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रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

१२ असली कोकशास्त्र
महाराज ने कहा,—तो हम ऐसी स्त्रियों का क्या प्रबंध कर
सकते हैं ?
मंत्री ने कहा,—रति-शास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थों का मैंने अध्ययन
किया है। सम्भव है मैं इसे सन्तोष दिला सकूँ। बाह्य-रति इसका
परम औषध है। आगे आपकी जैसी इच्छा हो।
उस कामिनी ने कहा,—मेरा अभी विवाह किसी से नहीं हुआ
है। मैं विवाह की इच्छा से ही बाहर निकली हूँ। मैंने जिस जिस
वर को चुना, उसी ने मेरी प्रतिज्ञा को सुनकर मुझसे विवाह करने
से इनकार कर दिया। सम्भव है मेरी उस प्रतिज्ञा तथा उसका
कारण जानने की इच्छा आप को भी हुई होगी। इस लिये मैं
उसे स्पष्ट किये देती हूँ।
जब मैं विवाह योग्य हुई, मेरे घर पर विवाह के पैगाम आने
लगे। मेरी बहुत सी मिलनसार सखियें थीं, जिनकी गोद में एक-
एक दो-दो सन्तानें खेल रही थीं। उन्होंने कहा,—तुम हमारा
कहा मानो तो विवाह मत करो, नहीं तो पछताभोगी। क्योंकि
हमारा तुम्हारा एक ही स्वभाव है। विवाह से तुम्हें सुख नहीं
मिलेगा। यदि तुम्हें सन्तान की इच्छा हो तो हमसे सन्तान गोद
लेकर पाल-पोष सकती हो।
तब मैंने कहा,—क्या विवाह सन्तान-सुख के लिये ही किया
जाता है ? और कोई प्रयोजन नहीं ?
तब सखियों की ओर से मुझे यह जवाब मिला कि हाँ, शास्त्र

असली कोकशास्त्र १३
मर्यादा तो यही है, किन्तु तुम्हारी अभिलाषा भी हम समझती हैं।
धर्म-मर्यादा में रहते हुए उसका पूरा होना कठिन है। क्योंकि
लिखा है—“काम अष्टगुणः स्मृतः ।” अर्थात् स्त्रियों में आठ
गुना काम होता है। उसे दबाने के लिये अष्टगुणी कामी पुरुष की
आवश्यकता है। जिसका मिलना असंभव है। धर्म-मर्यादा में एक
पति से अधिक हो नहीं सकता, इस लिये काम शान्ति हो
नहीं सकती। अतएव हम सब पछता रही हैं और तुम्हें सावधान
करती हैं।
सखियों का ऐसा कथन सुनकर मैंने ऐसी प्रतिज्ञा की कि जब
तक मेरी इच्छा पूर्ण करने वाला कोई वर नहीं मिलेगा तब तक मैं
विवाह ही नहीं करूँगी। सो बराबर कई वर्ष से अनुकूल वर की
खोज में घूम रही हूँ किन्तु अभी तक जब कोई नहीं मिला तब
मैंने सोचा शायद राज-द्वार में मिल जाय। इसी लिये यहाँ आयी
थी, किन्तु अष्टगुणी पुरुष...
कोका पण्डित ने बीच ही में रोककर कहा,—तुम्हारे द्वार
में आते ही प्रश्नोत्तर से मैंने निश्चय कर लिया था कि तुम हस्तिनी
जाति की स्त्री हो। रहा अष्टगुणा कामी पुरुष, सो उसका मिलना
नितान्त असंभव है। किन्तु तुम निराश न हो। तुम्हारी आशा
पूरी हो जायगी। स्त्री की इच्छा पूरी करने के लिये अधिक कामी
पुरुष की आवश्यकता नहीं, केवल कुछ क्रियाओं का ज्ञान होना
चाहिये।

