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रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

२३६ असली कोकशास्त्र
इस प्रकार रुकावट हो जाने पर गो-दुग्ध में गूलर के पके फल
का सेवन शुरू कर दे गर्भवती को ठण्डे स्थान में सुला दे और ठंडा
पानी पिलावे । ठण्डे पानी से प्रसव-द्वार को धो डाले । यदि रुधिर
का निकलना शुरू हो गया हो तो दूध के साथ कसेरू या सिंघाड़ा
अथवा कमल औटाकर ठण्डा हो जाने पर पिलावे । अथवा दो तीन
चावल भर अफीम का सत किसी सूखी वस्तु के साथ खिला देना
चाहिए ।
यदि पहले ही पहल गर्भाधान हुआ रहता है तो गर्भस्त्राव या
गर्भपात छः सात घण्टों में ही हो जाता है, देर नहीं लगती।
किन्तु यदि स्त्री दूसरी या तीसरी बार गर्भ धारण किये रहती है
तो दो तीन दिन लग जाते हैं । जिस स्त्री का गर्भ नष्ट हो जाय,
उसे कम से कम पाँच छः महीने तक पति के पास नहीं जाना
चाहिए । क्योंकि इसके भीतर गर्भ रह जाने से उसके भी नष्ट हो
जाने की आशंका रहती है। जिस स्त्री का गर्भ बराबर नष्ट होता
ही जाय, उसे गर्भ की रक्षा के लिए गर्भिणी होने पर खूब साव-
धानी से रहकर इस प्रकार दवा का सेवन करना चाहिए ।
पहले महीने में मुलहठी, दुद्धी और देवदारु की पोटली बाँधकर
दूध में डाल दे । जब दूध पीने के लायक पक जाय, तब उसे आग
के ऊपर से उतार ले और पोटली को निकाल कर फेंक दे । बाद
उस दूध में मीठा डालकर पिया करे ।
दूसरे महीने में करंजवा, काला तिल, मँजीठ और शतावर की

असली कोकशास्त्र २३७
पोटली डालकर ऊपर की रीति से दूध में पकाकर पिये ।
तीसरे महीने में दुद्धी, कमलगट्टा, सरिवन और साँठी के
चावल की खीर खाया करे ।
चौथे महीने में कटेरी, कम्भारी, दूधवाले वृक्ष की कोंपल दूध
में औटाकर पिये तथा घी या दही से भात खावे ।
पाँचवें महीने में दूध भात खाना बड़ा ही उपयोगी है ।
छठे महीने में पृष्ठपर्णी, सहिजन, गोखरू और गिलोय को
दूध में औटाकर उसे पिये । घी मिलाकर भात खाय दूध की लस्सी
का सेवन करे । गोखरू को घी में पकाकर खाय ।
सातवें महीने में सिंघाड़ा, मुनक्का, केसर, मुलहठी और चीनी
को दूध में औटाकर पिये ।
आठवें महीने में कैथ, कटेरी, बेल, परवल और ईख, इन
सबकी जड़ को दूध में पकाकर पीना चाहिए । या दूध में रेंडी का
तेल और मीठा मिलाकर कभी कभी पी लेना उचित है ।
नवें महीने में मुलहठी और देवदारु दूध में पकाकर सेवन
करना हितकर है ।
दसवें महीने में सोंठ और दुद्धी को दूध में पकाकर पीना चाहिए।
मुलहठी, साल वृक्ष के बीज, देवदारु, नोनिया साग, काले
तिल, राल, शतावर, पीपल, कमल की जड़, जवासा, गौरीसर
बायसुरई, दोनों कटेरी, सिंघाड़ा, कसेरू, दाख और मिश्री तीन
तीन माशे ले और सात महीने तक प्रति मास में सात सात दिन

