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रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ एवं कोकशास्त्र मंगलाचरण

( १३ )
विषय पृष्ठ
२९९—लिंग वृद्धि योग ४३५
३००—योनि संकोचन योग ४३६
३०१—योनि बर्द्धक योग ४४१
३०२—गर्भवती होने का उपाय ४४२
३०३—गर्भपात रक्षा का उपाय ४४२
३०४—स्तन दृढ़ करने के उपाय ४४३
३०५—गर्भावरोधक उपाय ४४५
३०६—स्वप्नदोष से बचने के उपाय ४४७
३०७—स्त्री स्खलित योग ४५४
३०८—स्तन दुग्ध योग ४५५
३०९—सर्वोत्तम खिजाब ४५७
३१०—अद्भुत खिजाब ४५७
३११—बाल विनाशक चूर्ण ४५८
३१२—बाल का उगना बन्द ४५८
३१३—सूजाक की दवा ४५८
३१४—सूजाक की पिचकारी ४५६
३१५—दाद का मलहम ४५६
३१६—बवासीर की गोली ४६०
३१७—अजीर्ण का इलाज ४६०
३१८—गर्मी ( आतशक ) की दवा ४६१
३१९—जुलाब की दवा ४६१
३२०—रतौंधी की दवा ४६२
३२१—कान की दवा ४६२
३२२—बेवाई की दवा ४६२

असली कोकशास्त्र
जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ के रचयिता-
कोकापंडित का संक्षिप्त जीवन
किसी समय काश्मीर देश में महाराज शान्तिदेव राज्य करते
थे । उनकी न्याय-प्रियता और प्रजा-वात्सल्य के कारण प्रजा उन्हें
पिता के समान स्नेह करती थी । प्रजा का ऐसा स्नेह देखकर पुत्र-
विहीन होने पर भी उन्हें वृद्धावस्था में पुत्राभाव के दुःख का अनु-
भव नहीं होता था ।
ठीक वैसे ही उनके प्रधान मन्त्री पं० दीनानाथ जी थे । जो
अनुभवी और बुद्धिमान व्यक्ति थे । वे महाराज के समवयस्क और
परम स्नेही थे । प्रजा की देख-रेख का भार प्रायः उन्हीं पर था ।
प्रजा भी उन्हें जी-जान से प्यार करती थी । दैव-दुर्विपाक से इनके
भी कोई सन्तान न थी ।

२ असली कोकशास्त्र
एक दिन महाराज ओर प्रधान-मन्त्री काश्मीरी पर्वतों पर
भ्रमण करनेके लिये गये थे । काश्मीर देश ऐसा सुन्दर पहाड़ियों से
घिरा हुआ है, जो दुर्ग की प्राचीर की भाँति उसे चारो ओर से
घेरे हुए हैं । उन पहाड़ियों पर अंगूर, फालसा, अखरोट, बादाम
आदि अनेक प्रकार के मेवे हर समय, मौसिम के लिहाज से लदे
रहते हैं । कन्द-फल-फूल की तो गिनती ही नहीं । ऐसा हरा-भरा
प्रदेश भू-मण्डल पर और कहीं दिखयी नहीं देता, यह अत्युक्ति
नहीं, बल्कि यथार्थ ही है ।
उन पर्वतों की गुफाओं में तपस्वी, योगी, महात्मा भी निवास
करते हैं । जिनको सभी प्रकार की सुविधायें प्राप्त हैं । पीने के
लिये शीतल जल के झरने और खाने के लिये तरह-तरह के मेवे !
ईश्वरीय-सृष्टि देखने के लिये नाना प्रकार के रंग-बिरंगे पशु-पंक्षियों
के कलोल दिखयी देते हैं ।
महाराज और मन्त्री पर्वत प्रदेशों में घूमते हुए जब एक झरने
पर जा बैठे, तब उन्हें एक हिरन-हिरनी का जोड़ा नदी तट पर
दिखायी दिया । उनके साथ दो छोटे-छोटे बच्चे भी उछल-कूद
मचा रहे थे । हिरनी बड़े स्नेह के साथ उन बच्चों की ओर देख
रही थी । बच्चे जब कुछ दूर हट जाते थे, अथवा झाड़ो की ओट
में हो जाते थे तो हिरनी व्याकुल होकर उन्हें ढूँढ़ने के लिये
झाड़ियों का चक्कर लगाती थी । हिरन मन्थर-गति से इधर-उधर
घूम रहा था ।