१४ असली कोकशास्त्र

महाराज ने कहा,—अच्छा तो आप इसको सन्तुष्टि का साधन
बतला दें ।
कोका पण्डित ने रमणी से कहा,—तुम मेरी एक बात मानोगी ?
रमणी ने कहा,—हाँ मानने योग्य होगी तो अवश्य मानूँगी ।
मन्त्री ने कहा,—तुम अपने सदृश्य रूप-यौवन-सम्पन्न किसी
पुरुष से विवाह कर लो। मैं तुम्हारी तृप्ति उसी पुरुष से करा
दूँगा, यह मेरी प्रतिज्ञा है। यदि मैं तुम्हारी इच्छा पूरी न करा
सकूँगा, तो मन्त्री पद का त्याग कर दूँगा। मुझे विवाह से पूर्व उस
पुरुष को दिखा देना। अस्तु, घर का पता राज-दर्बार में लिखा दो
और घर जाओ ।
रमणी मन्त्री के कथनानुसार दर्बार से चली गयी ।
[ ४ ]
एक वर्ष के बाद गोद में बालक लिये एक रमणी ने दर्बार में
प्रवेश किया। उसके साथ एक खूबसूरत नौजवान आदमी भी था।
रमणी ने महाराज को सनम्र झुककर प्रणाम किया और बोली,—
महाराज की जय हो !
महाराज ने कहा,—क्या पारसाल दर्बार में आप ही आयी थीं ?
रमणी ने कहा,—हाँ महाराज ! मैं ही आयी थी। आपके
प्रधान मन्त्री कोकापण्डित जी की वाणी सत्य हुई। आज मैं
अपनी सखियों के साथ बड़े सुख से हूँ। मेरी सखियाँ भी पंडित
जी के बताये उपाय से काम ले रही हैं। उनकी भी मनोकामनायें

असली कोकशास्त्र १५
पूर्ण हो रही हैं। हम लोगों की एक सनम्र प्रार्थना है कि इन उपायों
का प्रचार सब देश में जिस प्रकार हो सके, उसके करने की आप
कृपा करें। हमारे समान अनेक दुःखित नर-नारियों का बड़ा
उपकार होगा।
महाराज ने कहा,—मुझे बड़ी खुशी हुई जो आप लोगों की
सन्तुष्टि हो गयी। कोकापणिडत बड़े विचारी पुरुष हैं। वे लोको-
पकार के लिये कुछ उठा न रक्खेंगे।
दर्बारी लोग भी बड़े प्रसन्न हुए। उनकी श्रद्धा भी कोका
पणिडत के प्रति बहुत बढ़ गयी।
[ ५ ]
कुछ वर्षों के बाद कोका पणिडत ने 'कोक मञ्जरी' नामक एक
ग्रन्थ लिखकर महाराज के हाथ में दिया। महाराज ने उसे आद्यो-
पान्त पढ़ा। पढ़कर बड़े प्रसन्न हुए और बोले—कोक मंजरी के
बजाय इसका नाम “कोकशास्त्र” रक्खा जाय तो अच्छा है, क्योंकि
आपके 'कोक मंजरी' शब्द का तात्पर्य आपसे किये हुए अनेक मतों
का संग्रह है। आपने दूसरे मतों का दिग्दर्शन अवश्य कराया है।
किन्तु उनकी तरकीब और अनुभवी ओषधियों का योग आपकी
कृति है। इस लिये दूसरों के लिये वही शासन का बनाने वाला
सिद्ध होगा। सच तो यह है कि मुझे कोकशास्त्र नाम ही अधिक
प्यारा प्रतीत होता है।

१७ असली कोकशास्त्र
कोका पण्डित ने कहा,–जैसी आपकी इच्छा। मुझे कोई
एतराज नहीं।
उस दिन से यह ग्रन्थ कोकशास्त्र के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
इसमें जिन सुगम उपायों का वर्णन किया गया है, वह पढ़ने से ही
मालूम हो सकता है। यद्यपि इनमें भी वाममार्गियों ने बहुत कुछ
मेल-जोल किया, जैसे चौरासी आसन आदि। किन्तु यदि संशो-
धन पूर्वक काम लिया जाय तो किसी प्रकार की हानि नहीं हो
सकती।
कोका पण्डित का यह संक्षिप्त जीवन पाठकों की भेंट किया
गया। आगे कोकशास्त्र के सम्बन्ध में लिखा जायगा। शमिति।

