रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
असली कोकशास्त्र १०१
मानो उसने श्रृंगार किया नहीं था। सखियों के प्रेरणा करने पर
भी वह कोई वस्तु नहीं पहनती । अनमनी सी होकर झुँझलाती
और वहाँ से हट जाती है ।
अकेले पति के पास नहीं जाती, सखियों के साथ-साथ जाती
और साथ ही लौट भी आती है। पति को देखने की इच्छा रखने
पर भी नजर भर कर देख नहीं पाती । उनकी नजर पड़ते ही
अपनी दृष्टि दूसरी ओर या नीचे कर लेती है । पति के स्पर्श मा ।
से उसका शरीर अति हर्षित होकर रोमाञ्चित हो उठता है और
साथ ही सारे शरोर में कँपकँपी छूट पड़ती है ।
पसीने से उसकी देह तर-बतर हो जाती है। पति के बार बार
अनुरोध करने पर भी उसके मुख से एक भी शब्द नहीं निकलता।
चेष्टा करने पर भी उससे बोला नहीं जाता, मानो उसकी जबान
को लकवा मार गया हो ।
पति से विशेष परिचय हो जाने पर उनके प्रश्नों का कुछ स्फुट
उत्तर देती है। धीरे-धीरे झिझक कम हो जाने पर तिर्छों चितवन
के साथ पति की ओर देखती है । आँखें चार हो जाने पर मान
करती हुई कुछ मुस्करा देती है। पति उसके ऐसे कार्य-कलाप को
देखकर उन्मत्त हो उठता है और उसे बाहु-पाश में अवेष्ठित करने
की चेष्टा करता है। वह बाला काम-सिक्त होकर काम-कला के
प्रभाव से अनूठी दिखायी देने लगती है। उसकी भौं कमान की
भाँति तन-तन कर आकुञ्चित होती है। लज्जा भरी आँखें पलकों में
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नाचने लगती हैं। देह में हलकी कँपकँपी होती है। उस पुलकित
तन्वी मुग्धा बाला को देखकर उसका पति मुग्ध हो जाता है।
सखियों से की हुई पति की प्रशंसा सुनकर वह मन ही मन
बहुत प्रसन्न होती है किन्तु अपने मुँह से किसी प्रकार का सहयोग
नहीं देती। यदि सखियें उसका मनोभाव जानने के लिये उसके
मुख की ओर देखती हैं तो वह अपना मुख दूसरी ओर इस भाँति
फेर लेती है मानो उसने उनकी कोई बात सुनी ही नहीं और न
सुनना ही चाहती है। अनुभविता होने से तरुणी या प्रौढ़ा उसके
मनोगत-भाव को समझ पाती हैं अन्य नहीं।
रति सदन में पति के पास जाने के समय पति से दिये हुए
सम्पूर्ण आभूषणों को एकान्त में पहनती है और फिर आइने में
अपने श्रृङ्गार को देखकर खुश होती है। वह अपना पति के पास
जाना अपनी प्रिय सखियों को भी प्रगट करना नहीं चाहती। इस
लिए शब्द करने वाले सभी आभूषणों को उतार देती है और
करधनी आदि का शब्द रोकने के लिए उसे कसकर बाँध देती है।
जब दबे पाँव अलक्षित रूप से रति-गृह में पहुँच जाती है तब फिर
आभूषणों से सजकर कटाक्ष बाण छोड़ती हुई पति के सम्मुख जा
खड़ी होती है। उपरोक्त आचरण काम-विह्वला लज्जाशील मुग्धा
बालाओं के होते हैं।
सम्भोग के अनन्तर उसका सभी श्रृंगार बिगड़ जाता है। वह
अपनी उस अवस्था को देखकर बहुत लज्जित होती है। पति के
असली कोकशास्त्र १०३
सम्मुख स्थिर रहना कठिन हो जाता है। कभी-कभी मुग्धा पुरुष
को पराजित करने के लिये कामावेश में पुरुषारूढ़ भी हो जाती है,
किन्तु स्रावित हो जाने के कारण शिथिल होकर कटी बेल की भाँति
पति के वक्षस्थल पर गिर पड़ती है।
तरुणी