असली कोकशास्त्र ३
उनकी इन हरकतों को देखकर महाराज का मन उदास हो
गया और किसी अज्ञात भाव के उदय हो जाने से उनके नेत्रों में
जल भर आया। उन्होंने अश्रु-बिन्दु छिपाने के लिये अपना मुख
उस ओर से फेर लिया। मन्त्री निकट ही बैठे हुए थे। उनसे महा-
राज का यह व्यापार नहीं छिपा। उन्होंने कहा—महाराज, आपकी
ऐसी करुण-दशा क्यों दिखायी दे रही है ? कौन दुःखद विचार
आपके हृदय में उत्पन्न हुआ जिससे ऐसे सुन्दर आनन्दप्रद प्रदेश
में रहते हुए भी आपकी आँखों में आँसू छलक आये ? आज तक
आपने कोई बात मुझसे छिपाने की चेष्टा...
बीच ही में रोककर महाराज ने कहा, —यह सच है, मैंने कभी
कोई बात आपसे नहीं छिपायी और इसके छिपाने की भी कोई
आवश्यकता नहीं प्रतीत होती। मन्त्रिन्, आपने वह मृगों का जोड़ा
अपने बच्चों के साथ खेलता हुआ देखा ? देखो, वह निर्जन प्रदेश में
कैसे आनन्द से मनोविनोद कर रहा है। उसके पास दुःख और
त्रास का लेश भी दिखायी नहीं देता। हम राजा हैं, हमारे पास
सेना है, घोड़े हैं, हाथी हैं, तथा ऐशो-आराम के सभी सामान
मौजूद हैं। महल और उनमें रहनेवाली रानी, सेवक सेविकायें भी
हैं। किसी प्रकार की धन-सम्पत्ति की भी कमी नहीं। इतना सब
कुछ होने पर भी सब व्यर्थ है। पुत्र-हीन-गृह श्मशान के समान
प्रतीत होता है। इन मृगों के पास उनमें से कोई भी वस्तु नहीं;
किन्तु ईश्वर-प्रदत्त वस्तुओं का उपभोग करते हुए केवल अपने पुत्रों

४ असली कोकशास्त्र
के साथ दम्पत्ति कितने आनन्दित दिखायी दे रहे हैं।
मन्त्रा ने कहा,—आपका कहना यथार्थ है। अब हम लोगों के
और जीवन के दिन ही कितने हैं। परमात्मा ने अब तक भी हम
पर कृपा नहीं की। इसमें परमात्मा का क्या दोष ? हमारा भाग्य
ही ऐसा है।
मन्त्री और महाराज में जिस समय उपरोक्त बातें हो रही थीं
ठीक उसी समय सामने से एक जटाधारी तपस्वी आते दिखाई
दिये। उनके हाथ में एक कमंडलु और पांव में खड़ाऊँ थीं।
ये महात्मा नदी के उस पार रहते थे। नदी का जल बहुत गहरा
न था। तपस्वी नदीतट पर आ पहुँचे। वे अधोदृष्टि किये आ रहे
थे। इस लिये उनकी दृष्टि इन दोनों पर नहीं पड़ी। तट पर पहुँचते
ही उन्हें दो व्यक्ति एक शिला के पास दिखायी दिये।
नजर चार होते ही महाराज ने झुककर प्रणाम किया। मन्त्री
ने भी उनका साथ दिया।
महात्मा ने आशीर्वाद देते हुए कहा,—राजन् ! आप यहाँ कैसे ?
कुशल तो है ?
महाराज ने नम्रतापूर्वक कहा, —परमात्मा की कृपा से सब
कुशल ही है।
महात्मा ने कहा,—सब कुशल ही है, इसके क्या माने ? आप
ऐसे उदास वचन क्यों बोल रहे हैं ?
महाराज ने कुछ उत्तर नहीं दिया। महात्मा ने मन्त्री जी से