२ असली कोकशास्त्र १७
कोकशास्त्र का प्रयोजन
धर्मार्थकाममोक्षाणां शरीरं साधनं यतः।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन सब का साधन शरीर ही है।
प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह इस मल-मूत्र वाही शरीर से
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार अमूल्य रत्नों को उत्पन्न करे।
जो मनुष्य इन चारों में से एक को भी धारण नहीं करता, शास्त्र-
कारों ने उसका जन्म बिल्कुल ही निरर्थक कहा है। जैसे—
धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोपि न विद्यते।
अजा गलस्तनस्येव तस्य जन्मनिर्थकम् ॥
मनुष्य के शरीर में जितनी भी इन्द्रियें हैं, वे किसी न किसी
काम को अवश्य सिद्ध करती हैं। जैसे आँख रूप को, नाक गन्ध
को, जिह्वा रस को, काम शब्द को और त्वचा स्पर्श को बतलाती
है। इसी प्रकार हाथ, पाँव आदि कर्मेन्द्रियाँ भी समझ लेना
चाहिये। अर्थात् सम्पूर्ण शरीर का प्रयोजन धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
इन चारों वर्गों की प्राप्ति करना है। जिस प्रकार बकरी के गले में
लटकने वाले स्तन किसी भी काम में नहीं आते, ठीक उसी प्रकार
उस मनुष्य का जीवन भी व्यर्थ है जो इस चतुर्थ वर्ग में से किसी
का सेवन नहीं करता।
लोगों का ऐसा विचार है कि धर्म की अपेक्षा पहले अर्थ का

१८ असली कोकशास्त्र
संग्रह करना चाहिये। क्योंकि धन से ही धर्म हो सकता है। किन्तु
यह उनकी भूल है। कारण धर्म का नाश कर धन उपार्जन करने
वाले का धर्म नाश कर देता है। जैसे—
धर्म एव हतो हन्ति धर्मोरक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
॥ मनुः ॥
धर्म की ही रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि रक्षा किया हुआ धर्म-
रक्षा करनेवाले की रक्षा करता है ओर नाश किया हुआ धर्म नाश
करने वाले का नाश कर देता है।
इसी लिये धर्म को सब से पहले स्थान दिया गया। धर्म का
अर्थ धारण करनेवाला है। जिस प्रकार अग्नि में दाह ओर रूप
उसका धर्म होता है, जब तक ये दोनों विद्यमान रहते हैं तब तक
उसके पास शेर तक के आने की भी हिम्मत नहीं होती। उन दोनों
के निकल जाने पर जब राख शेष रह जाती है, तब उस पर छोटी से
छोटी चींटी भी पाँव देकर निकल जाती है। इसी प्रकार धर्म के
रहते वस्तु की सत्ता रहती है और उसके नाश होते ही वस्तु की
सत्ता का भी अभाव हो जाता है।
धर्मपूर्वक सञ्चित किये हुए धन से ही धर्म किया जा सकता
है। अधर्म से उत्पन्न किये हुए धन से धर्म नहीं हो सकता ! क्यों
कि चोर चुराये हुए धन का यदि दान कर दे तो उसे क्या चोरी

असली कोकशास्त्र १६
की सजा न मिलेगी ? इस लिये धर्मपूर्वक ही धनोपार्जन करना
चाहिये ।
धर्मपूर्वक जो अर्थ सञ्चित किया जाता है, उसी से सब काम
नायें पूरी करनी चाहियें । जो इस क्रम से वर्त्तता है, वही पुरुष
मोक्ष को प्राप्त होता है ।
काम के अर्थ इच्छा और रति लिये जाते हैं । धर्म की खोज
के लिये अनेक शास्त्र लिखे गये । अर्थोपार्जन करने के लिये भी
अनेक उपाय बतलाये गये । मोक्ष प्राप्ति के लिये भी अनेक साधन
शास्त्रों में वर्णन किये गये । इनमें किसी को भी किसी प्रकार का
विवाद एवं शंका करने की गुञ्जाइश नहीं मिली ।
किन्तु काम के सम्बन्ध में जब कभी विचार किया जाय तो
इसे बड़ी उपेक्षा की दृष्टि से यह कहकर टाल देते हैं कि इसमें
रक्खा ही क्या है ? यह तो सहज-प्रकृति है । यह बिना समझाये-
बुझाये ही सबको आ जाता है । किन्तु देखा जाय तो उनका यह
बड़ा ही अनर्गल विचार दिखायी देता है । क्योंकि जब किसी छोटे
से छोटे काम को भी करने के लिये मनुष्य तैयार होता है तो उसके
लिये उसे सैकड़ों सामान इकट्ठे करने पड़ते हैं । जैसे भोजन को
ही ले लीजिये । क्या मनुष्य गेहूँ उबाल कर खाने से पेट नहीं भर
सकता ? वह उसकी रोटी क्यों बनाता है । जब केवल नमक से
ही दाल का काम चल सकता है तब छौंकने की क्या जरूरत ?
गेहूँ, चना, घी, चीनी, दूध आदि पदार्थों से मनुष्य को सभी स्वाद