मुग्धा या बाला रमण की इच्छा रखती हुई भी स्वयं पति से
रुख नहीं मिलाती, पति से बार-बार आकृष्ट किये जाने पर ही रति
क्रिया में प्रवृत्त होती है। किन्तु तरुणी अभ्यस्ता नारी होने से रति
लालसा से परिपूर्ण होती है। उसकी सभी काम-कलायें जागृत
होती हैं। वह स्वयं भी वैसी ही उन्मत्ता होती है जैसा उसका
पति। वह वस्त्राभूषणों की अपेक्षा पति को अधिक प्यार करती
है। उसकी पति के पास रहने की विशेष इच्छा होती है। किन्तु
पति से मिलते समय वह आभूषण अवश्य पहन लेती है। उसका
उद्देश्य है पति प्रसन्न रहे और उसकी मनोभिलाषा में बाधा उत्पन्न
न हो। वह अपने कामोत्तेजक अंगों को किसी बहाने से नंगा कर
देती है। ये उसकी आतुरता के चिह्न होते हैं। वह सखियों में
स्वयं पति की प्रशंसा करती और सुनना चाहती है। उसका पति
में विशेष अनुराग होता है।
—:०:—
१०४ असली कोकशास्त्र
प्रौढा
प्रौढ़ा में पति के सम्मुख लज्जा का अभाव-सा हो जाता है ।
उसमें किसी प्रकार का संकोच भाव शेष नहीं रह जाता । वह पति
का साथ एक क्षण के लिए भी नहीं छोड़ना चाहती । उसका
प्रत्येक अंग सुगठित और मनोहर होता है । उसकी मदमाती चाल
मन को लुभाती है । उसकी मदभरी आँखों में सदा नायक की
सूरत नाचती रहती है । भोग-विलास प्रिय नायक को वह अपनी
कुशलता से आनन्द विभोर कर देती है । उस काम-कला-निपुण
सुन्दरी को आलिंगन, चुम्बन, नखच्छेदन और आसनादि भेद
बहुत प्रिय लगते हैं ।
वृद्धा
वृद्धा आदर करने मीठी-मीठी बात करने, कथा-कहानी सुनने-
सुनाने से तृप्त हो जाती है । उसे रति सम्बन्धी बातों से कुछ
विशेष आनन्द प्राप्त नहीं होता ।
स्त्री प्रसङ्ग
परमपिता परमात्मा ने सृष्टि की रचना के लिये दो शक्तियें
निर्माण की हैं । एक प्राण, और दूसरी रयि । प्राण और रयि शक्ति
के एक साथ मिलने से एक नयी वस्तु पैदा हो जाती है । गेहूँ,
चना उर्द और बनस्पत्यादि सभी इसी नियम से उत्पन्न होते हैं ।
असली कोकशास्त्र १०५
इसमें प्राण और रयि शक्ति हमेशा विद्यमान रहती है। जो सूर्य
और चन्द्र से प्राप्त होती है। सूर्य शक्ति को धारण करनेवाली प्राण
और चन्द्र शक्ति को धारण करनेवाली रयि शक्ति होती है। इन्हीं
प्राण वा रयि शक्ति को पुंषत्व वा स्त्रीत्व, वीर्य या रज कह सकते
हैं। इन शक्तियों को ठीक समय तक परिपक्व कर लेने पर जो
सन्तान उत्पन्न होती है, वह बलवती और सदैव निरोग रहनेवाली
होती है। इस लिए रज-वीर्य को परिपक्व अवस्था के पूर्व कभी
नाश न होने देना चाहिए।
परिपक्व रज-वीर्य भी यदि परिमाण से अधिक नाश कर दिये
जाते हैं तो उनका भी परिणाम उलटा ही होता है। स्त्री-पुरुष के
सम्बन्ध का प्रयोजन सन्तानोत्पत्ति मात्र है। जैसे कहा है:—
प्रजननार्थं स्त्रियः सृष्टाः सन्तानार्थञ्च मानवाः ।
किन्तु आजकल लोग ठीक इसके विपरीत आचरण करते हैं।
अर्थात् उन्होंने स्त्री को सन्तानोत्पत्ति का साधन न समझ कर भोग
मात्र का साधन समझ रखा है। भोग-विलास करते हुए संयोगवश
यदि गर्भ रह जाय तो वे आनन्दित होने की अपेक्षा अत्यन्त दुखित
होते हैं और उस गर्भ को गिराने के लिए वैद्यों, डाक्टरों और
