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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 44

४० सहजो बाई
गुरु बिन मारग ना चलै, गुरु बिन लहै न ज्ञान ।
गुरु बिन सहजो धन्ध है, गुरु बिन पूरी हान ॥१७॥
सतगुरु बिन भटकत फिरै, परसत पाथर नीर ।
सहजो कैसे मिटत है, जम जालिम की पोर ॥१८॥
पूजै नौग्रह देवता, पित्तर सतो अकृत१ ।
सहजो कैसे सुलझिहै, है रहो सूत कसूत ॥१६॥
गुरु कूँ जानत है नहीं, बनिता सुत के मोह ।
साधन की निन्दा करै, हरि सूँ राखै द्रोह ॥२०॥
अनन्य भक्ति उपजै नहीं, गुरु सूँ नाहीं सीर२ ।
सहजो मिलै न सिन्ध कूँ, ज्यों तलाब को नीर ॥२१॥
जनक बिदेही परम गुरु, दादा गुरु सुकदेव ।
सहजो की डण्डौत है, चरनदास गुरु भेव ॥२२॥
॥ अड़ियल ॥
हरिप्रसाद की सुता, नाम है सहजो बाई ।
दूसर कुल में जन्म, सदा गुरु चरन सहाई ॥२३॥
चरनदास गुरुदेव, भेव मोहिं अगम बतायौ ।
जोग जुगत सूँ दुर्लभ, सुलभ करि दृष्टि दिखायौ ॥२४॥
॥ दोहा ॥
और साधन परनाम करि, कर जोड़ूँ सिर नाय ।
यही दान मोहि दीजिये, भक्ति करूँ चित लाय ॥२५॥
॥ दोहा ॥
फाग महीना अष्टमी, सुकल पाख बुधवार ।
संबत अठारे सै हुते, सहजो किया बिचार ॥
गुर अस्तुति के करन कूँ, बाढ़यौ अधिक हुलास ॥
होते होते हो गई, पोथी सहज प्रकास ॥
(१) अनंत । (२) निज की खेती ।