असली कोकशास्त्र ५
कहा,—आप तो इनकी चिन्ता के कारण से अवश्य ही अवगत होंगे ?
मन्त्री ने कहा,—हाँ भगवन्, आज एक दृश्य देखकर एकाएक
इनकी ऐसी हालत हो गयी। यद्यपि सब से कहने योग्य वह बात
नहीं है, किन्तु आप जैसे महात्माओं से छिपाना भी व्यर्थ है।
इसके बाद मन्त्री ने महाराज की अनुमति लेकर चिन्तित होने
का कारण कह सुनाया। जिसे सुनकर महात्मा ने कहा,—आप
चिन्ता न करें, ईश्वर चाहेंगे तो आपकी अभिलाषा पूर्ण होगी।
इतना कहकर महात्मा उन दोनों को साथ ले अपनी कुटी की
ओर चल दिये। उनकी कुटिया करीब ही थी। किन्तु पर्वत की
ऊँचाई-नीचाई के कारण उन्हें पहुँचने में करीब आधा घण्टा लगा।
कुटी में पहुँचकर इन दोनों को एक कुशासन पर बैठा दिया ओर
आप वहाँ से चले गये। थोड़ी देर बाद एक लम्बी लता लिये हुए आ
पहुँचे और उसे महाराज के सामने रखकर बोले,—इस वन-लता में
१५ गाँठ हैं। हर एक गाँठ के ऊपर सूत से कसकर बाँध दें। एक
गाँठ किसी बर्त्तन में रखकर काट लीजियेगा। इसमें से सफेद दूध
के समान रस निकलेगा। उसका चारु-पिंड बना लेना। ये सोम-
लता नाम की प्रसिद्ध लता है। इसके सेवन से अवश्य संतान
प्राप्त होती है।
[ २ ]
कुछ दिनों के बाद ईश्वर की कृपा से महाराज और मन्त्री दोनों
के घर में पुत्र उत्पन्न हुए। महाराज ने अपने पुत्र का नाम शम्भु-

६ असली कोकशास्त्र
सिंह रक्खा और मंत्री पं० दीनानाथ जो ने अपने पुत्र का नाम
कामनाथ प्रसिद्ध किया। बड़े-बड़े अनुभवी विद्वान् पंडितों द्वारा
बालकों की परीक्षा करायी गयी। बालकों की मुखाकृति देखकर
सभी ने एक स्वर से उनका भविष्य सुखमय बतलाया।
कामनाथ जब बोलने लायक हुआ, तब उसकी कोकिल समान
मधुर आवाज को सुनकर उसके पिता उसे 'कोका' कहकर पुकारने
लगे। इस नाम के आगे कामनाथ नाम छिप गया और वे बड़े
होकर भी इसी नाम से प्रसिद्ध हुए। जब कोका छोटे थे, तभी
पं० दीनानाथ जी उन्हें अच्छे-अच्छे शिक्षाप्रद श्लोक कंठ कराया
करते थे ! यहाँ तक कि अक्षराभ्यास से लेकर व्याकरणादि सब
शास्त्र उन्होंने ही स्वयं पढ़ाये और समयानुसार सब संस्कार भी
यथाविधि कराये।
जिन विषयों को वे स्वयं नहीं जानते थे, उन विषयों को उन्होंने
अन्य उच्चकोटि के विद्वानों से पढ़ाया। कोका की बुद्धि बड़ी
अपूर्व थी। और स्मरणशक्ति भी असीम थी। जैसे वे सर्वाङ्ग
सुन्दर उत्पन्न हुए, वैसे ही अपूर्व विद्वान् भी हो गये। उनकी
ऐसा उन्नति देखकर उनके माता-पिता फूले नहीं समाते थे।
एक दिन दैव संयोग से कोका को साथ लेकर मंत्री जी राज-
दर्बार में गये। कोका की मोहिनी सूरत देखकर महाराज शान्ति-
देव जी बड़े प्रसन्न हुए। युवराज शम्भुसिंह भी दर्बार में ही बैठे
थे। उन्होंने भी अनेक विद्याओं का अध्ययन किया था।