१. परिच्छेद १-४: पद्मिनी, चित्रिणी, शङ्खिनी, हस्तिनी एवं शश, मृग, वृष, अश्व लक्षण

२० असली कोकशास्त्र
मिल सकते हैं, तब वह मलाई, रबड़ी, लड्डू, पेड़ा आदि अनेकों
प्रकार की मिठाइयाँ क्यों बनाकर खाता है ? सामान्य वस्त्र से
शीत निवारण किया जा सकता है, फिर ऊनी, रेशमी आदि नाना-
विध वस्त्रों की क्या आवश्यकता ? सामान्य कुटिया में गर्मी, सर्दी
की निवृत्ति की जा सकती है, फिर महल-अटारियों की क्या जरूर-
रत ? इससे स्पष्ट प्रकट होता है कि मनुष्य प्रत्येक वस्तु का उप-
भोग बड़ी खूबसूरती के साथ करना चाहता है ।
जब इन छोटे छोटे कामों के लिये इतने विचार की आवश्य-
कता है, तब इस 'काम' जैसे महत्वपूर्ण विषय की उपेक्षा करना
कितनी भारी गलती है। जिस मनुष्य-शरीर के लिये समस्त
दुनियाँ के प्रपंच किये जाते हैं, उसकी रचना के लिये किसी भी
उच्च ज्ञान की आवश्यकता नहीं, ऐसा समझना कितनी अदूरदर्शिता
की बात है !
यही कारण है कि आज छोटे से लेकर बड़े-बड़े घरानों तक
में विषाद ही विषाद दिखायी देता है । एक आलीशान पक्की चित्र-
विचित्र रंगों से रंगी हुई लाखों रुपयों की इमारत के अन्दर एक
सुन्दर नवयौवना विवाहिता स्त्री रहती है, जिसका पति सहस्रों
रुपया माहवारी कमाता है, उस स्त्री की मनमानी मांगों को पूरी
करता है। अर्थात् वस्त्र, आभूषण, खाद्यपदार्थ आदि किसी वस्तु
की त्रुटि नहीं करता । भोजन बनाने के लिये तथा सेवा-शुश्रुषा के
लिये सेविकायें प्रस्तुत रखता है और स्वयं भी रूप-यौवन-संपन्न

असली कोकशास्त्र २१
अपनी पत्नी के समान ही है। इतना होने पर भी वह सुन्दरी अपने
महल की सुख-शय्या को छोड़कर अंधकारमयी रात्रि में चोर की
भाँति छिप-छिप कर ऐसे पर-पुरुष के पास जाती दिखायी देती है
जो जाति से नीच और आचार-विहीन होता है।
उदाहरण में भर्तृहरीजी को ही ले लीजिये । उनकी रानी को
राजमहलों में किस बात का कष्ट था ? रहने को महल, सेवा के
लिये दास-दासियाँ थीं । स्वयं उसके पति भर्तृहरी भी उसे प्राणों
से अधिक प्यार करते थे। यह किसी से छिपा नहीं है। सब कुछ
रहने पर भी वह रानी एक नीच जाति के सईस के साथ फँस
जाती है और उससे इतना अधिक स्नेह करती है कि जो अमृत-फल
महाराज भर्तृहरी को अमर करने के लिये प्राप्त हुआ था, वह
फल उन्होंने अपनी स्त्री को प्रेम-विह्वल होकर खाने के लिये दे
दिया था। किन्तु वह भी उसने खुद न खाकर सईस को अमर
रखने के लिये दे दिया ।
अब पुरुषों को लीजिये । उन्हीं सर्व-गुण-सम्पन्न अटारियों में
बसनेवाले नौजवान अपनी अपूर्व सुन्दरी आज्ञाकारिणी पत्नी को
छोड़कर रंडियों के कोठे पर जा पहुँचते हैं। वहाँ धन, बल, मान-
मर्यादा का नाश करते हुए उन रंडियों की फटकार, जूतियें खाकर
भी जबतक सर्वनाश नहीं हो जाता तबतक उसका साथ नहीं
छोड़ते ।
इसका क्या कारण ? यह विपरीत गति क्यों दिखायी दे रही