मन्त्र-तन्त्र करने वालों से उपाय पूछा करते हैं। यदि दुर्भाग्यवश
कोई अदूरदर्शी लोभी गर्भपात का उपाय बतानेवाला मिल गया,
तो उस स्त्री का सर्वनाश ही समझना चाहिये। वह इतने भयंकर
रोगों से पीड़ित हो जाती है कि उसे अन्त में प्राणों से हाथ धोना
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पड़ता है। दैवसंयोग से यदि सन्तान उत्पन्न हो गयी तो वह
वीर्यहीन, क्षीणकाय, सदैव रोगी रहने वाली और अल्पायु पैदा
होती है।
पुरुष स्त्री के साथ अधिक सम्भोग करने में अपनी बहादुरी
समझता है और समझता है कि स्त्री मेरे इस कर्म से प्रसन्न होकर
मेरे आधीन रहेगी, किन्तु यह उसकी भारी भूल होती है। स्त्री
विषयी पुरुष को अधिक पसन्द नहीं करती। क्योंकि स्त्री एक बार
श्रवित होने पर अपनी अष्टगुण शक्ति का नाश कर बैठती है और
पुरुष की केवल एक गुण शक्ति ही नष्ट होती है। काम-लोलुप
पुरुष का वीर्य अपरिपक्व होने से पतला एवं निर्जीव हो जाता है
और वह स्त्री के साथ भोग करने में अधिक काल तक ठहर नहीं
पाता। स्त्री की भी यही अवस्था होती है। दोनों के निर्वीर्य हो
जाने पर प्रेम की मात्रा घट जाती है, एक दूसरे का आकर्षण
सदैव के लिए लुप्त हो जाता है। बहुधा ऐसे स्त्री-पुरुष पर-पुरुष
और पर-स्त्री-गामी हो जाते हैं।
गर्भ स्थिर हो जाने पर भी प्रायः लोग स्त्री-प्रसंग नहीं त्यागते
उसका प्रभाव स्त्री-पुरुष की तन्दुरुस्ती पर ही नहीं पड़ता, वरन
गर्भस्थ बालक पर इतना बुरा पड़ता है कि अंग-भंग, टेढ़ा-कुबड़ा और
दिमाग का खराब तथा विषयी पैदा होता है। उस पाप का भागी
माता-पिता को ही होना पड़ता है। यह पवित्र कार्य मूर्खतावश
ऐसा गन्दा बना दिया है कि जिसमें अपने शरीर, बल, धन, मान,
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मर्यादा सभी का नाश करता हुआ मनुष्य सुख समझता है।
ऐसे वीर्यहीन पुरुषों को जब सन्तान उत्पन्न नहीं होती, तब
वे देवी देवता, मियाँमदार से सन्तान माँगते फिरते हैं, परमात्मा
के नियम को तोड़नेवाले के लिए, कभी सफलता नहीं मिल सकती।
इस लिए वे सन्तानहीन जिन्दगी भर भाग्य को दोष देकर रोया
करते हैं। इस लिए सुख की कामना करनेवाले स्त्री-पुरुषों को
चाहिए कि वे शास्त्र मर्यादानुसार अपने आपको सुरक्षित रखते
हुए 'नयमपूर्वक बरतें। तभी स्त्री प्रसंग का सच्चा सुख प्राप्त
कर सकते हैं।
—:o:—
सुहाग रात
यह वह रात है, जिस रात को नयी सृष्टि उत्पन्न करने के लिए
रयि और प्राण-शक्ति का पहला मिलन होता है। दोनों स्त्री पुरुष
एक दूसरे से बिलकुल अपरिचित होते हैं, एक दूसरे से संकुचित,
परस्पर मनोभाव से अनभिज्ञ, परस्पर मिलने की इच्छा रखने वाले
होते हैं। किन्तु संकोचवश कौन किसके साथ कैसा सम्भाषण
आरम्भ करे, इस बात की विवेचना ही हृदयों में अति वेग के साथ
हो रही होती है। यद्यपि उनका यह सम्बन्ध उनके जीवनभर के
लिए होता है, तथापि वे एकाकि अपने हियाव को शीघ्र तोड़ नहीं
पाते। यह ठीक भी है। उस समय उन्हें बड़ी सावधानी से ही
१०८ असली कोकशास्त्र
काम लेना चाहिए । क्योंकि उस समय के बर्ताव का प्रभाव
जिन्दगीभर उनके दिलों पर अमिट रूप से ऐसा अंकित हो जाता