असली कोकशास्त्र ७
महाराज ने मंत्रीजी से कहा,—मन्त्रीजी, अब हमलोगों की
इच्छा परमात्मा ने पूर्ण कर दी। अब हमें राज-पाट का भार लड़कों
को सौंप देना चाहिये। मेरी समझ में अब लड़के पूर्ण योग्य हो
गये हैं।
थोड़ी देर के बाद कोकापंडित की बुद्धि की परीक्षा के लिये
उन्हें सम्बोधन कर महाराज ने कहा,—जितना प्रेम संतान के प्रति
माता-पिता को होता है, उतना संतान को माता-पिता के प्रति
होता है या नहीं ?
कोका पंडित ने उठकर बड़ी नम्रता के साथ कहा,—राजन्,
यह प्रश्न जितना कठिन है, उतना ही महत्वपूर्ण भी है। मैं
इसका उत्तर अपनी स्वल्प-बुद्ध्यनुसार देता हूँ। संभव है कोई
त्रुटि हो तो उसे महाराज क्षमा करेंगे।
कोका—दोनों में निःस्वार्थ-प्रेम बराबर ही होता है, किन्तु
स्वार्थमय-प्रेम में अवश्य अन्तर होता है।
महाराज ने कहा,—क्या कोई दृष्टान्त देकर समझा सकते हो ?
कोका पण्डित ने कहा,—हाँ इतिहास में ऐसे बहुत से उदा-
हरण आये हैं। जैसे हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को कितने कष्ट
दिये ? सिर्फ इस लिये कि वह ईश्वर के स्थान पर उसी के नाम
की माला फेरे। दूसरा उदाहरण है अर्जुन का। जिसने अपनी सेना
की रक्षा के लिये अपने बूढ़े पितामह भीष्म जी के प्राण उन्हीं से
उपाय पूछ कर लिये। यहाँ दोनों स्थान पर स्वार्थ था। जहाँ स्वार्था-

८ असली कोकशास्त्र
भाव होता है वहाँ प्रेमाभाव का कारण भी दिखायी नहीं देता ।
कोका पण्डित का उत्तर सुनकर महाराज बहुत प्रसन्न हुए ।
उन्होंने उसी समय दर्वारियों को सम्बोधन कर कहा,—मैं प्रधान
मन्त्री दीनानाथ जी के पद का उत्तराधिकारी कोका पण्डित को ही
नियुक्त करता हूँ । आपलोगों की क्या राय है ?
दर्वारियों ने एक स्वर से उनका समर्थन किया ।
[ ३ ]
कोका पण्डित देश-देशान्तरों में घूमने के लिये चले गये । कई वर्ष
के बाद जब वे लौटे तब उन्हें राज्य-सिंहासन पर शम्भुसिंह राज्य
करते दिखायी दिये । महाराज का आज्ञापत्र उनके नाम लिखा हुआ
था कि जब वे लौटकर आवें तब उन्हें प्रधान मन्त्री का पद देकर
प्रधान मन्त्री पं० दीनानाथ जी स्वतन्त्र हो सकते हैं ।
राज-काज करते हुए कोका पण्डित और महाराज शम्भुसिंह में
बड़ा प्रेमभाव उत्पन्न हो गया । वे प्रायः जहाँ घूमने-फिरने जाते थे
साथ ही साथ जाते थे ।
एक दिन राजदर्वार ठसाठस भरा हुआ था । दर्बारीगण यथा