२३८ असली कोकशास्त्र
सेवन करे तो कभी भी गर्भ नष्ट न हो । यदि गर्भिणी की कोष्ठ
शुद्धि न रहती हो तो थोड़ा-सा शुद्ध किया हुआ रेंडी का तेल
( डाक्टरी दवाखानों में मिलता है ) चीनी मिले हुए दूध में मिला
कर कभी कभी पी लेना चाहिए । यह विरेचन बड़ा ही लाभदायक
है, इसी से गर्भिणी स्त्री के लिए भी लिखा जा रहा है । इसके
सिवा दूसरी विरेचन की दवा कभी नहीं खाना चाहिए । क्योंकि
गर्भिणी स्त्री के लिए वमन और विरेचन निषेध है किन्तु ऊपर की
दवा लेने में कोई हानि नहीं है। इस लिए इसका सेवन करके कोष्ठ-
शुद्धि करने में गर्भिणी स्त्री को किसी बात की चिन्ता नहीं करनी
चाहिए ।
अब इसके बाद हम यह बतलाना चाहते हैं कि यदि गर्भावस्था
में अन्यान्य उपद्रव खड़े हों तो उनके लिए क्या करना उचित है ।
पहला महीना
यदि पहले महीने में किसी प्रकार का कष्ट प्रतीत हो तो
नीलोफर, कमल ककड़ी, सिंघाड़ा और कसेरू को ठण्ढे पानी में
पीसकर गाय के दूध में पीना चाहिए । अथवा मँजीठ, लालचन्दन,
कूट और तगर को बराबर बराबर लेकर दूध में पीसकर दूध ही में
पीना चाहिए ।
दूसरा महीना
तगर, केसर, बेलगिरि और कपूर को समान मात्रा में लेकर
बकरी के दूध में पीसे और उसी के दूध में छानकर पीये । या

असली कोकशास्त्र २३६
सालम मिश्रा, नीलोफर, कसेरू, अदरख, सम मात्रा में लेकर जल
में पोस गाय के दूध में छानकर पीना चाहिए । अथवा सिंघाड़ो,
कसेरू, सफेद् जीरा, बेलपत्र और छुहाड़ा सम मात्रा में ले, पानी
में पीसकर दुध में पिये ।
तीसरा महीना
पद्माख, सफेद् चन्दन, खस और तगर को सम मात्रा में
पानी से पीसे और बकरी के दूध में छानकर पी ले । अथवा खस,
सफेद् चन्दन, नागरमोथा, पद्माख, कमल ककड़ी को पानी में
पीसकर गाय के दूध के साथ पीना चाहिए ।
चौथा महीना
सिंघाड़ा, केले का पत्ता, दाख, अनार की कली और केले के
कन्द को पानी में पोसकर बकरी के दूध में पिये । या खस, कमल-
ककड़ी और केले की जड़ को पानी में पीस बकरी के दूध में पीने
से कष्ट दूर हो जाता है ।
पाँचवाँ महीना
नीलोफर, कमलककड़ी, कमलगट्टा, और नागकेशर को बकरी
के दूध में पीस छानकर पीना चाहिए । या नीलकमल की जड़,
काकमाची, कमलककड़ी को पानी में पीसकर दूध में पिये ।
छठा महीना
बच, इलायची, मुनक्का, नीलोफर और नागकेसर को दूध में
पीस छानकर पीना चाहिए । या पीपल, पीपरामूल, कमल का

२४० असली कोकशास्त्र
फूल और कमल की केशर को पानी में पीस, बकरी के दूध में पीना
उचित और लाभदायक है ।
सातवाँ महीना
सातवें महीने में यदि किसी तरह की पीड़ा हो तो कैथ की
गिरि, मूँगा की शाख, धान की खील और इन्द्र जौ को सम मात्रा
में लेकर दूध में पीस छानकर पीना चाहिए । अथवा कैथ वृक्ष के
फल की गिरी, सालम मिश्री, धान की खील और इन्द्र जौ को
बराबर बराबर लेकर जल में पीस, गाय के दूध में छानकर पीना
चाहिए। या पीपल की जड़, बड़ की जड़, जल भंगरा, सूर्यमुखी
की जड़ और साँठी की जड़ तथा लाल चन्दन को सम मात्रा में
लेकर बकरी के दूध में पीसकर उसी के दूध में पीना भी विशेष
लाभ पहुँचाता है ।
आठवाँ महीना
पदमाख, गजपीपल, कमल का फूल, कमलगट्टे की गिरी
और धनियाँ इन चीजों को सम मात्रा में लेकर पानी में पीस
डालना चाहिए । बाद उसे गाय के दूध में छानकर पीने से सब
तरह के उपद्रव शान्त हो जाते हैं ।
नवाँ महीना
रेंड़ की जड़, काकोली, पलासपापड़ा, इनको सम मात्रा में
ले कूट-छानकर जल के साथ पीने से तत्क्षण आराम हो जाता है ।
या सोंठ, ढाक के पत्ते, इलायची, बायविडंग, सफेद जीरा और