२२ असली कोकशास्त्र
है ? इससे साफ प्रतीत होता है कि उन दोनों की कामेच्छा पूर्ण न
होने से उन्हें जहाँ-तहाँ टक्करें मारनी पड़ती हैं। अब यहाँ यह
प्रश्न उत्पन्न होता है कि स्त्रियों का काम पुरुष से आठ-गुणा अधिक
होने से पुरुष उसकी तृप्ति किस प्रकार कर सकता है। कहा है—
‘काम अष्टगुणः स्मृतः ।’
इस वाक्य का अर्थ समझने में भारी भूल है। इसका यह
अर्थ नहीं कि एक स्त्री आठ पुरुषों से रति कर सकती है। स्त्री की
रति पूरी होने पर वह भी पुरुष के समान तृप्त हो जाती है। फिर
वह आठ से तो क्या, तृप्ति हो जाने पर, तृप्त पुरुष के समान फिर
एक से भी रति नहीं कर सकती।
उपरोक्त वाक्य का अर्थ यह है कि स्त्री पुरुष से अष्ट गुणा
अधिक बलवती होती है, अर्थात् आठ पुरुषों की रति के बराबर
बल लग जाने पर एक स्त्री की रति पूर्ण होती है। इतना बल
किसी विशेष ही पुरुष में होता है। अतएव स्त्री को तृप्त करने के
लिये सामान्य से सामान्य पुरुष को किन उपायों का अवलम्बन
करना चाहिये, जिससे हर पुरुष हर स्त्री को रति-सुख से तृप्त
करके सुसन्तान प्राप्त करा सके इसका परिज्ञान कराना इस कोक-
शास्त्र लिखने का प्रयोजन है। रति-सुख के सुगम से सुगम उपाय
इसमें बतलाये गये हैं।
—:*:—

असली कोकशास्त्र २३
शरीर की बनावट
हड्डी, खून, मांस और खाल से हमारा शरीर बना हुआ है।
सारे शरीर का मुख्य आधार हड्डियाँ हैं। इन्हीं की शक्ति पर
हमारा खड़ा होना, चलना-फिरना अवलंवित है। हड्डियाँ ही हमारे
कोमलांगों की रक्षा करती हैं। सिर की हड्डीयों से दिमाग और
पसलियों से हृदय तथा फेफड़ों की हिफाजत होती है। डाक्टरों के
सिद्धान्त से शरीर में १३८ हड्डियाँ हैं। उनका ऊपरी भाग कठिन
तथा भीतरी पोला और कोमल होता है। हड्डियों के सन्धि-स्थल
में मज्जा का परदा होता है। इस मज्जा को भी नरम हड्डियों में
ही गिनते हैं।
दाँत भी हड्डी के ही होते हैं। छोटी उमर में पहले दूध के
दाँत होते हैं और फिर जब बच्चा अन्न खाने लगता है तब अन्न के
दाँत निकलते हैं। बच्चा पैदा होने के ६ से ८ महीने बाद दूध के
दाँत निकलते हैं और वे दो-ढाई वर्ष की उमर तक पूर्ण निकल
आते हैं। इनके एक-एक गिरने के बाद अन्न के दाँत निकलते हैं
जो पाँच वर्ष की आयु से लेकर पचीस वर्ष की आयु तक निकलते
रहते हैं।
चमड़े को छूने से बहुत जगह हमको मांस का लचलचापन
मालूम होगा। मांस के इस भाग का नाम स्नायु है। स्नायुओं
(पुट्ठों) द्वारा ही हम अपने हाथ सिकोड़ सकते हैं, फैला सकते

२४ असली कोकशास्त्र
हैं, जबड़े हिला सकते हैं; आँखें बन्द कर सकते हैं।
हम इस पुस्तक में शरीर-सम्बन्धी विशेष ज्ञान का वर्णन नहीं
करना चाहते। केवल समझने योग्य शरीर के मुख्य भागों
पर विचार किया जायगा। सब से मुख्य भाग पाकाशय अथवा
मेदा (कोठा) है। इसके क्षणभर भी आलस्य करने से
हमारा सारा शरीर ढीला और शिथिल हो जाता है। मेदे पर
हम जितना भार डालते हैं उतना सहने की ताकत बड़े-बड़े विक-
राल जन्तुओं में भी नहीं होती। मेदा भोजन को पचाकर उसके
द्वारा शरीर का पोषण करता है। इस भाग से शरीर को वही
सहायता मिलती है जो रेलगाड़ी को एञ्जिन के वैलट से, मेदा पस-
लियों के अन्दर वायों आर होता है। इसमें अनेक क्रियायें होकर
भिन्न-भिन्न प्रकार के रस तैयार होते हैं और भोजन का तत्व
खींचता है। बचा हुआ निकम्मा पदार्थ मल-मूत्र बनकर आंतों के रास्ते
बाहर निकल जाता है। इसके ऊपरी हिस्से में हृदय है। मेदे के
बायीं ओर तिल्ली है। यकृत् पसलियों के अन्दर दाहिनी ओर है।
इसका काम पित्त पैदा करना है। यह पित्त पाचन क्रिया के लिये
बहुत हो उपयोगी होता है।
अब देह के आधाररूप, बहने वाले खून पर विचार करना
चाहिये। खून से हमारा पोषण होता है। वह भोजन में से पोषक
भाग को खींचकर निरुपयोगी भाग को मल-मूत्र के रूप में बाहर
निकाल देता और सारे शरीर को गरम रखता है। खून शरीर के