असली कोकशास्त्र ६
अपना मुँह नीचा कर लेना पड़ा । महाराज और मंत्रि-मंडल की
भी वही दशा हुई । महाराज ने अधोदृष्टि किये हुए उस रमणी से
नम्रतापूर्वक कहा,—आप इस प्रकार निरावरण की भाँति राजसभा
में क्यों आयी हैं ?
रमणी ने कहा,—क्या आप मेरे हाथ में देखते हैं कि मैं क्या
लिये हुए हूँ ?
महाराज ने कहा,—तुम्हारे हाथ में क्या है, इसका जवाब
हम तभी दे सकते हैं जब तुम किसी मोटे वस्त्र से अपने अंग ढंक
लो । इस प्रकार निर्लज्जा स्त्री को हम कोई जवाब नहीं दे सकते ।
उस स्त्री ने कहा,—मुझे यहाँ कोई लज्जा की बात दिखायी
नहीं देती । क्योंकि लज्जा पुरुषों से की जाती है, स्त्रियों से नहीं ।
महाराज ने पूछा,—क्या तुम्हें यहाँ सब स्त्रियें दिखायी देती हैं ?
उस स्त्री ने कहा,—यहाँ ही क्या, मुझे तो आजतक कहीं कोई
मर्द दिखायी ही नहीं दिया । या तो स्त्रियें और या हिजड़े ही
दिखायी दिये ।
यह बात सुनकर महाराज को बड़ा क्रोध आया । उन्होंने कड़क
कर कहा,—इस बेहूदी औरत को दर्वार से बाहर निकाल दो ।
उसी समय प्रधान मन्त्री कोकापंडित ने महाराज से नम्रता-
पूर्वक कहा,—राजन्, इस प्रकार स्त्री का तिरस्कार राजसभा से
करना अच्छा नहीं । वह ऐसा क्यों कह रही है, इसका कारण
जानना ही उत्तम होगा । यदि आप आज्ञा दें तो मैं दो-चार बातें करूँ ?

१० असली कोकशास्त्र
राजा ने कहा,—अच्छा, जैसी तुम्हारी इच्छा।
कोका पण्डित ने उस स्त्री से पूछा,—क्या आपको मोटे वस्त्र
पहनने में कोई एतराज है ? वस्त्र पहन लेने पर हम आपकी सभी
बातों का जवाब देंगे।
रमणी ने कहा,—नहीं मुझे कोई एतराज भी नहीं है। किन्तु
मेरे पास इस समय वस्त्र कहाँ है ?
उस स्त्री की बात सुनकर कोका पंडित ने अपना दुशाला उतार
कर उसे दे दिया। जब रमणी ने दुशाला ओढ़ लिया तब सब की
दृष्टि फिर उसकी ओर गयी। सब ने देखा, स्त्री की आँखें अग्नि के
समान लाल हैं। बाल छोटे, किन्तु बिखरे हुए हैं। मदन-ताप से
उसका सारा शरीर जल रहा है। नाक के छिद्र स्थूल हैं, देह मोटी
और सुडौल है। उन्मादिनी की भाँति उसके सब अंग फरफरा रहे
हैं। कुछ आभूषण अंग-प्रत्यंग में यथास्थान सुशोभित हैं ! वह
अपने हाथ में एक गुलाब का फूल लिये सूंघ रही है।
मन्त्री ने पूछा,—क्या आप इसी पुष्प के लिये पूछ रही हैं ?
इससे आपका क्या मतलब ?
रमणी ने कहा—इसी का समझने वाला कोई नहीं मिला।
मन्त्री ने कहा,—इसमें क्या रक्खा है। फूल गुलाब का है,
खिला हुआ है, खुशबूदार है और देखने में सुहावना है।
रमणी ने कहा,—कुछ और भी ?

असली कोकशास्त्र ११
मन्त्री ने कहा,—और क्या ? आप स्पष्ट क्यों नहीं कह देतीं,
आप क्या चाहती हैं ?
उस स्त्री ने कहा,—फूल का जीवन कब सार्थक माना जाता है?
मन्त्री ने कहा,—जब वह भोग में आ जाय ।
रमणी ने कहा,—हाँ, आप कुछ समझदार मालूम होते हैं।
सम्भवतः आप मेरे दृष्टान्त से दार्ष्टान्त को भी समझ गये
होंगे ?
कोका पंडित थोड़ी देर तक मन ही मन सोचकर बोले,—हाँ,
तुम्हारे अभिप्राय को मैंने कुछ समझा । क्या तुम पुष्प की भाँति
अपने आप को सार्थक करना चाहती हो ?
स्त्री ने कुछ जवाब नहीं दिया । महाराज बड़े गौर से उन दोनों
की बातें सुन रहे थे । उन्होंने कोका पंडित से कहा,—इन बातों
का कुछ मतलब समझ में नहीं आया ।
कोका पंडित ने कहा,—महाराज, यह कामिनी काम-विह्वला
दिखायी दे रही है । कामान्ध होकर इसने उपरोक्त बातें कही हैं।
महाराज ने कहा,—तो इसका उपाय क्या किया जा सकता
है ? क्या इसका पति नहीं है ? यह काम तो उसी का है, इसका
राज-द्वार से क्या सम्बन्ध ?
मन्त्री ने कहा,—आपका कहना सत्य है। किन्तु जब उसकी
सन्तुष्टि नहीं होती, तब वह राजद्वार में न कहे तो और कहाँ
कहे ?

