमो नमो सुकदेव जी, तुम्हरी सरन गही ।
मेरे सिर पर हाथ धरि, चरनों लागि रही ॥
सात वार बरनन करूँ, कुँडली माहिं उचार ।
याही सुख सूँ कहत हूँ, तुम कूँ हिरदे धारि ॥
॥ कुण्डलिया ॥
( १ )
मंगल मालो राम है, जाका यह जग बाग ।
निस दिन ताही में रहै, वा ही सेती लाग ॥

४६ सहजो बाई
वा ही सेती लाग, करी जिन यह गुलजारी।
पात पात की खबर, डाल सब लागै प्यारी॥
आपन हो कूँ जानि लै, वाही ठौर का फूल।
चरनदास कहै सहजिया, ऐसे समझो कूल॥
(२)
बुध बारी में फल घने, जो पै देवै बाड़।
रखवारी के बिन किये, पाँचौ करै उजाड़॥
पाँचौ करै उजाड़, पचीसौ चरि चरि जाई।
सावधान जो होय, सोई वा के फल खाई॥
चरनदास कहै सहजिया, ऐसे समुझ बिचार।
तेरी काया में खिले, भाँति भाँति गुलजार॥
(३)
बृहस्पति वारी आइया, पाई मनुषा देह।
सो तन छिन छिन घटत है, भयौ जात है खेह॥
भयौ जात है खेह, बहुरि लाहा कब लैहौ।
बेगहिं समुझ सँभार, नहीं बहुतै पछितैहौ॥
आगा पीछा क्या करै, सकल बासना त्याग।
चरनदास कहै सहजिया, हरि सुमिरन कूँ लाग॥
(४)
सुक्कर सर१ उपदेस का, लगा कलेजे नाहिं।
ते नर पसू समान हैं, या दुनियाँ के माहिं॥
या दुनियाँ के माहिं, सदा चक्कर में डोलैं।
आवा गौन दुख महा, तासु की गाँठि न खोलैं॥
ऐसे मूरख बावरे, भोंदू मुग्ध२ गँवार॥
चरनदास कहै सहजिया, भरमैं बारम्बार॥
(१) बान, तीर। (२) मूर्ख।

सात वार निर्णय ४७
( ५ )
थावर१ थिर करतार है, और सकल मिटि जाय ।
जा तें सूमति प्रीति करि, रहते चित्त लगाय ॥
रहते चित्त लगाय, तासु ने जग उपजाया ।
वा की सरनै आय, करै बहु बिधि को काया ॥
ऐसा हरि का नाम है, जनम मरन मिटि जाय ।
चरनदास कहै सहजिया, साचे सूँ लौ लाय ॥
( ६ )
एत जो आये जगत में, हरि सुमिरन के काज ।
ह्याँ कुछ कीया और ही, नेक न आई लाज ॥
नेक न आई लाज, साज सब खोटे कीन्हे ।
सदा रहे अज्ञान, राम घट में नहिं चीन्हे ॥
जैहौ जनम गँवाय के, पछितावा रहि जाय ।
चरनदास कहै सहजिया, कहा कियौ तन पाय ॥
( ७ )
सोम सिरीपति३ सेइये, गुरु की आयस४ लेय ।
सतसंगति अचरज कथा, ताही में मन देय ॥
ताही में मन देय, और ऊँचा नहिं या तें ।
और सकल धर्म उरै५, सभी थोथो है बातैं ॥
चरनदास कहै सहजिया, भक्ति सिरोमनि जान ।
तन धन चित बुध प्रान कूँ, ता में दीजै आन ॥
॥ दोहा ॥
सात वार ये मैं कहे, जा में हरि का भेद ।
जो कोइ समुझै प्रीति सूँ, छूटै सबही खेद ॥
सातो वारों बीच में, जग उपजै मिटि जाय ।
सहजो बाई हरि जपौ, आवागवन नसाय ॥
(१) अडोल । (२) इत, यहाँ । (३) श्रीपति = विष्णु । (४) आज्ञा । (५) वरे, पीछे ।
७

४८ सहजो बाई
मिश्रित पद
॥ राग गौरी ॥
नमो नमो गुरु तुम सरना ।
तुम्हरे ध्यान भरम भय भागैं, जीते पाँचौ मरना१ ॥१॥
दुख दारिद्र मिटै तुम नाऊँ, कर्म कटैं जो होहिं घना ।
लोक परलोक सकल बिधि सुधरै, पग लागैं आय ज्ञान गुना ॥२॥
चरन छुए सब गति मति पलटै, पारस जैसे लोह सुना२ ।
सीप परसि स्वाँती भयो मोती, सोहत है सिर राज रना ॥३॥
ब्रह्म होय जीव बुधि नासै, जब कैसो होना मरना ।
अमर होय अमरापद पावै, यह गुर कहिये गुरु बचना ॥४॥
चरनदास गुरु पूरे पाये, जग का दुख सुख क्यों सहना ।
सहजो बाई ब्याध छुटा कर, आनँद मंगल में रहना ॥५॥
॥ राग सोरठा ॥
( १ )
हमारे गुरु बचनन की टेक ।
आन धरम कूँ नाहिं जानूँ, जपूँ हरि हरि एक ॥ १ ॥
गुरु बिना नहिं पार उतरौ, करौ नाना भेख ।
रमौ तीरत बर्त राखौ, होहु पंडित सेख ॥ २ ॥
गुरु बिना नहिं ज्ञान दीपक, जाय ना अँधियार ।
काम क्रोध मद लोभ माहीं, उरझिया संसार ॥ ३ ॥
चरनदास गुरु दया करि कै, दिये मन्तर कान ।
सहजो घट परगास हूवा, गयौ सब अज्ञान ॥ ४ ॥
( २ )
भया हरि रस पी मतवारा ।
आठ पहर झूमत ही बीतै, डार दिया सब भारा ॥ १ ॥
(१) सोना ।