१६ असली कोकशास्त्र २४१
गजपीपल, इनको बराबर बराबर लेकर बकरी के दूध में पीस छान
कर पीने से भी कष्ट दूर हो जाता है और गर्भ नष्ट नहीं होता ।
—:०:—
गर्भिणी की इच्छा पूर्ति
गर्भिणी स्त्री को कभी-कभी कुछ ऐसी चीज खाने की इच्छा
होती है, जिसे वह सुगमता से नहीं पाती । ऐसी दशा में उसकी
जिस चीज पर इच्छा हो, वह चीज उसे अवश्य खिला देनी
चाहिए । कितनो ही स्त्रियाँ मूर्खता के कारण अपनी इच्छा को
प्रकट नहीं करतीं और लज्जा के कारण उसे दबा बैठती हैं, किन्तु
यह बहुत बुरी बात है । इच्छा को रोकने से गर्भस्थ बालक पर
बड़ा ही बुरा असर पड़ता है । ऐसी स्त्रियों की सन्तान बहुत
असन्तोषी होती है । इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि
गर्भिणी स्त्री को दो हृदय होता है और जो इच्छा उत्पन्न होती है,
वह एक प्रकार से उसके भीतर की माँग होती है। इसी से गर्भिणी
स्त्री को दौहृदिनी कहा गया है ।
—०—

२४२ असली कोकशास्त्र
प्रसवकाल
बच्चा पैदा होने के समय को प्रसवकाल कहते हैं। जिस घर
में बच्चा पैदा होता है, उसे 'प्रसूति गृह' या ग्रामीण भाषा में सौर
कहते हैं और जब बच्चा पैदा हो जाता है, तब उस गर्भिणी स्त्री
का नाम प्रसूता हो जाता है। इस प्रकरण में प्रसवकाल के
सम्बन्ध में कुछ लिखना आवश्यक है। क्योंकि इस समय स्त्रियों
का नया जन्म होता है। जरा भी गलती करने से इस समय अनेक
तरह के रोग, जैसे प्रसूत का दुःख, योनि का बाहर निकल कर
बढ़ आना आदि—हो जाते हैं। इस लिए जब देखे कि गर्भ के
दिन पूरे हो गये, तब किसी चतुर दाई को पहले ही से बुलाकर
घर में रख ले। यदि कोई दाई न मिले तो घर की स्त्रियों को ही
खूब सावधानी से इस काम को करने के लिए तैयार हो जाना
चाहिए।
पहले कहा जा चुका है कि गर्भ में बालक प्रायः नौ महीने के
लगभग रहता है। कभी नौ महीने में कुछ दिन पहले ही वह पैदा
हो जाता है, और कभी दस-पाँच दिन बाद । जब प्रसवकाल
निकट आ जाय, तब गर्भिणी का प्रसूतिका-गृह निश्चय कर लेना
चाहिए। वह घर पवनीक यानी हवादार हो तथा दुर्गन्ध-रहित
हो। प्रकाश भी उस घर में अच्छी तरह होना जरूरी है। उस
कमरे में सील भी न होनी चाहिए। आजकल सूतिका-गृह बहुधा

