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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 440 में से

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पृष्ठ 106

असली कोकशास्त्र १०५
इसमें प्राण और रयि शक्ति हमेशा विद्यमान रहती है। जो सूर्य
और चन्द्र से प्राप्त होती है। सूर्य शक्ति को धारण करनेवाली प्राण
और चन्द्र शक्ति को धारण करनेवाली रयि शक्ति होती है। इन्हीं
प्राण वा रयि शक्ति को पुंषत्व वा स्त्रीत्व, वीर्य या रज कह सकते
हैं। इन शक्तियों को ठीक समय तक परिपक्व कर लेने पर जो
सन्तान उत्पन्न होती है, वह बलवती और सदैव निरोग रहनेवाली
होती है। इस लिए रज-वीर्य को परिपक्व अवस्था के पूर्व कभी
नाश न होने देना चाहिए।
परिपक्व रज-वीर्य भी यदि परिमाण से अधिक नाश कर दिये
जाते हैं तो उनका भी परिणाम उलटा ही होता है। स्त्री-पुरुष के
सम्बन्ध का प्रयोजन सन्तानोत्पत्ति मात्र है। जैसे कहा है:—
प्रजननार्थं स्त्रियः सृष्टाः सन्तानार्थञ्च मानवाः ।
किन्तु आजकल लोग ठीक इसके विपरीत आचरण करते हैं।
अर्थात् उन्होंने स्त्री को सन्तानोत्पत्ति का साधन न समझ कर भोग
मात्र का साधन समझ रखा है। भोग-विलास करते हुए संयोगवश
यदि गर्भ रह जाय तो वे आनन्दित होने की अपेक्षा अत्यन्त दुखित
होते हैं और उस गर्भ को गिराने के लिए वैद्यों, डाक्टरों और
मन्त्र-तन्त्र करने वालों से उपाय पूछा करते हैं। यदि दुर्भाग्यवश
कोई अदूरदर्शी लोभी गर्भपात का उपाय बतानेवाला मिल गया,
तो उस स्त्री का सर्वनाश ही समझना चाहिये। वह इतने भयंकर
रोगों से पीड़ित हो जाती है कि उसे अन्त में प्राणों से हाथ धोना