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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 440 में से

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पृष्ठ 18

२ असली कोकशास्त्र १७
कोकशास्त्र का प्रयोजन
धर्मार्थकाममोक्षाणां शरीरं साधनं यतः।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन सब का साधन शरीर ही है।
प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह इस मल-मूत्र वाही शरीर से
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार अमूल्य रत्नों को उत्पन्न करे।
जो मनुष्य इन चारों में से एक को भी धारण नहीं करता, शास्त्र-
कारों ने उसका जन्म बिल्कुल ही निरर्थक कहा है। जैसे—
धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोपि न विद्यते।
अजा गलस्तनस्येव तस्य जन्मनिर्थकम् ॥
मनुष्य के शरीर में जितनी भी इन्द्रियें हैं, वे किसी न किसी
काम को अवश्य सिद्ध करती हैं। जैसे आँख रूप को, नाक गन्ध
को, जिह्वा रस को, काम शब्द को और त्वचा स्पर्श को बतलाती
है। इसी प्रकार हाथ, पाँव आदि कर्मेन्द्रियाँ भी समझ लेना
चाहिये। अर्थात् सम्पूर्ण शरीर का प्रयोजन धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
इन चारों वर्गों की प्राप्ति करना है। जिस प्रकार बकरी के गले में
लटकने वाले स्तन किसी भी काम में नहीं आते, ठीक उसी प्रकार
उस मनुष्य का जीवन भी व्यर्थ है जो इस चतुर्थ वर्ग में से किसी
का सेवन नहीं करता।
लोगों का ऐसा विचार है कि धर्म की अपेक्षा पहले अर्थ का