असली कोकशास्त्र २५
अन्दर की नलियों, नसों द्वारा सदा फिरा करता है। खून की गति के
कारण ही हमारी नाड़ी एक मिनट में लगभग ७२ बार चलती
उछलती है। बच्चों की नाड़ी तेज चलती है बूढ़ों की सुस्त।
खून की सफाई का सबसे बड़ा साधन हवा है। शरीर में
चक्कर लगाकर जो खून फेफड़ों में जाता है वह निकम्मा हो जाता
है, उसमें जहरीले पदार्थ पैदा हो जाते हैं। जो हवा भीतर जाती है
वह उन जहरीले पदार्थों को खींच लेती है और अपने में मिली हुई
प्राणवायु खून को दे देती है। यह क्रिया सदा होती रहती है।
भीतर गई हुई हवा खून के जहरीले पदार्थ लेकर बाहर निकल
आती है और प्राणवायु खून में मिलाकर नसों के द्वारा सारे शरीर में
चक्कर लगाया करती है। इससे समझा जा सकता है कि बाहर
निकली हुई साँस कितनी जहरीली होती है। हवा का प्रभाव हमारे
शरीर पर अधिक रहता है।
सामान्यतः मनुष्य उन मनुष्यों को आरोग्य समझते हैं जो
खाते-पीते चलते-फिरते और वैद्यों को घर पर नहीं बुलाते। किन्तु
विचार करने पर मालूम होता है कि यह उनकी भूल है। ऐसे उदा-
हरणों की कमी नहीं है, जो खाने-पीने आदि के सभी व्यापार करते
हुए भी रोगी हैं, किन्तु अपने को रोगी नहीं समझते और साथ
ही रोग की परवाह भी नहीं करते। निरोग मनुष्य संसार में बहुत
ही कम हैं।
एक विदेशी लेखक का कहना है कि निरोग मनुष्य वे ही

२६ असली कोकशास्त्र
होते हैं, जिनके पवित्र शरीर में शुद्ध मन आवास करता हो। शरीर
का नाम तो मनुष्य नहीं, शरीर तो उसका निवासस्थान है। मन
और इन्द्रियों का शरीर के साथ इतना घनिष्ट सम्बन्ध है कि एक
के बिगड़ने से दूसरों के बिगड़ने में जरा भी विलंब नहीं लगता।
शरीर को गुलाब के फूल की उपमा दी गयी है, अर्थात् गुलाब का
फूल शरीर है और उसमें रहने वाली गन्ध उसकी आत्मा है।
कागज के बने हुए नकली गुलाब के फूल की उतनी कदर नहीं होती
जितनी कि असली और सुगन्ध-युक्त की। क्योंकि सूँघने पर
निर्गन्ध-पुष्प से सुगन्ध नहीं आयगी, वह केवल देखने की शोभा
मात्र है। उसमें उसका असली तत्त्व गन्ध नहीं है। जिस प्रकार
मनुष्य गन्धहीन पुष्प को पसन्द नहीं करते, प्रत्युत फेंक देते हैं, उसी
प्रकार उस मनुष्य से भी कोई प्रेम नहीं करता जो देखने में तो
ऊपर से अच्छा प्रतीत होता हो और उसके भीतर के व्यवहार अच्छे
न हों। चरित्र-हीन मनुष्य निरोग नहीं होते। जिसका शरीर
स्वस्थ हो वह अवश्य पवित्र-मन होगा। क्योंकि मन के ही अनु-
कूल मनुष्य कर्म करता है उसीका प्रभाव सब शरीर पर पड़ता है।
पाश्चात्य देशों में इस मत का एक पन्थ है। उसका यही सिद्धान्त
है कि जिसका मन शुद्ध होता है उसके शरीर में रोग होते ही नहीं
और यदि हो भी जायँ तो मनोबल के योग से हटा भी दिये जाते
हैं। सार यही है कि आरोग्यता का सबसे बड़ा साधन मन ही है।
अतएव मन की शुद्धि से ही आरोग्यता प्राप्त होती हैं।

