सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)
Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press
साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्गुन सगुन संशय निवारन भक्ति का अंग ३६
ता के रूप अनन्त हैं, जा के नाम अनेक ।
ता के कौतुक बहुत हैं, सहजो नाना भेष ॥ ८ ॥
गीता में श्रीकृश्नँ ने, बचन कहे सब खोल ।
सब जीवन में मैं बसूँ, कै चर कहा अडोल ॥ ६ ॥
मैं अखंड व्यापक सकल, सहज रहा भर पूर ।
ज्ञानो पावै निकट हीं, मूरख जानै दूर ॥१०॥
जोगी पावै जोग सूँ, ज्ञानी लहै बिचार ।
सहजो पावै भक्ति सूँ, जा के प्रेम अधार ॥११॥
धन्य जसोदा नन्द धन, धन बृजमंडल देस ।
आदि निरंजन सहजिया, भयो ग्वाल के भेष ॥१२॥
॥ चौपाई ॥
नेत नेत कहि बेद पुकारै । सो अधरन पर मुरली धारै ॥
जाकूँ ब्रह्मादिक मुनि ध्यावै । ताहि पूत कहि नन्द बुलावै ॥
सिव सनकादिक अन्त न पावै । सो सखियन सँग रास रचावै ॥
संजम साधन ध्यान न आवै । सो ग्वालन सँग खेल मचावै ॥
अनन्त लोक मेटै उपजावै । सो मोहन बृजराज कहावै ॥
निर्विकार निर्भय निर्बाना । कारन भक्त धरे तन नाना ॥
निर्गुन सगुन भेद न दोई । आदि अन्त मध एकहि होई ॥
गूँगे को सपनो यह बाता । सहजो कहै कौन के साथा ॥१३॥
॥ दोहा ॥
निर्गुन सगुन एक प्रभु, देख्यौ समझ विचार ।
सतगुरु ने आँखी दई, निस्चे कियौ निहार ॥१४॥
सहजो हरि बहु रङ्ग है, वही प्रगट वहि रूप ।
जल पाले में भेद ना, ज्यों सूरज अरु धूप ॥।१५॥
चरनदास गुरु की दया, गयो सकल सन्देह ।
छूटे बाद बिबाद सब, भई सहज गति लेह ॥१६॥