है कि जो भुलाये भी नहीं भूलता ।
कारण यह है कि उन दोनों के पूर्व चरित्र का सच्चा भाव उस
प्रथम मिलन में ही मालूम होता है। यदि सुक्ष्म रीति से दोनों स्त्री
पुरुष एक दूसरे के बर्ताव को लक्ष्य करें, तो मनुष्य की सम्पूर्ण
जिन्दगी का परिचय उन्हें उसी समय हो सकता है । भुक्तभोगी
स्त्री-पुरुष के विचार छिप नहीं सकते । कठोरता, मृदुता, सच्चाई,
प्रेम, सरलता आदि गुण-दोषों का भेद उस छोटे से समय में बड़ी
सरल रीति से स्पष्ट हो जाता है । जिन स्त्री-पुरुषों में उस समय
किसी प्रकार का प्रकृति-विरुद्ध भेद-भाव हो जाता है, वह ताबे
जिन्दगी निकाले नहीं निकलता । इस लिए वह प्रथम रात्रि बड़े
संयम और शिष्टता के साथ निबाहनी उचित है । और ठीक उसी
रात्रि के समान अपनी सारी जिन्दगी बना लेनी चाहिए ।
प्रथम रात्रि में पति-पत्नि जब एक पलंग पर बैठे हों तब उन्हें
परस्पर एक दूसरे के प्रति मधुर आदर-सूचक शब्दों का प्रयोग
करना चाहिए । जिनमें एक दूसरे का सम्मान भलीभाँति भरा हो ।
स्त्री को पहले बोलने का साहस नहीं होता । इस लिए पुरुष को
चाहिए कि वह ऐसे छोटे-छोटे प्रश्न करे जिनका जवाब 'हाँ' या
'ना' में ही केवल हो सकता हो । स्त्री एकाएक तीन-चार अक्षर
का उत्तर नहीं दे सकती । प्रश्न करने के बाद पति को इस बात का
असली कोकशास्त्र १०६
ध्यान रखना चाहिए कि स्त्री उसका उत्तर सिर हिलाकर देती है,
या 'हाँ' 'ना' में। उत्तर देने में स्त्री कुछ विलम्ब करती है अथवा
जल्दी। सिर हिलाकर और देर में जवाब देती है, तो समझ लेना
चाहिए कि स्त्री बहुत संकोच करनेवाली है। फिर दुबारा और भी
नम्रता के साथ प्रश्न करने चाहियें। जब वह 'हाँ' 'ना' में उत्तर
देने लग जाय, तब उससे कुछ बड़े उत्तर रखनेवाले प्रश्न करने
चाहिएँ। जब उनका जवाब ठीक आने लगे, तब उससे अपना
हाथ दिखाने को कहे। यदि हाथ न दिखाये तब कोई प्रश्न करते
हुए अपनी दृष्टि उसकी ओर से हटाकर दूसरी ओर फेर ले, और
बात करते हुए बीच-बीच में उसकी ओर देखता जाय।
पुरुष इस बात पर विशेष ध्यान देता रहे, कि स्त्री उसकी ओर
देखने का उपक्रम करती है, या नहीं। स्त्रियें प्रायः दृष्टि बचाकर
कनखियों से पति की ओर देखा करती हैं। इससे उनका अनुराग
पाया जाता है और वे पहचानने की चेष्टा भी करती हैं। उनकी
लज्जा का भाव भी देखने से घटता है। यदि पुरुष उनकी ओर से
दृष्टि नहीं हटाता, तो उनका संकोच-भाव दूर नहीं होता। यदि
उसकी दृष्टि अपनी ओर होती मालूम न पड़े तो उसकी संकोच-
मात्रा अत्यन्त अधिक समझनी चाहिए। बार-बार कहे जाने पर
हाथ न दिखाये तो स्वयं बड़ी मुलाइमीयत के साथ अपने हाथ से
उसका हाथ पकड़े और साथ ही इस बात पर भी ध्यान रक्खे कि
वह ऐसा करनेपर अपने-आपको बचाती है या चुपचाप बैठी रहती
११० असली कोकशास्त्र
है। यदि हाथ खींच ले तो जबरदस्ती न करनी चाहिए फिर कुछ
देर के बाद मौका देखकर अंग-स्पर्श करे । इस प्रकार बार-बार
प्रयत्न करने पर स्त्री की झेंप मिट जायगी। स्त्री स्वयं भी मिलने
का प्रयत्न करती है। किन्तु संकोचवश मिल नहीं पाती ।
यदि स्त्री बहुत ही लज्जावती हो तो उसकी किसी सखी को
