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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

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पृष्ठ 40

३६ सहजो बाई
कोटि बरस इक छिन लगे, ज्ञान दृष्टि जो होय ।
बिसरि जगत औरै बनै, सहजो सुपने सोय ॥२॥
ऐसे ही सब स्वप्न है, स्वर्ग मिर्तु पाताल ।
तीन लोक छल रूप है, सहजो इन्दरजाल ॥३॥
अज्ञानी जानत नहीं, लिप्त भया करि भोग ।
ज्ञानी तौ दृष्टा भये, सहजो खुसी न सोग ॥४॥
मन माहीं बैराग है, ब्रह्म माहिं गलतान ।
सहजो जगत अनित्य है, आतम कूँ नित जान ॥५॥
सहजो सुपने एक पल, बीतै बरस पचास ।
आँख खुलै जब झूठ है, ऐसे ही घर बास ॥६॥
मृग तृस्ना जल साँच है, जब लग निकट न जाय ।
सहजो तब लग जग बन्यौ, सतगुरु दृष्टि न पाय ॥७॥
जैसे बालक जल बिषे, देखि देखि डरपाय ।
समझ भई जब भर्म था, सहजो रहे खिसाय ॥८॥
ज्ञानी को जग झूठ है, अज्ञानी कूँ साँच ।
कोटि लाल कागद लिखे, सहजो बैठा बाँच ॥६॥
जगत तरैयाँ भोर की, सहजो ठहरत नाहिं ।
जैसे मोती ओस की, पानी अँजुली माहिं ॥१०॥
धूवाँ कौ सो गढ़ बन्यो, मन में राज सँजोय ।
भाँईं माई सहजिया, कबहूँ साँच न होय ॥११॥
ऐसे ही जग झूठ है, आतम कूँ नित जान ।
सहजो काल न खा सकै, ऐसो रूप पिछान ॥१२॥
सच्चिदानंद का अंग
॥ दोहा ॥
नया पुराना होय ना, घुन नहिं लागै जासु ।
सहजो मारा ना मरै, भय नहिं ब्यापै तासु । १ ॥