रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
specifically. (स्पे-सि-फि-के-ली) ब्योरा, विशेष वर्णन.
desires - डिजाइर / चाहता है, इच्छा
Extension - एक्स्टेन्शन - फैलाव.
Applicable - (एप्पली
Provided - (प्रोवाईडेड) बशर्ते कि, इस प्रतिज्ञा / तजवीज़ किया यदि
Limited - (लिमिटेड) सीमा, रोकता, किनारा, घेरा,
Terminate - (टरमीनेट) समाप्त करना,
Definitely. (डेफिनेटली) निश्चय.
Enables. (एन-ए-बिल) शक्त बनाना, समर्थ करना.
unless.
confident. (कानफीडेन्ट) निःसन्देह, विश्वास पात्र.
interruption
additional (ऐ-डिश-अन-ऐल) अधिक, फालतू,
Facility. (फैसिलीटी) सुगमता, तेजी, होशियारी.
urgent.
Present hours of service are 14-30 to 18--30 (I.S.T)
Precisely. - (प्रीसिस-ली) हूबहू, ठीक रीति से
असली कोकशास्त्र २११
प्रदर और प्रमेह
उत्तम और निरोग सन्तान पैदा करने के लिए माता-पिता का
रोग-रहित होना अत्यावश्यक है। इस लिए स्त्री-पुरुष को रोग से
दूर रहने के लिए पूरी चेष्टा करनी चाहिए। संयम से रहने वाले
मनुष्य को रोग नहीं घेरते। जो मनुष्य संयमी नहीं होता, उसीका
रोग पीछा करता है। यदि कभी कोई भूल हो जाय और रोग आ
घेरे तो तुरन्त ही उसके शमन का उपाय करना चाहिए और आगे
के लिए पूर्णरीति से सावधान हो जाना चाहिए। इस प्रकरण में
दो ऐसे रोगों की चर्चा की जायगी, जिन्हें बहुधा लोग छिपाते हैं
और जिसका फल यह होता है कि किसी न किसी दिन जीवन पर
ही आ बनती है। ये दोनों ही महा भयानक और नाशकारी रोग
हैं। उत्तम सन्तानोत्पत्ति के तो ये जानी दुश्मन ही हैं। एक का
नाम प्रदर और दूसरे का नाम प्रमेह है। दो रोग एक से ही हैं।
भेद केवल इतना ही है कि प्रदर रोग स्त्री को होता है और प्रमेह
पुरुष को। पहले प्रदर रोग का वर्णन किया जाता है।
प्रदर रोग निर्बलता से हुआ करता है। यह रोग केवल स्त्रियों
को ही होता है, पुरुषों को नहीं। अति मैथुन से, खट्टा, तीक्ष्ण
चीजों के अधिक सेवन से, दिन में सोने से, अजीर्ण से, चिन्ता से,
शोक से, चोट लगने से, मादक वस्तुओं के सेवन से, गर्भपात से,
गर्भस्राव से तथा अप्राकृतिक भोजन करने से यह रोग उत्पन्न
२१२ असली कोकशास्त्र
होता है। इस रोग के ये लक्षण हैं,—प्रसवद्वार से पानी निकले,
( यह पानी कई तरह का होता है ) स्त्री के शरीर में पीड़ा रहे,
हड्फूटन हो और हर वक्त सुस्ती बनी रहे तो समझना चाहिए कि
प्रदर रोग है। प्रसव द्वार से निकलने वाला यह पानी झागदार
लसोड़ और चिकना होता है। यदि इसका रंग सफेद, पीला अथवा
नीला हो ! तो जानना चाहिए कि रोग साध्य है, किन्तु यदि रुधिर
बराबर निकले, किसी तरह भी न रुके, प्यास अधिक लगे, हमेशा
दाह बनी रहे, ज्वर हो, शरीर भी क्रमशः क्षीण होता जाय तो
असाध्य समझना चाहिए। इसका नाम भी असाध्य प्रदर है ।