असली कोकशास्त्र २४३
ऐसा चुना जाता है, जो घर मकान भर में सब कमरों से रद्दी और
खराब होता है । किन्तु ऐसा करना बहुत ही बुरा है । वाग्भट्टजी
ने लिखा है:—
प्राक्चैव नवमात्मास्तात् सूतिका गृहश्रामयेत् ।
देशे प्रशस्ते सम्भारै सम्पन्नं साधकेऽहनि ॥
अर्थात्—नवाँ महीना शुरू होते ही शुभ दिन देखकर अच्छे
स्थान में बने हुए स्थान को सूतिका-गृह चुनना चाहिये । उसमें
सारी आवश्यकीय वस्तुएँ मौजूद रहना जरूरी है । ऐसे ही मकान
में गर्भिणी स्त्री को प्रसव करना चाहिए ।
अब हम यह बतलाना चाहते हैं कि सूतिका-गृह कैसा होना
चाहिए । ऊपर कहा जा चुका है कि इस घर को साफ-सुथरा और
हवादार रहना बहुत जरूरी है । इसके सिवा यह घर कम से कम
८-९ हाथ लम्बा ओर ५-७ हाथ चौड़ा होना चाहिए । इस घर
में बहुत तेज हवा आने की आवश्यकता तो नहीं है पर मन्द मन्द
हवा अवश्य आनी चाहिए । घर में ठण्ड बिलकुल न होनी चाहिए
यदि जाड़े का दिन हो तो इस घर में बिना धुएँ की आग हरवक्त
दहकती रहनी चाहिए । सुबह-शाम कमरे के दरवाजों को बन्द कर
देना उचित है ; इससे कमरे में शीत का प्रवेश नहीं हो पाता। बाकी
समय में जाड़े का दिन होते हुए भी दरवाजों को खुला रक्खे ।
गर्मी के दिनों में दरवाजों को बराबर खुला रखना उचित है । वर्षा
में यदि घटा घिरी हुई हो तो इन्हें बन्द करके थोड़ा-सा खुला रहने

२४४ असली कोकशास्त्र
दे। सौर में सर्दी लगने से मसान आदि रोग हो जाते हैं। घर में
दीपक ऐसे स्थान पर रखना चाहिए जो जच्चा के सम्मुख न हो।
सिरहाने की ओर रखना सबसे उत्तम है। अच्छा हो यदि उस घर
में मिट्टी के तेल का दीपक न जलाया जाय। कारण यह कि इस
तेल में धुआँ होता है और वह धुआँ जीवन के लिए हानिकारक है।
सौर के घर में बहुत-सी स्त्रियाँ न रहने पावें। स्त्री के पति
को तो उस समय वहाँ रहना ही नहीं चाहिए। घर में ऐसी स्त्रियाँ
उस समय रहें जो प्रसूता की प्रेमपात्री हों और प्रिय वचन बोलने
वाली हों—साथ ही इस विषय की जानकार हों। उस समय भय-
युक्त बात भूलकर भी मुख से नहीं निकालना चाहिए। अधिक से
अधिक चार स्त्रियाँ तक प्रसव के समय सूतिका-गृह में रह सकती
हैं। क्यों कि इससे अधिक स्त्रियों के रहने से एक शोर-गुल होता
है दूसरे घर की वायु भी खराब हो जाती है।
इस समय वेदना दो तरह की होती है; एक तो प्रसव की
वेदना और दूसरी किसी अन्य कारण से। प्रसव वेदना के चिन्ह
ये हैं:—कोख में शिथिलता आ जाती है, हृदय बन्धन-रहित जान
पड़ने लगता है, दोनों जाँघों में पीड़ा होने लगती है, कमर या पीठ
के चारों ओर दर्द होती है, प्रसव द्वार से कफ के समान पानी
निकलने लगता है तथा बार बार मूत्र त्याग करने की इच्छा होती
है, पर मूत्र उतरता नहीं। इसके अतिरिक्त प्रसव वेदना रुक रुक
कर होती है। प्रसव वेदना पहले धीरे धीरे होती है और फिर कुछ

असली कोकशास्त्र २४५
समय के लिए रुक जाती है। बाद हलकी सी पीड़ा होकर २५-३०
मिनट तक रहती है इसके बाद अधिक देर तक ठहरनेवाली तीव्र
वेदना आरम्भ हो जाती है ।
यदि गर्भिणी स्त्री खाने-पीने में व्यतिक्रम न करे, कोष्ठशुद्धि पर
हमेशा ध्यान रक्खे और अपनी शक्ति के अनुसार बराबर परिश्रम
करती जाय—आरामतलब न हो, तो उसे अधिक प्रसव वेदना नहीं
हो सकती । यही कारण है कि मजदूरी पेशा करनेवाली स्त्रियों को
प्रसव की पीड़ा बहुत ही कम होती है । अकसर देखने में आया है
कि गर्भिणी मजदूरिन पूरा गर्भ हो जाने पर भी काम किया करती
है और जब उसे प्रसव के चिह्न दिखलायी पड़ते हैं तब वह काम
छोड़कर चली जाती है और दो तीन घण्टे में ही बच्चा पैदा हो
जाता है । प्रसव-वेदना एक रोग है । जिन स्त्रियों में यह रोग नहीं
होता, उन्हें प्रसव-वेदना नहीं के बराबर होती है। चंगड़ों की
स्त्रियाँ चली जाती हैं और मार्ग में ही प्रसव कर लेती हैं। उन्हें
उस काम के लिए दस मिनट से अधिक नहीं ठहरना पड़ता । इसी
प्रकार अफ्रिका की जंगली जातियाँ, जो हमेशा नंगी रहा करती हैं
और जिन्हें असभ्य कहा जाता है, बिना किसी विशेष कष्ट के बड़ी
आसानी से प्रसव कर लेती हैं। इसका कारण विद्वानों ने यहो
बतलाया है कि वे काम-काज किया करती हैं और गर्भाधान हो
जाने के बाद मैथुन एक बार भी नहीं करतीं ।
प्रसव-वेदना के समय मल-मूत्र के वेग को कभी भी न रोकना