मध्यस्था बनाकर बातचीत आरम्भ करे । ऐसा करने पर उसे
अवश्य सफलता मिलेगी। जब संकोचभाव दूर हो जाय तब मध्यस्था
को इशारे से हटा दे। सहसा कोई अयुक्त काम न कर बैठना चाहिए
नहीं तो पीछे बड़ा पश्चात्ताप करना पड़ता है। जैसे कहा है—
सहसा विदधीत न क्रियां अविवेकः परमापदां पदम् ।
विशेष रूप से बोलचाल हो जाने पर भी जबतक स्त्री की
सम्भोगेच्छा किसी प्रकार प्रकट न हो, तब तक उससे रति न करना
चाहिए। पुरुषकी अपेक्षा स्त्री को कामेच्छा बहुत काल के बाद
जागती है। प्रथम सम्मेलन में उन्हें बहुत ही संकोच होता है ।
इस लिये वे टालने की बहुत चेष्टा करती हैं। ऐसे समय में जो पुरुष
उनसे शीघ्र उलझने की चेष्टा करता है उस से उनका चित्त हट जाता
है। उनकी घृणा इतनी बढ़ जाती है कि वह आयु भर तक नष्ट नहीं
होती । इसीसे स्त्रियों का हृदय बहुत कोमल कहा गया है । उनको
वश में करने के लिए कुछ काल की आवश्यकता होती है । यदि
आयु, ऋतुधर्म, तन्दुरुस्ती ठीक हो, तो स्त्री प्रथम रात्रि में ही
पुरुष के वश में हो जाती है; उसका संकोच शीघ्र नष्ट हो जाता है ।
असली कोकशास्त्र १११
संकोच नष्ट हो जाने पर धीरे-धीरे उसके कटि-भाग से ऊपरि
अंगों का स्पर्श करे । जब वह इतना सहन कर ले और किसी बात
की बाधा उपस्थित न करे तब उसके सिर के बालों को सम्भालता
हुआ उसके मस्तक का चुम्बन करे, और उसके मुख पर हाथ फेरते
हुए उसके कपोल पर कपोल मले । इसी प्रकार धीरे-धीरे अधरोष्ठ
का चुम्बन करे । इतनी क्रिया निर्विघ्न समाप्त होने पर पुरुष को
चाहिए कि वह धीरे-धीरे अपने हाथ से स्त्री के कुचों का मर्दन
करते हुए नाभि-स्थल पर हाथ फेरे । इससे स्त्री को जब रोमांचित
होता हुआ दिखायी दे और उसकी आँखों में झपकी-सी आने लगे
तथा वह अपने शरीर का पूरा बोझ पुरुष पर, छोड़ दे, तब समझ
लेना चाहिए कि अब स्त्री रति योग्य हो गयी ।
प्रथम रात्रि क्रिया में प्रवृत्त होने समय पुरुष को ध्यान रखना
चाहिए कि प्रथम सम्भोग में स्त्री को कष्ट होता है । कभी-कभी
उस कष्ट का परिणाम स्त्री को सदा के लिए सम्भोगेच्छा से ऐसा
निवृत्त करता है कि उसे पति के पास जाने की इच्छा होते हुए भी
भूतपूर्व कष्ट की स्मृति से अनिच्छा उत्पन्न हो जाती है । इस लिए
अत्यन्त सावधानता के साथ स्त्री की शक्ति अनुसार रति-क्रिया
आरम्भ करनी चाहिए। जब स्त्री में कामोद्वेग अत्यन्त बढ़ जाता
है, तब वह मद-विह्वला होकर कष्ट का अनुभव नहीं करती है
पुरुष को उस समय भी बड़ी सावधानी से काम लेना चाहिए
एक बार सम्भोग हो जाने पर फिर स्त्री को उतना कष्ट मालूम न
११२ असली कोकशास्त्र
होता । धीरे-धीरे कष्ट का अभाव हो ही जाता है ।
स्त्री को चाहिए कि वह पुरुष की रुचि की ओर ध्यान दे ।
ऐसे समय में उदासीन रहने से पुरुष के विचारों में भी अन्तर आ
जाता है। स्त्री को वन्ध्या समझ कर अथवा रति के अयोग्य जान
कर उसका मन विरक्त हो जाता है । प्रायः इसी का परिणाम
देखने में आता है कि गृह-पत्नि अत्यन्त सुन्दरी युवती होती हुई
भी पुरुष पर-स्त्री-गामी हो जाता है । स्त्री की यह कमजोरी उसी