यह रोग कई तरह का होता है—जैसे वात प्रदर, पित्त प्रदर,
कफ प्रदर, सन्निपात प्रदर, रक्त प्रदर और असाध्य प्रदर । यदि
शुष्क कर निकले और वह फेनयुक्त हो, उसके निकलने में हलकी
सी वेदना हो तथा मांस के पानी के समान हो तो वात प्रदर सम-
झना चाहिए। रक्त पीले रंग का, नीला, सफेद या लाली लिए हुए
गर्म तथा अधिक मात्रा में निकले, शरीर में दाह भी हो तो पित्त
प्रदर समझो। गांद की तरह लसदार रुधिर निकले और उसका
रंग पीला अथवा गुलाबी रंग का हो तो कफप्रदर जानो । शहद के
समान, घी के समान, मुर्दे की सी गन्धयुक्त रुधिर निकलना सन्नि-
पात प्रदर यानी त्रिदोषयुक्त प्रदर का लक्षण है । रक्त और पित्त
के विकार से उत्पन्न होने वाले को रक्त प्रदर कहते हैं। शरीर का
कृष होना, मूर्छा आना, भ्रम होना, आँखों के सामने अँधेरा छा
असली कोकशास्त्र २१३
जाना, देह का टूटना, शरीर में जलन होना, प्यास अधिक लगना,
मन्दाग्नि होना, अजीर्ण होना इसके चिह्न हैं ।
इसके लिए बहुत सी औषधियाँ वैद्यक ग्रन्थों में लिखी गई हैं,
फिर भी प्रसंगानुसार यहाँ कुछ औषधियों का लिख देना आवश्यक
जान पड़ता है ।
वात प्रदर के लिए यत्न—मुलहठी, जीरा, कमलगट्टा, काला
नमक, छः छः माशे लेकर काढ़ा बना ले, बाद ऊपर से शहद मिला
कर पी ले। इसके सेवन से वात प्रदर दूर हो जाता है ।
पित्त प्रदर के लिए यत्न—छः छः माशे मुलहठी और मिश्री
को चावल के पानी में पीसकर सबेरे ही पी लिया करे ।
सब तरह के प्रदर रोग की औषधि—सुपारी के फूल, पिस्ते के
फूल, मँजीठ, सिरयाली के बीज, ढाक वृक्ष की गोंद, इन सबको
चार चार माशे लेकर बूक डाले और उसे फाँक कर ऊपर से थोड़ा
सा पानी पी ले। इसके सेवन से सफेद, पीला, स्याह, दुर्गन्धयुक्त
सब तरह के प्रदर रोग जड़ से नष्ट हो जाते हैं । अथवा, १ तोला
फालसा वृक्ष की छाल, रात को पानी में भिगो दे । बर्तन मिट्टी का
और कोरा होना जरूरी है । सबेरे उस पानी में मिलाकर उपरोक्त
दवा को पी जाय । इस दवा को पन्द्रह दिन तक करे । या कसेला,
माजूफल, पुरानी सुपारी, धाय के फूल, गोंद और लोध, इन सबको
पाव पाव भर तथा मँजीठ ३ तोला मोचरस ३ तोला, मेदा लकड़ी
३ तोला, सोंठ ३ तोला, सबको कूट-छानकर सेर भर घी में भिगो
२१४ असली कोकशास्त्र
दे। बाद दो सेर मिश्री की चासनी में इनके छटाँक छटाँक के लड्डू
बना डाले। प्रतिदिन सबेरे एक लड्डू खाने से सब तरह के प्रदर
रोग दूर होते हैं।
रक्त प्रदर के लिए यत्न—आम की गुठली का चूर्ण करके घी,
चीनी और मैदा के साथ इसे पका कर हलुआ बनाकर खिलाना
हितकर है। या कुकरौंधा नामक बूटी को जड़-सहित कुचल कर
एक तोला स्वरस निकाल लो, बाद उसमें शहद मिलाकर सुबह
शाम सेवन करो। इससे भी रक्तप्रदर जल्द शान्त हो जाता है।
यह तो हुआ प्रदर रोग का परिचय। अब प्रमेह की व्याख्या
देखिये। हम पहले ही कह आये हैं कि यह रोग पुरुषों को हुआ