२४६ असली कोकशास्त्र
चाहिए। यदि इनकी रुकावट हो गयी हो तो फौरन यत्न करना
उचित है। यदि इस समय भूख लगे तो गाय का गरम दूध थोड़ा
कुनकुना रहने पर पिलाना चाहिए। प्यास लगने पर ठण्डा पानी
देने में कोई हानि नहीं है। कुछ लोगों का कहना है कि प्रसव का
समय निकट आ जाने पर गर्भिणी को मल तो त्याग आने दे पर
पेशाब लगने पर मूत्रत्याग न करावे—क्योंकि मूत्र को रोकने से
प्रसव में बड़ी सहायता मिलती है। किन्तु हमारे ख्याल से मूत्र
का वेग रोकना भी ठीक नहीं है।
जब लक्षणों से यह निश्चय हो जाय कि वेदना प्रसव की ही
है, तब उसको खूब कसी हुई लम्बी-चौड़ी चारपाई पर सुला देना
चाहिए। यदि तख्ता हो तो और भी अच्छा। गर्भिणी को भूमि
पर कभी न लेटना चाहिए। क्योंकि धूल में हजारों रोगोत्पादक
कीटाणु होते हैं। ये कीटाणु शिशु के ऊपर चढ़ जाते हैं और उसे
रोगी बना देते हैं। प्रसव के समय प्रायः स्त्रियों के लिए फटे, पुराने
और मैले चिथड़े दिये जाते हैं; किन्तु यह ठीक नहीं है। स्वच्छता
की ओर पूरा ध्यान रखना चाहिए। ऐसे कपड़ों से प्रसविरणी और
नव-जात शिशु के बीमार होने की पूरी सम्भावना रहती है। क्योँ
कि यह अवस्था बड़ी ही नाजुक होती है। कभी कभी वस्त्रों की
गन्दगी के कारण भी बच्चों का दम घुटने लगता है और वे मर
जाते हैं।
यदि सूतिका-गृह में रखने वाली चारपाई या तख्ते को गरम

असली कोकशास्त्र २४७
जल से धो कर सुखा लिया जाय और बाद सूतिका-गृह में बिछावे
तो अच्छा हो। जिस प्रकार उत्तम चारपाई की जरूरत है, उसी
प्रकार सूतिका-गृह में उत्तम, स्वच्छ, कोमल और सुखद बिछौने
की भी जरूरत है। सूतिका गृह में एक भी फालतू चीज न रहने
दे। प्रसुता की चारपाई दीवार के पास खिड़की के सामने बिछाना
चाहिए। उस घर में हर वक्त गरम पानी तैयार रहना चाहिए।
दाई को प्रसव के वक्त इस पानी से हाथ धोकर प्रसुता की सुश्रूषा
करनी चाहिए। जो दाई काम करने के लिए नियत की जाय,
उसे साफ वस्त्र पहना देना चाहिए और उसकी अँगुलियों के नाखून
भी कटवा दे। क्योंकि नाखून से गर्भस्थान में चोट लग जाने का
भय रहता है।
जब प्रसवकाल बिलकुल निकट आ जाय, तब खूब सावधानी
से यह देखना चाहिए कि बच्चा पेट में किस प्रकार से है। सिर
नीचे है या पैर अथवा आड़ा तो नहीं है। पहचानने की रीति यह
है कि प्रायः सभी बालकों का सिर नीचे की ओर होता है और
सिर के बल ही वे पैदा होते हैं। जब बालक का सिर नीचे की ओर
होता है, तब वह बायीं ओर से दाहिनी ओर को घूमता है और
स्त्री को बायीं ओर भारी मालूम होता है; किन्तु जिस स्त्री के दाहिनी
ओर भारी रहे और बालक दाहिनी ओर से बायीं ओर घूमे तब
समझना चाहिए कि बालक के पैर नीचे की ओर है और वह पैर
के बल उत्पन्न होगा। यदि दोनों ओर भारी रहे और घूमे न, तो