१२ असली कोकशास्त्र
महाराज ने कहा,—तो हम ऐसी स्त्रियों का क्या प्रबंध कर
सकते हैं ?
मंत्री ने कहा,—रति-शास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थों का मैंने अध्ययन
किया है। सम्भव है मैं इसे सन्तोष दिला सकूँ। बाह्य-रति इसका
परम औषध है। आगे आपकी जैसी इच्छा हो।
उस कामिनी ने कहा,—मेरा अभी विवाह किसी से नहीं हुआ
है। मैं विवाह की इच्छा से ही बाहर निकली हूँ। मैंने जिस जिस
वर को चुना, उसी ने मेरी प्रतिज्ञा को सुनकर मुझसे विवाह करने
से इनकार कर दिया। सम्भव है मेरी उस प्रतिज्ञा तथा उसका
कारण जानने की इच्छा आप को भी हुई होगी। इस लिये मैं
उसे स्पष्ट किये देती हूँ।
जब मैं विवाह योग्य हुई, मेरे घर पर विवाह के पैगाम आने
लगे। मेरी बहुत सी मिलनसार सखियें थीं, जिनकी गोद में एक-
एक दो-दो सन्तानें खेल रही थीं। उन्होंने कहा,—तुम हमारा
कहा मानो तो विवाह मत करो, नहीं तो पछताभोगी। क्योंकि
हमारा तुम्हारा एक ही स्वभाव है। विवाह से तुम्हें सुख नहीं
मिलेगा। यदि तुम्हें सन्तान की इच्छा हो तो हमसे सन्तान गोद
लेकर पाल-पोष सकती हो।
तब मैंने कहा,—क्या विवाह सन्तान-सुख के लिये ही किया
जाता है ? और कोई प्रयोजन नहीं ?
तब सखियों की ओर से मुझे यह जवाब मिला कि हाँ, शास्त्र

असली कोकशास्त्र १३
मर्यादा तो यही है, किन्तु तुम्हारी अभिलाषा भी हम समझती हैं।
धर्म-मर्यादा में रहते हुए उसका पूरा होना कठिन है। क्योंकि
लिखा है—“काम अष्टगुणः स्मृतः ।” अर्थात् स्त्रियों में आठ
गुना काम होता है। उसे दबाने के लिये अष्टगुणी कामी पुरुष की
आवश्यकता है। जिसका मिलना असंभव है। धर्म-मर्यादा में एक
पति से अधिक हो नहीं सकता, इस लिये काम शान्ति हो
नहीं सकती। अतएव हम सब पछता रही हैं और तुम्हें सावधान
करती हैं।
सखियों का ऐसा कथन सुनकर मैंने ऐसी प्रतिज्ञा की कि जब
तक मेरी इच्छा पूर्ण करने वाला कोई वर नहीं मिलेगा तब तक मैं
विवाह ही नहीं करूँगी। सो बराबर कई वर्ष से अनुकूल वर की
खोज में घूम रही हूँ किन्तु अभी तक जब कोई नहीं मिला तब
मैंने सोचा शायद राज-द्वार में मिल जाय। इसी लिये यहाँ आयी
थी, किन्तु अष्टगुणी पुरुष...
कोका पण्डित ने बीच ही में रोककर कहा,—तुम्हारे द्वार
में आते ही प्रश्नोत्तर से मैंने निश्चय कर लिया था कि तुम हस्तिनी
जाति की स्त्री हो। रहा अष्टगुणा कामी पुरुष, सो उसका मिलना
नितान्त असंभव है। किन्तु तुम निराश न हो। तुम्हारी आशा
पूरी हो जायगी। स्त्री की इच्छा पूरी करने के लिये अधिक कामी
पुरुष की आवश्यकता नहीं, केवल कुछ क्रियाओं का ज्ञान होना
चाहिये।