करता है। यह भी प्रदर रोग की तरह निर्बलता के कारण ही
उत्पन्न होता है। यह रोग बड़ा ही भयंकर है। इसके उत्पन्न होते
ही यदि चिकित्सा नहीं की जाय तो यह जड़ पकड़ लेता है और
कुछ ही दिनों में मधुमेह के रूप में परिवर्त्तित होकर असाध्य हो
जाता है। फिर तो यह जीवन का अन्त किये बिना विश्राम ही नहीं
लेता। इस लिए प्रमेह की दवा करने में आलस्य करना जीवन से
हाथ धोना है।
मिहनत न करने से, हस्त-मैथुन करने से, गुदा मैथुन करने से,
अप्राकृतिक मैथुन करने से, अधिक स्त्री-प्रसंग करने से, दिन-रात
खूब सोने से, मादक वस्तुओं के सेवन करने से तथा मांस खाने से
यह संहारकारी भयंकर रोग पैदा होता है।
असली कोकशास्त्र २१५
प्रमेह के लक्षण
यह रोग जब होने वाला होता है, तब पहले दाँतों में मैल
अधिक जमने लगती है। कण्ठ जीभ और तालू में भारीपन मालूम
होने लगता है, हाथ पैर में जलन शुरू हो जाती है, मुँह में मिठास
होती है, प्यास अधिक लगती है, बाल आपस में चिपक जाते हैं,
तथा समूचे शरीर में चिकनाहट आ जाती है। आयुर्वेद के ग्रन्थों
में यह रोग २० तरह का बतलाया गया है। कफज १० पित्तज ६
और वातज ४ प्रकार का होता है।
कफज प्रमेह
इक्षु प्रमेह—पेशाब गन्ने के रस की तरह मीठा होता है। यह
याद रहे कि हर प्रमेह में पेशाब के आगे पीछे या पेशाब में मिल-
कर वीर्य गिरता है। किसी किसी प्रमेह में तो उसका गिरना प्रतीत
होता है और किसी किसी में बिलकुल दिखलायी नहीं पड़ता।
सान्द्र प्रमेह—यदि रात को पेशाब किसी बर्तन में रख दिया
जाय और सबेरे वह बिलकुल गाढ़ा हो जाय तो समझना चाहिए
कि सान्द्र प्रमेह है।
उदक प्रमेह—पेशाब एकदम सफेद, शीतल, गन्धहीन, थोड़ा
और चिकना होता है।
शुक्र प्रमेह—पेशाब वीर्य के समान होता है।
२१६ असली कोकशास्त्र
सुरा प्रमेह—पेशाब ऊपर से शराब की तरह साफ और नीचे
गाढ़ा होता है ।
पिष्ट प्रमेह—पिसे हुए चावल के पानी के समान और अधिक
पेशाब होता है । मूत्र-त्याग करते समय रोमाञ्च हो आता है ।
शीत प्रमेह—पेशाब मीठा और अधिक होता है तथा ठण्ढक
बहुत रहती है ।
सिकता प्रमेह—पेशाब में बालू के समान कड़े कण गिरते हैं ।
शीशी में रखने से ये कण मालूम होते हैं ।
शनैर्मेह—पेशाब थोड़ा और रुक रुक कर उतरता है ।
लार प्रमेह—मुख की लार के समान चिकना पेशाब उतरता है ।
पित्तज प्रमेह
मांञ्जिष्ठ प्रमेह—पेशाब का रंग मजीठ के काढ़े के समान और
दुर्गन्धयुक्त होता है ।
रक्त प्रमेह—पेशाब खून के समान लाल, खारा और दुर्गन्ध-
युक्त होता है ।
हरिद्र प्रमेह—पेशाब करते समय जलन होती है और उसका
रंग हल्दी की तरह पीला होता है ।
नील प्रमेह—नीले रंग का पेशाब होता है ।
क्षार प्रमेह—खारे जल के समान वर्ण, रस, स्पर्श और गन्ध
का पेशाब होता है ।
काल प्रमेह—काले रंग का पेशाब होता है ।
असली कोकशास्त्र