२४८ असली कोकशास्त्र
समझ ले कि बालक आड़े पड़ा हुआ है और हाथ के बल उत्पन्न
होगा। इसमें स्त्री को बहुत कष्ट होता है। यहाँ तक कि सौ में
पंचानवे स्त्रियाँ मर जाती हैं।
बहुधा दाइयाँ वेदना के समय गर्भिणी से काँखने के लिये कहती
हैं। इसमें उनका उद्देश्य यह होता है कि इस प्रकार जोर लगाने
से बच्चा जल्द बाहर निकल आवेगा; किन्तु ऐसा करना अत्यन्त
घातक है। इस समय यदि गर्भिणी को रुचे तो थोड़ा घी डाला
हुआ दूध पिलाना चाहिए। हाँ यदि प्रसव हो रहा हो, तब तो
थोड़ा जोर लगाना ठीक होता है; पर उस समय तो अधिकांश
स्त्रियों को चेत ही नहीं रहता। प्रसव के समय इतनी वेदना होने
का कारण यह है कि गर्भाशय का मांस धीरे-धीरे सिकुड़ने लगता
है और प्रसव द्वार चौड़ा होने लगता है। गर्भाशय के सिकुड़ने की
लहरें उठती हैं, इन्हीं लहरों के कारण स्त्री को इतना कष्ट होता है।
गर्भाशय के भीतर बच्चा और कुछ तरल पदार्थ होते हैं।
इस समय बहुत सी स्त्रियाँ अपना दिल एकदम छोटा कर लेती
हैं। वे यह समझती हैं कि अब जान नहीं बचेगी। इसी से प्रसव
काल में पास में रहनेवाली स्त्रियों का बुद्धिमती होना आवश्यक
बतलाया गया है। क्योंकि चतुर स्त्रियाँ गर्भिणी को सान्त्वना दे
सकती हैं और अपनी बुद्धि-चातुरी से उसके दिलको बहला सकती
हैं। इस समय गर्भिणी में हिम्मत पैदा करना उसकी जीवन-रक्षा
के लिए बहुत ही आवश्यक होता है। छोटा दिल कर लेने से कभी-

असली कोकशास्त्र
चित्र नं० ८
हस्तिनी स्त्री

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असली कोकशास्त्र २४६
कभी मनुष्य निष्प्राण हो जाता है। विचारों का प्रभाव मनुष्य पर
बड़ा ही गहरा पड़ता है। इस लिए पास में रहनेवाली स्त्रियों को
खूब बुद्धिमानी से गर्भिणी को उत्साहित रखना उचित है। इस
समय बहुत सी दाइयाँ भीतर हाथ डालकर देखती हैं; किन्तु यह
बहुत ही बुरा काम है। इससे प्रसूता को बहुत कष्ट होता है। गर्भा-
शय के भीतर बालक एक झिल्ली से मढ़ा रहता है। बच्चे के बाहर
निकलते-निकलते यह झिल्ली फट जाती है। झिल्ली के फटने का शब्द
भी होता है। इसके फटते ही गर्भोदक बहने लगता है, इससे बच्चे
के निकलने के मार्ग में चिकनाहट पैदा हो जाती है। कभी-कभी यह
झिल्ली नहीं भी फटती और बच्चा झिल्ली सहित बाहर निकल आता
है। इस समय होशियारी की जरूरत है। चतुर दाई को उचित है
कि खूब सावधानी से उस झिल्ली को चाकू से फाड़कर बालक को
निकाल ले। इस काम में यदि देर की जाती है तो बच्चा मर जाता
है। क्योंकि गर्भ में बच्चे के फेफड़े साँस लेने अथवा छोड़ने का
काम नहीं करते; किन्तु ज्योंही वह बाहर निकलता है, त्योंही उसकी
श्वास-प्रच्छ्वास क्रिया जारी हो जाती है। झिल्ली, उसके इस काम
में रुकावट डालती है, इस लिए उसके हटाने में विलम्ब होने से
बच्चा मर जाता है। इस काम में सावधानी रखने के लिए इस
वास्ते कहा गया है कि कहीं झिल्ली फाड़ने के समय चाकू बच्चे के
शरीर में न लग जाय।
कभी-कभी बच्चे पेट में ही मर जाते हैं। पेट में बच्चे के मर