१४ असली कोकशास्त्र

महाराज ने कहा,—अच्छा तो आप इसको सन्तुष्टि का साधन
बतला दें ।
कोका पण्डित ने रमणी से कहा,—तुम मेरी एक बात मानोगी ?
रमणी ने कहा,—हाँ मानने योग्य होगी तो अवश्य मानूँगी ।
मन्त्री ने कहा,—तुम अपने सदृश्य रूप-यौवन-सम्पन्न किसी
पुरुष से विवाह कर लो। मैं तुम्हारी तृप्ति उसी पुरुष से करा
दूँगा, यह मेरी प्रतिज्ञा है। यदि मैं तुम्हारी इच्छा पूरी न करा
सकूँगा, तो मन्त्री पद का त्याग कर दूँगा। मुझे विवाह से पूर्व उस
पुरुष को दिखा देना। अस्तु, घर का पता राज-दर्बार में लिखा दो
और घर जाओ ।
रमणी मन्त्री के कथनानुसार दर्बार से चली गयी ।
[ ४ ]
एक वर्ष के बाद गोद में बालक लिये एक रमणी ने दर्बार में
प्रवेश किया। उसके साथ एक खूबसूरत नौजवान आदमी भी था।
रमणी ने महाराज को सनम्र झुककर प्रणाम किया और बोली,—
महाराज की जय हो !
महाराज ने कहा,—क्या पारसाल दर्बार में आप ही आयी थीं ?
रमणी ने कहा,—हाँ महाराज ! मैं ही आयी थी। आपके
प्रधान मन्त्री कोकापण्डित जी की वाणी सत्य हुई। आज मैं
अपनी सखियों के साथ बड़े सुख से हूँ। मेरी सखियाँ भी पंडित
जी के बताये उपाय से काम ले रही हैं। उनकी भी मनोकामनायें

असली कोकशास्त्र १५
पूर्ण हो रही हैं। हम लोगों की एक सनम्र प्रार्थना है कि इन उपायों
का प्रचार सब देश में जिस प्रकार हो सके, उसके करने की आप
कृपा करें। हमारे समान अनेक दुःखित नर-नारियों का बड़ा
उपकार होगा।
महाराज ने कहा,—मुझे बड़ी खुशी हुई जो आप लोगों की
सन्तुष्टि हो गयी। कोकापणिडत बड़े विचारी पुरुष हैं। वे लोको-
पकार के लिये कुछ उठा न रक्खेंगे।
दर्बारी लोग भी बड़े प्रसन्न हुए। उनकी श्रद्धा भी कोका
पणिडत के प्रति बहुत बढ़ गयी।
[ ५ ]
कुछ वर्षों के बाद कोका पणिडत ने 'कोक मञ्जरी' नामक एक
ग्रन्थ लिखकर महाराज के हाथ में दिया। महाराज ने उसे आद्यो-
पान्त पढ़ा। पढ़कर बड़े प्रसन्न हुए और बोले—कोक मंजरी के
बजाय इसका नाम “कोकशास्त्र” रक्खा जाय तो अच्छा है, क्योंकि
आपके 'कोक मंजरी' शब्द का तात्पर्य आपसे किये हुए अनेक मतों
का संग्रह है। आपने दूसरे मतों का दिग्दर्शन अवश्य कराया है।
किन्तु उनकी तरकीब और अनुभवी ओषधियों का योग आपकी
कृति है। इस लिये दूसरों के लिये वही शासन का बनाने वाला
सिद्ध होगा। सच तो यह है कि मुझे कोकशास्त्र नाम ही अधिक
प्यारा प्रतीत होता है।

