रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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पड़ता है। दैवसंयोग से यदि सन्तान उत्पन्न हो गयी तो वह
वीर्यहीन, क्षीणकाय, सदैव रोगी रहने वाली और अल्पायु पैदा
होती है।
पुरुष स्त्री के साथ अधिक सम्भोग करने में अपनी बहादुरी
समझता है और समझता है कि स्त्री मेरे इस कर्म से प्रसन्न होकर
मेरे आधीन रहेगी, किन्तु यह उसकी भारी भूल होती है। स्त्री
विषयी पुरुष को अधिक पसन्द नहीं करती। क्योंकि स्त्री एक बार
श्रवित होने पर अपनी अष्टगुण शक्ति का नाश कर बैठती है और
पुरुष की केवल एक गुण शक्ति ही नष्ट होती है। काम-लोलुप
पुरुष का वीर्य अपरिपक्व होने से पतला एवं निर्जीव हो जाता है
और वह स्त्री के साथ भोग करने में अधिक काल तक ठहर नहीं
पाता। स्त्री की भी यही अवस्था होती है। दोनों के निर्वीर्य हो
जाने पर प्रेम की मात्रा घट जाती है, एक दूसरे का आकर्षण
सदैव के लिए लुप्त हो जाता है। बहुधा ऐसे स्त्री-पुरुष पर-पुरुष
और पर-स्त्री-गामी हो जाते हैं।
गर्भ स्थिर हो जाने पर भी प्रायः लोग स्त्री-प्रसंग नहीं त्यागते
उसका प्रभाव स्त्री-पुरुष की तन्दुरुस्ती पर ही नहीं पड़ता, वरन
गर्भस्थ बालक पर इतना बुरा पड़ता है कि अंग-भंग, टेढ़ा-कुबड़ा और
दिमाग का खराब तथा विषयी पैदा होता है। उस पाप का भागी
माता-पिता को ही होना पड़ता है। यह पवित्र कार्य मूर्खतावश
ऐसा गन्दा बना दिया है कि जिसमें अपने शरीर, बल, धन, मान,