२५० असली कोकशास्त्र
जाने की पहचान यह है कि मरा हुआ बच्चा पेट में घूमता नहीं है।
पेट में मांस का लोथा सा हो जाता है। स्त्री के स्तनों का दूध सूख
जाता है और उसमें ढिलाई आ जाती है। यदि बच्चा मर जाय तो
फौरन किसी अच्छे डाक्टर से उसे निकलवाने का प्रबन्ध करना
चाहिए। देर करने से स्त्री की जान खतरे में पड़ जाती है।
प्रसवकाल की साधारणतया तीन अवस्थायें होती हैं। पहिली
अवस्था में तो बालक धीरे-धीरे और रुक-रुक कर प्रसव द्वार की
ओर आता है और दूसरी अवस्था में वह पैदा होने लगता है।
तीसरी अवस्था वह है, जो बालक उत्पन्न होने के पीछे प्रसूता के
पेट में से पानी की तरह कोई पदार्थ निकलता रहता है। पहली दशा
में प्रसूता को खड़ी रखे या सँभाल कर टहलाती रहे। परन्तु उतना
टहलाना उचित है, जितने से उसे थकावट न मालूम हो। यदि
थकावट आने लगे तो बैठा दे और यदि नींद आती हो, तो बेधड़क
सो जाने दे। क्योंकि नींद उचटने के बाद जब वेदना शुरू होती है
तब बहुत जल्द प्रसव हो जाता है। प्रसूता को चित्त या पट न
लिटाकर बायीं करवट से या जिस ओर से लेटने में उसे आराम
मिले उसी ओर लिटाना अधिक उत्तम है। दोनों घुटनों के बीच में
कोमल तकिया रख देना चाहिए, ताकि दोनों जाँघ अलग-अलग
रह सकें। अब इस अवस्था में प्राणवायु को भीतर रोक कर जोर
लगाना प्रसूता के लिए लाभदायक है, इस समय भी जोर उतना
ही लगाना चाहिए जितना स्वाभाविक रीति से मल त्याग करने में—

असली कोकशास्त्र — पृष्ठ २५१

अधिक नहीं। किन्तु मूर्ख दाइयाँ पहली अवस्था में जोर लगवा
लगवा कर प्रसूता को थका डालती हैं, जिससे बहुत हानि होती है।
पहली अवस्था में सिर्फ टहलाने के और कोई काम नहीं लेना
चाहिए। टहलाने से वेदना तीव्र हो जाती है, जिससे प्रसव होने
में शीघ्रता होती है। यदि वेदना मन्द पड़ जाय तो स्त्री को थोड़ा
सा गरम दूध पिलाना चाहिए। इससे जरायु का मुख शीघ्र खुल
जाता है। कोई-कोई स्त्री को दो चार दिन तक प्रसव-वेदना सहनी
पड़ती है। उस समय घर की स्त्रियाँ उसे भोजन नहीं देतीं; किन्तु
ऐसा करना उचित नहीं। गरम दूध या साबूदाना अथवा मखाने
की खीर आदि हल्की चीजें अवश्य खाने को देनी चाहिए।
प्रसव होते समय एक चतुर स्त्री को प्रसविणी के पीछे बैठ
जाना चाहिए। उसे अपना हाथ प्रसूता की पीठ पर धीरे-धीरे फेरना
चाहिए। जिस स्त्री को पहलौठी का बालक होता हो, उसकी तो
बड़ी ही सावधानी होनी चाहिए। इससे जननी को शान्ति मिलती
है। जबतक बच्चा पैदा न हो जाय, तबतक उस स्त्री के पीछे से नहीं
हटना चाहिए और हलका हाथ भी फेरते जाना उचित है। जब
बालक का सिर बाहर निकल आवे तब उसकी गर्दन के चारो ओर
हाथ फेरकर यह देख लेना जरूरी है कि नाल गर्दन में तो नहीं
लिपटा है। पैदा होते ही यदि यह नाल शरीर से न निकाला जाय
तो बच्चे के मर जाने का भय रहता है। बालक का मस्तक निकल
आने पर बहुत सी मूर्ख दाइयाँ बच्चे का मस्तक पकड़ कर खींचती