चित्र नं० ७
शंखिनी स्त्री
कामशास्त्र
[पहला भाग]
असली कोकशास्त्र २१७
वातज प्रमेह
वसा प्रमेह—चर्बी के समान पेशाब होता है ।
मज्जा प्रमेह—मज्जा मिला हुआ पेशाब होता है ।
क्षौद्र प्रमेह—शहद के रंग का, मीठा, रूखा और कषैला
पेशाब होता है । यह पेशाब जहाँ गिरता है, वहाँ चींटियाँ और
मक्खियाँ आ जाती हैं ।
हस्ति प्रमेह—रुक रुक कर तारदार और हाथी के मद जैसा
पेशाब होता है । कभी कभी पेशाब रुक भी जाता है ।
──:०:──
प्रमेह नष्ट के उपाय
१—छः माशे महुआ वृक्ष की छाल को ४ दाने काली मिर्च
के साथ पानी में पीस छानकर पीने से सब प्रकार के प्रमेह नष्ट
होते हैं ।
२—आँवला, हड़, और बहेड़े का चूर्ण १ तोला, शहद मिला-
कर चाटने से पुराना प्रमेह नष्ट हो जाता है ।
३—शुद्ध लौह-भस्म, शहद के साथ चाटने से प्रमेह जाता
रहता है । मात्रा बलाबल देखकर निर्धारित करनी चाहिए ।
४—शुद्ध वङ्ग-भस्म दो रत्ती जाड़े के दिनों में तो किसी
साधारण गर्म चीज के साथ या केले के साथ और गर्मी के दिनों में
२१८ असली कोकशास्त्र
कुम्हड़े के मुरब्बे के साथ सेवन करने से सब तरह के प्रमेह नष्ट
हो जाते हैं ।
प्रदर या प्रमेह के रोगी को लाल मिर्च, खट्टी मीठी तथा
कड़वी चीजें बादी और गरिष्ट वस्तुएँ भूलकर भी न खानी चाहिएँ ।
मैथुन करना भी एकदम छोड़ देना उचित है । दवा का सेवन करते
समय पूर्णरीति से ब्रह्मचारी बन जाना उचित है । तभी यह रोग
दूर हो सकते हैं, अन्यथा दवा का सेवन करना व्यर्थ हो जाता है ।
सौ दवाओं से बढ़कर एक परहेज से रहना है ।
-:०:-
बल वीर्य बर्द्धकमहौषधि
इस प्रकरण में कुछ ऐसी औषधियाँ लिखी जायँगी, जिनसे
शरीर में काफी बल-वीर्य की वृद्धि हो सकती है । किन्तु ये दवायें
सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए हैं, जो दुराचार करके अधिक वीर्य क्षीण
कर चुके हैं । यों तो ये औषधियाँ सबके लिए लाभदायक हैं, पर
संयमी और हृष्ट पुरुष को इनके करने की आवश्यकता ही क्या
है ? संयमी पुरुष को तो जी-जान से बस एक ही दवा का सेवन
करना चाहिए, बस वही संयम । संयम से बढ़कर दूसरी दवा
संसार में कोई भी नहीं है ।
१—जिस मनुष्य का धातु कम हो गया हो । उसे इस दवा
का सेवन करना चाहिए—धाय के फूल, बड़ी हड़, बहेड़ा और
असली कोकशास्त्र २१६
आँवला। इन चारों चीजों को बराबर बराबर लेकर ईख के रस में
भावना दे। बाद धूप में सुखा कर उसी के बराबर मिश्री मिला
शहद में रात को चाटे और ऊपर से शुद्ध शुद्ध दूध पी ले। इससे
बल-वीर्य की वृद्धि होती है।
२—कौंच वृक्ष की जड़ दूध में पीसकर प्रति दिन सबेरे पीने
से भी पुरुष का शरीर बलवान हो जाता है और खूब वीर्य पैदा
हो जाता है।
३—कौंच वृक्ष की जड़, सफेद तिल, असगन्ध, विदारी कन्द,
सांठी चावल, इनको बराबर बराबर लेकर कूट डाले। बाद कपड़े
