रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० असली कोकशास्त्र
जाने की पहचान यह है कि मरा हुआ बच्चा पेट में घूमता नहीं है।
पेट में मांस का लोथा सा हो जाता है। स्त्री के स्तनों का दूध सूख
जाता है और उसमें ढिलाई आ जाती है। यदि बच्चा मर जाय तो
फौरन किसी अच्छे डाक्टर से उसे निकलवाने का प्रबन्ध करना
चाहिए। देर करने से स्त्री की जान खतरे में पड़ जाती है।
प्रसवकाल की साधारणतया तीन अवस्थायें होती हैं। पहिली
अवस्था में तो बालक धीरे-धीरे और रुक-रुक कर प्रसव द्वार की
ओर आता है और दूसरी अवस्था में वह पैदा होने लगता है।
तीसरी अवस्था वह है, जो बालक उत्पन्न होने के पीछे प्रसूता के
पेट में से पानी की तरह कोई पदार्थ निकलता रहता है। पहली दशा
में प्रसूता को खड़ी रखे या सँभाल कर टहलाती रहे। परन्तु उतना
टहलाना उचित है, जितने से उसे थकावट न मालूम हो। यदि
थकावट आने लगे तो बैठा दे और यदि नींद आती हो, तो बेधड़क
सो जाने दे। क्योंकि नींद उचटने के बाद जब वेदना शुरू होती है
तब बहुत जल्द प्रसव हो जाता है। प्रसूता को चित्त या पट न
लिटाकर बायीं करवट से या जिस ओर से लेटने में उसे आराम
मिले उसी ओर लिटाना अधिक उत्तम है। दोनों घुटनों के बीच में
कोमल तकिया रख देना चाहिए, ताकि दोनों जाँघ अलग-अलग
रह सकें। अब इस अवस्था में प्राणवायु को भीतर रोक कर जोर
लगाना प्रसूता के लिए लाभदायक है, इस समय भी जोर उतना
ही लगाना चाहिए जितना स्वाभाविक रीति से मल त्याग करने में—