की घातिका हो जाती है । फिर हजार चेष्टा करने पर भी एक
सूत्रता नहीं होती । इस लिए स्त्री को चाहिए कि सुन्दर वस्त्र
आभूषण पहन कर, सुगन्धित द्रव्यों से वस्त्रों को सुवासित कर
मनोहर हाव-भाव के साथ पति को अपनाने की चेष्टा करे । वह
इस बात को मन में निश्चय कर ले कि पति को मेरी किसी प्रकार
की कमजोरी दिखाई न दे । पति की इच्छापूर्ति में किसी प्रकार की
त्रुटि न हो । पति को किसी प्रकार की कलह का भाव दिखायी न
दे । अधिक मान या हठ न करे । पति की गति-विधि को समझने
की खूब चेष्टा करे । जो रमणी इन बातों पर विशेष ध्यान रखती
है, उसका पति उसके खिलाफ कभी नहीं होता, वह उसका दास
बन जाता है । उस घर में कभी कलह या मत-भेद नहीं होने पाता ।
———*———
पु
८ असली कोकशास्त्र ११३
सम्भोग गृह
जिस कमरे में सोहागरात का आयोजन किया जाय, वह
हवादार और स्वच्छ होना चाहिए । उसमें हलका और मधुर
प्रकाश हो । वह ऋतु अनुसार वस्तुओं से सुसज्जित होना चाहिए
शूर-वीर, त्यागी महात्माओं के चित्र स्थान-स्थान पर लगे रहने
चाहिएँ । किसी प्रकार के गन्दे चित्र उसमें न होने चाहिएँ । सुन्दर
सुगन्धयुक्त मालाओं से सजा हुआ और सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित
होना चाहिए । उसमें उपयोगी वस्तु से अधिक सामान न होना
चाहिए । दो पलंग, मुलायम बिस्तर से सुसज्जित जलपूर्ण पात्र,
और कुछ खाद्य सामग्री जैसे—मेवा, फल इत्यादि अवश्य रहना
चाहिए, और सम्भोग के पूर्व निम्न बातों का ध्यान रखना परम
आवश्यक है:—
१—जिस रात स्त्री-पुरुष को सम्बन्ध करना हो, उसके पूर्व
उन दोनों को चाहिए कि वे उबटन आदि मलकर खूब अच्छी
प्रकार शीतकाल हो तो किंचित-उष्ण जल और गरमी हो तो खूब
ठण्डे जल से स्नान करें । तत्पश्चात् सुगन्धित वस्तु लेपन करें ।
पुरुष श्वेत वस्त्र धारण करे, और स्त्री हलके रंगीन वस्त्र पहने ।
वस्त्र गहरे रंग से रंगे हुए न होने चाहियें । स्त्री पूर्ण श्रृङ्गार से
अपने-आपको सजाये ।
२—हलका, किन्तु बल-वर्द्धक भोजन करना चाहिए । भूखे
११४ असली कोकशास्त्र
रहना अच्छा नहीं। भोजन करने के पश्चात् कम से कम दो घण्टा
ठहर कर सम्भोग कार्य में संलग्न होना चाहिए। अन्यथा स्वास्थ्य
को हानि पहुँचती है ।
३—किसी प्रकार के परिश्रम से थके हुए स्त्री पुरुष को
कदापि सम्भोग न करना चाहिए ।
सम्भोग काल
१—वसन्त ऋतु सबसे उत्तम ऋतु है । क्योंकि इसमें
स्वभावतः स्त्री पुरुषों में काम जागृत रहता है ।
२—ग्रीष्मऋतु की रात्रि मैथुन के लिए सर्वथा हेय है।
३—वर्षाऋतु में भी स्त्री सम्बन्ध कम करना चाहिए। क्योंकि
उसमें वायु कुपित रहती है ।
४—शरद् ऋतु में यथा रुचि सम्भोग करना चाहिए।
५—जाड़े में रात को, ग्रीष्म में दिन को, वसन्त में हर समय,
और वर्षा में जब बादल उमड़ रहे हों, पानी बरसते समय सम्भोग
करना चाहिए ।
काम संदीपिनी कलाएँ
जब तक स्त्री पुरुष में काम सन्दीप्त नहीं हो जाता, तब तक
रति क्रिया का आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता, और न तो गर्भ
स्थिति हो सकती है। इन कलाओं को जान लेने से कमजोर पुरुष
असली कोकशास्त्र ११५