से छानकर प्रति दिन ६ माशे चूर्ण खाकर ऊपर से गरम दूध में
घी डालकर पी ले। इसका एक महीने तक सेवन करने से शरीर
में विचित्र परिवर्त्तन हो जाता है। हमेशा सेवन करे तो और
भी अच्छा हो।
४—सूखे आँवले का चूर्ण ईख के रस में भिगोकर छाया में
सुखा ले। इस प्रकार सात बार रस में भिगोकर सुखा ले। बाद
उसके बराबर शहद और मिश्री मिलाकर पका डाले और उसका
प्रति दिन सेवन करे। यह दवा स्त्री और पुरुष दोनों के लिए एक
समान गुणकारी है।
५—शतावरी तेल बनाने की रीति—हरी शतावर को कूट कर
२ सेर रस निकाल लेना चाहिए। बाद उसमें एक सेर तिल का
तेल और ४ सेर गोदुग्ध डालकर मन्दाग्नि से धीरे धीरे पकावे
२२० असली कोकशास्त्र
इन दवाइयों को एक एक तोला लेकर कल्क बनाकर उसमें पकते
समय ही डाल देना चाहिए । सौंफ, देवदारु, बालछड़, छालछरीला,
बच, लाल चन्दन, तगर, कूट, इलायची, अंशुमती, खरेटी, रासना,
असगन्ध, वायविडंग, स्याह मिच, पीलपर्णी, दालचीनी, पत्रज,
रेडी की जड़ का छिलका, सेंधा नमक और सोंठ । थोड़ी देर के
बाद अदरख का अर्क डाल देना चाहिए । जब पक जावे, तब उसे
उतार ले और स्वच्छ पात्र में छानकर रख दे । फिर इस तेल का
मर्दन करे । यह तेल इतने रोगों पर जादूकी तरह असर करता है—
जो कुबड़े हों, बौने हों, पंगुल हों, महावात रोग से भग्न हों
या विसर्प रोग से पिडित हों, उनके लिए यह तेल बड़ा लाभ-
दायक है । शरीर के संकुचित हो जाने में, सन्निपात में गठिया में,
हृदय शूल में, यह तेल तत्क्षण गुण दिखलाता है । गले के भीतर
होने वाले सब रोगों का यह तेल नाश करता है । वीर्य-हीनता,
नपुंसकता, चित्तभ्रम, इन्द्रिय निर्बलता, बुद्धिहीनता, मन्दाग्नि को
यह फौरन दूर कर देता है । वन्ध्यात्व को भी यह दूर करने में
समर्थ है । प्रमेह रोग, अंडवृद्धि रोग, पिल्ली रोग, समलवाय, मृगी,
कुष्ठ, दाह, ज्वर आदि रोगों को भी यह तेल नष्ट कर देता है ।
इस तेल को एक महीने तक पीने से वृद्ध मनुष्य भी यौवनत्व
प्राप्त कर सकता है । इस तेल को सूँघने, पीने और मालिश करने
में नित्य बर्त्तना चाहिये । यह शतावरी तेल स्त्री और पुरुष दोनों
के लिए लाभदायक है ।
३. परिच्छेद ९-१२: विचित्र रति-बन्ध, विविध आसन, कन्या-वरण एवं प्रीति-संवर्धन
असली कोकशास्त्र १२१
६—सफेद् घुँघची का कपड़छान किया हुआ चूर्ण दूध के
साथ सेवन करना भी वीर्य के लिए बड़ा गुणकारी है ।
७—मुलहठी का चूर्ण एक तोला घी मिलाकर शहद् में चाटे
और ऊपर से दूध पी लिया करे तो बड़ा ही लाभ हो ।
८—गोखरू, तालमखाना, सफेद् मुसरी, कौंच के बीज,
गंगेरण की छाल और सहदेई जड़ी की जड़, इन सब चीजों को
कूट-कपड़छान कर चूर्ण के बराबर की मिश्री मिला प्रतिदिन दूध के
साथ सेवन करना चाहिए ।
९—गरम दूध में घी डालकर प्रतिदिन सेवन करना भी बड़ा
ही बलवर्द्धक है ।
१०—सिम्बल की मुसली का रस ४ तोला लेकर उसमें एक