२५२ असली कोकशास्त्र
हैं। किन्तु ऐसा कभी न करना चाहिए। मस्तक के साथ एक नस
होती है, उसके खिंच आने से बालक की मृत्यु हो जाने का भय
रहता है। इस लिए दाई को चाहिए कि स्त्री के पेट पर धीरे-धीरे
हाथ फेरे। ऐसा करने से फिर प्रसव-वेदना शुरू हो जाती है और
बच्चे का शेष अंग भी बाहर निकल आता है, खींचने की जरूरत
नहीं पड़ती।
ऊपर जिस नाल की चर्चा की गयी है, यदि वह नाल बच्चे की
गर्दन में लिपटा हुआ हो तो धीरे-धीरे हलके हाथों से उसे खोलकर
सिर के ऊपर से उतार कर भीतर कर देना चाहिए। यदि नाल में
उलझन अधिक हो तो उसमें समय लगाना ठीक नहीं है। यदि सिर
निकल आने के बाद प्रसव की वेदना पेट पर हाथ फेरने से भी न
पैदा हो, तो समझना चाहिए कि अभी बच्चे का समूचा शरीर
निकलने में कुछ देर लगेगी। इस लिए ऐसे समय में चतुर दाई
बालक को खींचकर निकाल ले, यही अच्छा है। क्योंकि देर लगने
से भी बच्चे की मृत्यु की आशंका रहती है। परन्तु इतने पर भी
सिर पकड़ कर दाई कभी न खींचने पावे। उसे चाहिए कि वह अपने
दोनों हाथों की अँगुलियाँ भीतर डालकर बालक के बगलों में अंकुश
की तरह अड़ाकर खींचे। खींचते समय पीछे बैठी हुई स्त्री को
चाहिए कि वह प्रसूता का पेट दबाये रहे। पेट के दबाये रहने से
रक्त नहीं निकलने पाता। रक्त निकलने से बालक को हानि पहुँचाती
है। क्योंकि वह रक्त बालक के कान नाक ओर मुख में भर जाता है।

असली कोकशास्त्र २५३
किसी-किसी स्त्री को बालक पैदा होते समय बड़ा कष्ट होता
है, जल्द प्रसव होता ही नहीं। कई दिनों तक असह्य वेदना होती
रहती है। ऐसी दशा में नीचे लिखे यत्नों से काम लेना चाहिए ।
किन्तु यत्न करने के पहले इस बात को अच्छी तरह से जान लेना
चाहिए कि प्रसव-वेदना ही है या और कुछ । जब यह निश्चय हो
जाय कि प्रसव-वेदना ही है, तब नीचे लिखे उपायों को काम में
लाकर गर्भिणी के कष्टों को दूर करना चाहिए:—
प्रासविक उपचार
१—करंजुवा के पत्तों और बीजों का कल्क बनाकर या बकरी
के दूध में तिल के तेल को पकाकर प्रसव-स्थान में मलने से बच्चा
पैदा हो जाता है, विशेष कष्ट नहीं होता ।
२—भैंड़भाँड़ की जड़ कपड़े में लपेट कर प्रसविरणी की कमर
में बाँधे, यह दवा परीक्षित है, शर्तिया प्रसव हो जाता है ।
३—रेंड़ी का तेल पेडू पर धीरे-धीरे मलने से बहुत जल्द
प्रसव हो जाता है ।
४—सेहुँड़ का दूध नख और ढूँड़ी पर मले ।
५—सवा तोला अमलतास का छिलका पानी में औटाकर
ऊपर से चीनी मिलाकर पिला देने से भी प्रसव जल्द हो जाता है ।
६—यदि चुम्बक पत्थर को प्रसूता अपने हाथ में लिये रहे,
तब भी प्रसव जल्द हो जाता है ।