बलवती स्त्री से तथा कमजोर स्त्री बलवान पुरुष से भी सरलता
पूर्वक तृप्त हो सकती है। इन्हीं कलाओं का विशेष निरूपण काम-
शास्त्र विशारद कोका पण्डित ने निम्न प्रकार किया है ।
स्पृष्टक आलिङ्गन
यद्योषितः संमुखमागताया,
अन्यापदेशाद्व्रजतो नरस्य ।
गात्रेण गात्रं घटते रतज्ञा,
आलिङ्गनं स्पृष्टकमेतदाह ॥
जब तक स्त्री पुरुष आपस में अपरिचित होते हैं और संकोच-
वश एक दूसरे से विशेष बातचीत नहीं कर पाते, उस समय घर
के किसी एकान्त स्थान में भेंट हो जाने पर एक दूसरे की देह को
किसी बहाने से स्पर्श करें, उस मुलायम स्पर्श को स्पृष्टक आलिंगन
कहते हैं ।
बिद्धक आलिङ्गन
यद्गृह्णती किश्चन वांचिताक्षं,
स्थितोपविष्टं पुरुषं स्तनाभ्याम् ।
नितम्बिनी विध्यति तां च गाढं,
गृह्णात्यसौ विद्धकमुच्यते तत् ॥
स्त्री पुरुषों के कुछ विशेष परिचित हो जाने पर दूसरों की
११६ असली कोकशास्त्र
नजर बचाकर एकान्त में बैठी हुई स्त्री के स्तनों का मर्दन या
बगल आदि में गुदगुदा देना अथवा एकान्त में बैठे पुरुष को स्त्री
का गोदना या अपने स्तनों का उसके शरीर पर मर्दन करना
विद्धक आलिंगन कहाता है ।
पीडित आलिङ्गन
यात्रोत्सवादौ तिमिरे घने वा,
यदृच्छतः स्याच्चिरमङ्गसङ्गः ।
उद्घृष्टकं तत्पुनरेव कुड्ये,
निपीडनात्पीडितसंज्ञकं स्यात् ॥
प्रकाश में अथवा घने अन्धकार में किसी विशेष बात को देख
कर एक दूसरे के किसी अंग को दबाना या मसलना उद्घृष्ट
आलिंगन कहाता है और यदि हलका धक्का देकर फिर उसे खींचकर
आलिंगन किया जाय तो उसे पीडित आलिंगन कहते हैं ।
कामादीपिका प्रधान कला
मनसिज को जगाने वाली प्रधान कला स्पर्शिका ही है ।
जिसके आलिंगन चुम्बन दन्त-दशन, और नखक्षत आदि अनेक
भेद हैं । जिनका दिग्दर्शन आगे किया जायगा ।
आलिंगन से दो शरीरों का संघर्ष होने पर दोनों में विद्युत
प्रवाह दौड़ने लगता है । उस प्रवाह में मानसिक वृत्तियों का भी
संचार होने लगता है । उन वृत्तियों में जैसे मानसिक विचार होते
असली कोकशास्त्र १०७
हैं उनका असर परस्पर होने लगता है । शुद्ध वृत्तियाँ शुद्ध भाव
को पैदा करती हैं और काम काज को प्रवृद्ध कर डालती हैं । शुद्ध
वृत्तियों का प्रयोग सन्तान वा बहन भाई आदि के साथ होता है
और काम काज का अपनी भार्या के साथ । इस स्पार्शिका क्रिया का
प्रभाव हाथी पर अधिक देखने में आता है । जब हाथी मस्ताकर
मद-मस्त हो जाता है तब आपे से बाहर होकर सब पर हमला
करने लगता है । हजार प्रयत्न करने पर भी रोकना कठिन हो जाता
है । चतुर पीलवान हथिनी लाकर उसके पास छोड़ देते हैं । हथिनी
की सूँड़ का स्पर्श होते ही वह सब उपद्रव छोड़कर ऐसा शान्त हो
जाता है मानो कुछ हुआ ही नहीं था । इस लिए स्पर्श काम-
संदीपिनी कला का प्रधान शस्त्र है ।
जिन स्त्री-पुरुषों को सामान्य स्पर्श से कामोद्दीपन नहीं होता
अथवा विलम्ब लगता है । उनके लिए चुम्बन का प्रयोग किया
जाता है । यदि इतने पर भी काम जागृत न हो तब दन्त-दशन (दाँतों
से स्थान-स्थान पर काटना ) और नखक्षत का व्यवहार किया
जाता है । किन्हीं-किन्हीं को इन दो प्रयोगों के बिना काम जागता