तोला मिश्री मिलाकर पी जाया करे । यह दवा सात दिन में ही
प्रभाव दिखलाती है ।
११—शतावर, गोखरू, डाभ की जड़, सिंघाड़ा, गंगेरण की
छाल, कौंच के बीज, इनको सम मात्रा में कूट-कपड़छान कर
बराबर की मिश्री मिला एक तोला चूर्ण रोज रात को फाँक कर
ऊपर से दूध पी लिया करे तो वीर्य पुष्ट हो और शरीर में ताकत
आवे ।
—:०:—
२२२ असली कोकशास्त्र
गर्भ ज्ञान
गर्भ स्थिति हो गयी या नहीं, यह जानने के लिए पहला चिह्न
तो यह है कि जब गर्भ रह जाता है तब किसी किसी स्त्री का जी
दूसरे ही दिन मिचलाने लगता है, मुख का रंग बदल जाता है,
शरीर में भारीपन आ जाता है। सबसे अच्छी पहचान महीनेभर
में होती है। वह इस तरह कि यदि मासिकधर्म टल जाय, तब
समझ लेना चाहिए कि गर्भ रह गया। क्योंकि गर्भ स्थित हो जाने
पर ऋतुधर्म बन्द हो जाता है। किन्तु जिन स्त्रियों का मासिक-धर्म
अनियमित रूप से होता है उनके लिए यह लक्षण ठीक नहीं है।
गर्भ रहने पर स्वाभाविक ही भोजन में अरुचि हो जाती है, शरीर
में आलस्य आता है कोई काम करने को जी नहीं चाहता, पुरुष
की ओर से भी रुचि हट जाती है, उल्टी होने लगती है, झूठी
ओक भी आती है, लेटने के लिए इच्छा करती है, कमर के नीचे
सुस्ती अधिक आ जाती है, कभी-कभी सिर भी दुखने लगता
है। गर्भिणी को खट्टा तथा मीठी चीजें खाने के लिए बहुत
उत्सुक रहती है। दस्त खुलासा नहीं होता, नींद अच्छी तरह नहीं
आती, स्तनों के मुख छोटे हो जाते हैं और उन पर श्यामलता
छा जाती है। गर्भ के पहचानने की रीति एक यह भी है कि
थोड़ा सी शहद पानी में मिलाकर पी लेने पर यदि थोड़ी देर के बाद
टूँड़ी में कुछ दर्द होने लगे तो समझना चाहिए कि गर्भ अवश्य है
असली कोकशास्त्र २२३
ओर यदि दर्द न हो तो जान ले गर्भ कदापि नहीं है । इस पहचान
से बढ़कर कोई भी पहचान नहीं है ।
संयोग के बाद ही पुरुष से तृप्ति, गर्भाशय में भारीपन, थक-
वट, छाती का फड़कना, रोम खड़े हो जाना आदि मालूम
होता है ।
कितनी ही स्त्रियों को तो गर्भ रहने के २-४ दिन बाद ही कै होने
लगती है और कितनी को मासिक-धर्म टलने के बाद यह चिह्न
दिखलायी पड़ता है । किन्तु बहुत सी स्त्रियाँ गर्भ धारण करते हुए
भी इन दोनों बातों से बरी रहती हैं; उनके सिर्फ मुख में थूक
अधिक आता है । ढाई-तीन महीने का गर्भ हो जाने पर स्तनों का
आकार भी बढ़ने लगता है; किन्तु बहुत-सी स्त्रियों के स्तन में
चार-पाँच महीने तक कोई परिवर्त्तन ही नहीं होता । तीसरे महीने
से गर्भिणी का पेट भी बढ़ने लगता है और नाभि का गढ़ा धीरे-
धीरे भरने लगता है । छः महीने तक गर्भ नाभिके नीचे रहता है,
बाद सातवें महीने से वह ऊपर चढ़ने लगता है । कभी-कभी रोग
से भी पेट बढ़ जाता है । इसकी खास पहचान यह है कि गर्भ
से बढ़ने वाला पेट बीच में ऊपर को कुछ उठा हुआ रहता है और
रोग से बढ़ा हुआ पेट सर्वत्र समान रूप से बढ़ता है । चार-पाँच