असली कोकशास्त्र २७
तामस भाव, आलस्य और बहरापन ये सब रोग के ही
लक्षण है; कई-एक डाक्टर चोरी आदि को भी रोग ही मानते हैं।
विलायत में अनेक धनिक-स्त्रियाँ भी छोटी-छोटी चोरी करती पायी
गयी हैं। जिनकी डाक्टरी परीक्षा करायी जाने पर, डाक्टरों ने
“क्लेप्टेनिया” की बीमारी बतलायी। कोई मनुष्य स्वभाव से ही
खूँखार होते हैं। उन्हें बिना खून किये चैन नहीं पड़ता। यह भी
एक प्रकार का रोग है।
अब यह कहा जा सकता है कि जिनका शरीर सब इन्द्रियों से
पूर्ण है अर्थात् आँख, नाक कान आदि सभी पूर्ण है और उनमें
किसी प्रकार का विकार नहीं, अंग-प्रत्यंग सुडौल सुन्दर जिनसे
किसी प्रकार की बदबू नहीं आती और मन स्वाधीन है वे ही निरोग
हैं। स्वास्थ्य प्राप्त कर लेने पर भी उसका भोगना सरल नहीं।
माता-पिता का रोगी होना भी हमारे रोग का कारण है। माता-
पिता यदि निरोग होकर सन्तान पैदा करें तो उनको सन्तान उनसे
कहीं अधिक स्वस्थ और बलवती हो। विकासवादी इस बात को
मुक्तकण्ठ से स्वीकार करते हैं कि रोग-रहित पुरुष को मृत्यु का
भय नहीं लगता। मृत्यु से हमारा अत्यन्त डरना, यह सिद्ध करता
है कि हम रोगी हैं। इस लिये ऊपर दिखाये हुए स्वास्थ्य लाभ
करने का प्रयत्न हमको सदैव करना चाहिये। क्योंकि वह हमारा
परम कर्त्तव्य है।
स्वास्थ्य लाभ से ही प्रकृत जीवन प्राप्त होता है, यह नियम-

१८ असली कोकशास्त्र
सिद्ध बात है। प्रकृत-जीवन ही यथार्थ जीवन का नाम है। जहाँ
असली जीवन है वहीं सुख सम्पत्ति अधिवास करती है, अन्यथा
रुग्ण अवस्था में जैसा आज सार्व-भौम दुःख दिखायी देता है,
उसका चित्र-पट स्पष्ट ही है।
——:*:——
पुरुष-जननेन्द्रिय
पुरुष-जननेन्द्रिक संबंधि-ज्ञान प्रत्येक मनुष्य के लिये आवश्यक
है। शरीर से मूत्र और वीर्य निकलने का मार्ग एक ही होता है।
लिंग के अग्र भाग में एक आवरण चमड़ा होता हैं, जिससे लिंग
की सुपारी ढकी रहती है। वह चमड़ा बराबर आगे-पीछे हटाया-
बढ़ाया जा सकता है। माता या दाइयों की असावधानी के कारण
बचपन में यदि वह हटाया-बढ़ाया नहीं जाता, तो वह इतना तंग
हो जाता है कि मूत्र निकलने में भी तकलीफ पहुँचाने लगता है और
कभी-कभी यहाँ तक देखा गया है कि वह सड़ जाता है। इन
दोनों हालतों में डाक्टर से आपरेशन कराना पड़ता है। उस चमड़े
के नीचे और सुपारी की जड़ में प्रायः सफेद रंग का कीट जम
जाता है। उसको हमेशा साफ करते रहना चाहिये। उसकी सफ़ायी
न रखने से बुद्धि-मन्दता और स्वप्नदोष की बीमारी हो जाती है।
इस इन्द्रिय में बेलनाकार तीन डंडे होते हैं। इन तीनों डंडों में