ही नहीं । बिना काम जागे मैथुन करना मृतक-सम्भोग कहाता है ।
आजकल प्रायः मृत-सम्भोग ही देखा जाता है क्योंकि प्रायः स्त्रियाँ
अतृप्त ही रहती हैं । पुरुष अपने वीर्य का बार-बार दुरुपयोग कर
अपने पुंस्त्व को खो बैठता है और स्त्रियाँ अतृप्त रह जाती हैं ।
यह उपरोक्त आलिंगन उन्हीं स्त्री पुरुषों में विशेष रूप से होते
११८ असली कोकशास्त्र
हैं, जिनमें परस्पर सम्भोग होकर घिशेष परिचिति हो जाती है
इनसे विशेष परस्पर प्रेम की वृद्धि और संकोच भाव की कभी हो
जाती है इस प्रकार जब दोनों की झिझक दूर हो जाती है, तब
लतावेष्टितादि आलिंगन किये जाते हैं।
लतावेष्टित आलिंगन
प्रियमनुकृतवल्लीविभ्रमा वेष्टयन्ती,
द्रुममिव सरलांगी मन्दसीत्का तदीयम् ।
वदनमुदितखे ताक्रन्दमाचुम्बनार्थे,
नमयति विनमन्ती तल्लताबेष्टितं स्यात् ॥
जिस प्रकार एक पेड़ को लता लपेटती हुई ऊपर चढ़ जाती है
उसी प्रकार अपने पैरों से खड़े हुए पुरुष को जंघाओं को और
बाहों से बगल तथा कण्ठ को लपेट कर सीत्कार करती हुई पति के
मुख के सम्मुख अपना मुख चुम्बन के लिये झुका देती है उसको
लतावेष्टित आलिंगन कहते हैं।
वृक्षादि रूढ आलिंगन
स्थितपतिमधिकृत्य प्रोक्तमाश्लेष युग्म
असली कोकशास्त्र ११६
यह भी लतावेष्टित के समान ही आलिंगन होता है; किन्तु
अन्तर इतना ही है कि कामोद्वेग में स्त्री अपने पैर से पुरुष के
एक पैर को दबाकर दूसरे पैर से उसकी जंघाओं को लपेटती हुई,
अपनी भुजा को पति के कक्ष भाग से कन्धे को पकड़ कर ऊपर की
ओर उठती हुई पति का चुम्बन करती है, इसको वृक्षादि रूढ़
आलिंगन कहते हैं ।
तिलतण्डुल आलिंगन
असकृदपि विगाढाश्लेषलीलां वितन्वन्,
जनितजघनबाहुव्यत्ययंस्पर्धयेव ।
मिथुनमथ मिथोऽङ्गे लीयते निस्तरंगं,
निगदति तिलपूर्वं तण्डुलं तन्मुनीन्द्रः ॥
यह आलिंगन लेटकर और खड़े होकर दोनों प्रकार से होता
है इसकी क्रिया प्रायः लतावेष्टित या वृक्षादिरूढ़ के समान ही
होती है। इसमें केवल अन्तर इतना ही है कि वे दोनों आलिंगन
मुख चुम्बन मात्र के लिये किये जाते हैं, और यह प्रत्येक अंग को
जोर से दबाकर एक रूपता लाने के लिए किया जाता है इससे
सम्पूर्ण शरीर में रति की जागृति हो जाती है। इस लिए इसको
तिल तण्डुल आलिंगन कहते हैं ।
१२० असली कोकशास्त्र
क्षीरनीरालिंगन
अभिमुखमुपविष्टा योषिदंकेऽथ तल्पे,
रुचिररुचिरगाढालिंगनो वल्लभश्च ।
प्रसरदसम गावेशनश्यद्विचारौ,
विशत इव मिथोऽङ्गे क्षीरनीरं तदाहूः ॥
वही तिल तण्डुल आलिंगन करते हुए जब स्त्री पुरुष काम
पीड़ित होकर अपने आपको भूल जाते हैं अर्थात् जिस प्रकार दुध
और जल एक होकर भेद-भाव को मिटा देता है, उसी प्रकार स्त्री
पुरुष का अपनी अवस्था के भेद को भूल जाने से यह क्षीरनीरा-
लिंगन कहाता है।
उरुपगूढालिंगन
तत्रोरुसंदंशेनैकमूरूमूरुद्वयं वा सर्वप्राणं-
पीडयेदित्यूरूपगूढनम् ॥
काम-पीड़िता अबला की जंघाओं को अपनी जंघाओं में दबा-
कर जो पीड़न-क्रिया किया जाता है, उसको ऊरूपगूढ़ालिंगन कहते
हैं। यह आलिंगन आमने-सामने करवट लेते हुए स्त्री-पुरुषों में
किया जाता है। इससे मांसल भाग दबने से बहुत आनन्द
मालूम होता है।