महीना बीत जाने पर तो गर्भ की पहचान और भी अधिक स्पष्टता
से की जा सकती है । क्योंकि फिर तो पेट में बालक का फड़कना
मालूम होने लगता है । किन्तु कई स्त्रियों के पेट में छः सात
२२४ असली कोकशास्त्र
महीने तक किसी प्रकार की फड़कन नहीं प्रतीत होती । भूख-
प्यास की अवस्था में गर्भ अधिक डोलता है ।
—०—
गर्भस्थ पुत्र पुत्री का ज्ञान
पेट में बालक पहले ही महीने में गोल जान पड़ता है ।
दाहिनी आँख कुछ बड़ी सी दीखती है। गर्भ में लड़का रहने पर
दाहिनी जंघा भी मोटी और भारी मालूम होती है। उसमें कुछ
दर्द भी हुआ करती है। दाहिने स्तन में दूध पहले उतरता है, मुख
का रंग अच्छा रहता है। स्वप्न में पुल्लिंग वस्तुएँ ही दिखलायी
पड़ती हैं, यदि मनुष्य का स्वप्न भी होता है तो पुरुष का ही ।
यदि गर्भवती के दूध में जूँ अथवा चींटी डालने पर वे जीती रहें
और चलती फिरती नजर आवें तो समझना चाहिए कि पुत्र उत्पन्न
होगा और यदि मर जाय तो कन्या की उत्पत्ति होगी । लड़का
दाहिनी कोख में रहता है। गर्भ में लड़का रहने पर स्त्री जो-कुछ
भी कार्य करेगी, वह दाहिने अंग से ही प्रारम्भ करके। यदि चलेगी
तो पहिले दाहिना पैर उठेगा, उठेगी तो दाहिना हाथ टेक कर
इत्यादि ।
यदि पेट में कन्या होती है तो स्त्री का मस्तक भारी रहता है,
तथा स्तनों का दूध पतला होता है। गर्भिणी के मुख का रङ्ग पीला
रहता है। इसके सिवा पुत्र के लक्षणों के ठीक विपरीत सब लक्षण
दिखलायी पड़ते हैं ।
१५ असली कोकशास्त्र २२५
यदि गर्भवती स्त्री को राजा का दर्शन करने की इच्छा
निरन्तर हुआ करे तो समझना चाहिए कि महा भाग्यशाली और
धनी सन्तान पैदा होगी । भूषण तथा रेशमी वस्त्र धारण करने
की इच्छा होने पर सुन्दर और शौकीन तबीयत की सन्तान पैदा
होती है । देव-मन्दिरों में जाने, महात्माओं के दर्शन करने तथा
धार्मिक कथायें सुनने की इच्छा होने पर शान्त स्वभाव की और
धर्मपरायण सन्तान पैदा होती है । साँप, सिंह आदि हिंसक
जानवरों के देखने की इच्छा होने पर हिंसक सन्तान उत्पन्न होती
है। किन्तु इसमें कभी-कभी सन्देह भी रह जाता है, पर पाँचवें महीने
में गर्भवती की जो इच्छा होती है, उससे अच्छी-बुरी सन्तान
भलीभाँति जानी जाती है और वह जानकारी कभी भी झूठी नहीं
होती—सदा सत्य उतरती है । इसका कारण यह है कि इसी
पाँचवें महीने में गर्भस्थ सन्तान में जीव का प्रवेश होता है ।
पुत्र-कन्या पहचानने की एक और रीति है, इसकी सैकड़ों
बार परीक्षा ली गयी है, एक बार भी झूठी नहीं हुई । वह यह है
कि यदि किसी स्त्री के गर्भ का बालक जानना हो तो भँड़भाँड़
नाम की बूटी को सन्ध्या समय स्नान करा रक्षा लपेट शान्त-चित्त
हो कह आवे कि "हे प्रभो, मैं इसे कल यह जानने के लिए उखाडूंगा
कि अमुक स्त्री के गर्भ में पुत्र है या कन्या।" यह कहकर