असली कोकशास्त्र २६
दो मोटे-मोटे ऊपर की ओर और तीसरा भीतर से पोला दोनों के
नीचे की तरफ होता है। यही मूत्र-मार्ग है। तीनों दंडों में छोटे-
छोटे आशय होते हैं, जिनमें उत्तेजना के समय रक्त भर जाता है,
और लिंग ठोस और कड़ा हो जाता है। मैथुन-क्रिया के समाप्त
होते ही आशयों का रक्त शिराओं से वापस लौट जाता है और
फिर लिंग पूर्ववत् मुलायम हो जाता है।
अण्डकोश
जननेन्द्रिय के नीचे एक थैली लगी रहती है। जिसमें दो मांस
की गोलियें रहती हैं। ध्यानपूर्वक देखने से उनमें एक प्रकार की
क्रिया होती दिखलायी देती है। यह क्रिया त्वचा के संकोच-विकाश
से पैदा होती है।
सर्दी और गर्मी के कारण अण्डकोषों में संकोच-विकाश भी
होता है। वृद्ध और निर्बल मनुष्य के अण्डकोष ढीले पड़ जाते
हैं। कई मनुष्यों को एक ही अण्ड होता है और किन्हीं के वह
भी नहीं। अण्ड-हीन मनुष्य सन्तान नहीं पैदा कर सकता। अण्डों
में अधिक श्रम और चोट लगने से सन्तान उत्पन्न करने में बाधा
पड़ती है। यदि बचपन में अण्ड निकाल दिये जायें तो शरीर की
वृद्धि नहीं होगी। और मूंछें भी नही आयेंगी।

३० असली कोकशास्त्र
स्त्री जननेन्द्रिय
शंखनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्ता सा प्रकीर्तिता ।
तस्यास्तृतीये त्वावर्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता ॥
शंख नाभी के समान आकार वाली, तीन लपेट से युक्त योनि
होती है। उसकी तीसरी लपेट में गर्भ शय्या प्रतिष्ठित है।
यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः ।
तत्संस्थानां तथारूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः ॥
रोहू मछली के मुख के समान भी गर्भाशय का आकार कहा
गया है।
आभुग्नोऽग्रमुखः शेते गर्भो गर्भाशये स्त्रियाः ।
स योनि शिरसा याति स्वभावात्प्रसवं प्रति ॥
गर्भाशय के मुख पर सुकड़ा हुआ गर्भस्थ बालक शयन करता
है। वह स्वभाव से ही प्रसव-काल में शिर के बल योनि से बाहर
निकल आता है।
इसके सम्बन्ध में पुरुषों को विशेष रूप से जानने की आवश्य-
कता है। कारण पुरुषों को इस सम्बन्ध का ज्ञान बहुत कम होता
है। जिस स्थान पर पुरुष को जननेन्द्रिय होती है, ठीक उसी
जगह स्त्री की योनि होती है। इसे ही भग कहते हैं। यह भग दो

असली कोकशास्त्र ३१
ओष्ठ सदृश भागों के समान बना हुआ होता है। इसो लिये
इसको भगोष्ठ भी कहते हैं। यह भगोष्ठ भीतरी अवयवों की रक्षा
करती है। इसमें भी सफेद मैल जम जाता है। उसको साफ न
करते रहने से भी अनेक बीमारियाँ पैदा होती हैं। उन भगोष्ठों के
नीचे दो छोटे-बड़े छिद्र होते हैं। जो बड़ा छिद्र होता है, उसी से
पुरुष का वीर्य योनि में जाता है और बच्चा भी उसी मार्ग से बाहर
निकलता है, तथा मासिकधर्म भी उसी छिद्र से होता है।
दूसरा छोटा छिद्र मूत्र-मार्ग है। जो निचले छिद्र से एक डेढ़
इन्च ऊपर होता है।
जिन स्त्रियों की योनि क्षत नहीं हुई होती, उनका योनि-मुख
एक पतली खाल से ढका रहता है। पूरे युवती होने पर मासिक-
धर्म के निकलने से वह द्वार कुछ खुल जाता है। प्रसंग के समय
वह पर्दा फट जाता है। इससे स्त्रियों को दर्द भी होता है और
रक्त भी निकलता है। बाज लोग पर्दे का फटा हुआ होना स्त्री-
मैथुन की साक्षी मानते हैं। किन्तु कभी-कभी चोट लग जाने से
भी पर्दा फट जाता है।
भगोष्ठ ऊपर से मिला और उभरा हुआ होता है। बारह-
तेरह वर्ष की अवस्था में उस पर बाल आने लगते हैं। इन भगोष्ठों
के नीचे और मूत्र-द्वार के ऊपर एक छोटा-सा अंकुर होता है, जिसे
भगनासा कहते हैं। स्त्री का यह अंग पुरुष के शिश्न के समान
होता है। इसमें तीन डंडों के स्थान में दो ही दंड होते हैं और