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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 41

सच्चिदानंद का अंग ३७
किरै१ घटै छीजै नहीं, ताहि न भिजवै नीर।
ना काहू के आसरे, ना काहू के सोर ॥ २ ॥
रूप बरन वा के नहीं, सहजो रंग न देह।
मीत इष्ट वा के नहीं, जाति पाँति नहिं गेह ॥ ३ ॥
सहजो उपजै ना मरै, सदबासी नहिं होय।
रात दिवस ता में नहीं, सीत ऊस्न नहिं सोय ॥ ४ ॥
आग जलाय सकै नहीं, सस्तर सकै न काटि।
धूप सुखाय सकै नहीं, पवन सकै नहिं आटि२ ॥ ५ ॥
मात पिता वा के नहीं, नहीं कुटुंब को साज।
सहजो वाहि न रंकता, ना काहू को राज ॥ ६ ॥
आदि अन्त ता के नहीं, मध्य नहीं तेहि माहिं।
वार पार नहिं सहजिया, लघू दीर्घ भी नाहिं ॥ ७ ॥
परलय में आवै नहीं, उत्पति होय न फेर।
ब्रह्म अनादी सहजिया, घने हिराने हेर ॥ ८ ॥
जाके किरिया करम ना, षट दर्सन को भेस।
गुन औगुन ना सहजिया, ऐसो पुरुष अलेस ॥ ६ ॥
रूप नाम गुन सूँ रहित, पाँच तत्त सूँ दूर।
चरनदास गुरु ने कही, सहजो छिपा हजूर ॥१०॥
आपा खोजे पाइये, और जतन नहिं कोय।
नीर छोर निर्ताय के, सहजो सुरति समोय ॥११॥
नित्य अनित्य सांख्य मत का अंग
भिन्न भिन्न दोनों करै, वही सांख्य मति भेद।
जोवन और बिदेह सूँ, मुक्ति पाय तजि खेद ॥ १ ॥
जाग्रत और सुषोपती, स्वप्न अवस्था तीन।
काया ही सूँ होत है, घटै बढ़ै ह्वै छीन ॥ २ ॥
(१) कीड़ा लगे। (२) उड़ाना, हटाना।