चला आवे । दूसरे दिन स्नानादि से निवृत्त होकर जाय और उसे
उखाड़ ले । (उसके काँटे अधिक कड़े हों तो कई तह करके कपड़े
२२६ असली कोकशास्त्र
लगाकर उखाड़ ले ) यदि सीधी एक जड़ निकले तो पुत्र और दो
जड़ निकलने पर कन्या जाने । किन्तु यदि वह जड़ ऊपर से ही
टूट जाय तो समझना चाहिए कि सन्तान पैदा होकर मर जायगी
या जियेगी भी तो बहुत ही कम दिनों तक । प्रसव वेदना के समय
इसकी जड़ कपड़े में लपेट कर स्त्री की कमर में बाँध देने से तत्क्षण
प्रसव हो जाता है, जरा भी देर नहीं लगती । किन्तु यह जड़ी
तभी बाँधनी चाहिए जब यह अच्छी तरह से मालूम हो जाय कि
अब प्रसव होने में कुछ ही समय की देर है ।
—:०:—
गर्भरक्षा के उपाय
गर्भरक्षा के उपाय बतलाने के पहले यह बतलाना आवश्यक
प्रतीत होता है कि बालक गर्भ में किस प्रकार रहता और क्रमशः
बढ़ता है । गर्भाधान से चार महीने तक गर्भाशय का मुख बन्द
रहता है । ज्यों ज्यों गर्भ बढ़ता जाता है, त्यों त्यों गर्भाशय भी
बढ़ता जाता है और अंडाकार होकर नीचे को खिसकता आता
है । छठे महीने गर्भाशय की नार बहुत छोटी और चिपटी होकर
फैल जाती है । आठवें महीने में बिलकुल चिपटी हो जाती है ।
कभी तो सातवें महीने से ही और कभी नव महीने से गर्भाशय का
मुख खुलने लगता है और बालक उत्पन्न होने के समय एकदम
खुल जाता है ।
असली कोकशास्त्र २२७
गर्भाधान हो जाने पर पहले महीने में वीर्य जमता है । दूसरे
महीने में उस पर पतली झिल्ली चढ़ती है । तीसरे महीने में शरीर
का आकार बनने लगता है । चौथे में पूरा शरीर बन जाता है ।
पाँचवें महीने में हृदय और जीव पड़ता है । छठे और सातवें महीने
में बालक का शरीर पुष्ट होता है । गर्भस्थ बालक पेट में उकरू बैठा
हुआ दोनों हाथों को पैरों से मिलाये रहता है । उसके दोनों घुटने
छाती और पेट से लगे होते हैं और उसका माथा उन्हीं घुटनों के
बीच में रहता है । यदि पुत्री रहती है, तब तो उसका मुख माँ की
पीठ की ओर होता है और यदि पुत्र होता है तो उसका मुख माँ
के पेट की ओर रहता है । गर्भस्थ बालक अपने हाथों की अँगुलियों
से आँख, कान, नाक और मुख मूंदे रहता है । इसका कारण यह
है कि जिन सात झिल्लियों के भीतर गर्भाशय में बालक रहता है,
उसमें एक प्रकार का ऐसा पानी होता है कि यदि वह बालक की
आँख से छू जाय तो सूर, कान में चला जाय तो बहिरा, मुख में
जाय तो गूँगा, पेट में जाय तो मुर्दा और मस्तक में जाय तो वह
पागल हो जाता है । इसलिए दयालु परमात्मा ने अपने सब छिद्र
मूँद रखने की शक्ति बालक को प्रदान की है ।
बच्चे का कौन-सा अङ्ग पहले बनता है इस विषय में विद्वानों
का कथन भिन्न-भिन्न प्रकार का है । कोई तो कहता है कि शारी-
रिक इन्द्रियों का मूल स्थान मस्तक है और इसकी रचना पहले
होती है ; कोई कहता है, हृदय, बुद्धि और मन है, इसलिए सबसे