१७ असली कोकशास्त्र
कोका पण्डित ने कहा,–जैसी आपकी इच्छा। मुझे कोई
एतराज नहीं।
उस दिन से यह ग्रन्थ कोकशास्त्र के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
इसमें जिन सुगम उपायों का वर्णन किया गया है, वह पढ़ने से ही
मालूम हो सकता है। यद्यपि इनमें भी वाममार्गियों ने बहुत कुछ
मेल-जोल किया, जैसे चौरासी आसन आदि। किन्तु यदि संशो-
धन पूर्वक काम लिया जाय तो किसी प्रकार की हानि नहीं हो
सकती।
कोका पण्डित का यह संक्षिप्त जीवन पाठकों की भेंट किया
गया। आगे कोकशास्त्र के सम्बन्ध में लिखा जायगा। शमिति।

२ असली कोकशास्त्र १७
कोकशास्त्र का प्रयोजन
धर्मार्थकाममोक्षाणां शरीरं साधनं यतः।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन सब का साधन शरीर ही है।
प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह इस मल-मूत्र वाही शरीर से
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार अमूल्य रत्नों को उत्पन्न करे।
जो मनुष्य इन चारों में से एक को भी धारण नहीं करता, शास्त्र-
कारों ने उसका जन्म बिल्कुल ही निरर्थक कहा है। जैसे—
धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोपि न विद्यते।
अजा गलस्तनस्येव तस्य जन्मनिर्थकम् ॥
मनुष्य के शरीर में जितनी भी इन्द्रियें हैं, वे किसी न किसी
काम को अवश्य सिद्ध करती हैं। जैसे आँख रूप को, नाक गन्ध
को, जिह्वा रस को, काम शब्द को और त्वचा स्पर्श को बतलाती
है। इसी प्रकार हाथ, पाँव आदि कर्मेन्द्रियाँ भी समझ लेना
चाहिये। अर्थात् सम्पूर्ण शरीर का प्रयोजन धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
इन चारों वर्गों की प्राप्ति करना है। जिस प्रकार बकरी के गले में
लटकने वाले स्तन किसी भी काम में नहीं आते, ठीक उसी प्रकार
उस मनुष्य का जीवन भी व्यर्थ है जो इस चतुर्थ वर्ग में से किसी
का सेवन नहीं करता।
लोगों का ऐसा विचार है कि धर्म की अपेक्षा पहले अर्थ का

१८ असली कोकशास्त्र
संग्रह करना चाहिये। क्योंकि धन से ही धर्म हो सकता है। किन्तु
यह उनकी भूल है। कारण धर्म का नाश कर धन उपार्जन करने
वाले का धर्म नाश कर देता है। जैसे—
धर्म एव हतो हन्ति धर्मोरक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
॥ मनुः ॥
धर्म की ही रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि रक्षा किया हुआ धर्म-
रक्षा करनेवाले की रक्षा करता है ओर नाश किया हुआ धर्म नाश
करने वाले का नाश कर देता है।
इसी लिये धर्म को सब से पहले स्थान दिया गया। धर्म का
अर्थ धारण करनेवाला है। जिस प्रकार अग्नि में दाह ओर रूप
उसका धर्म होता है, जब तक ये दोनों विद्यमान रहते हैं तब तक
उसके पास शेर तक के आने की भी हिम्मत नहीं होती। उन दोनों
के निकल जाने पर जब राख शेष रह जाती है, तब उस पर छोटी से
छोटी चींटी भी पाँव देकर निकल जाती है। इसी प्रकार धर्म के
रहते वस्तु की सत्ता रहती है और उसके नाश होते ही वस्तु की
सत्ता का भी अभाव हो जाता है।
धर्मपूर्वक सञ्चित किये हुए धन से ही धर्म किया जा सकता
है। अधर्म से उत्पन्न किये हुए धन से धर्म नहीं हो सकता ! क्यों
कि चोर चुराये हुए धन का यदि दान कर दे तो उसे क्या चोरी

असली कोकशास्त्र १६
की सजा न मिलेगी ? इस लिये धर्मपूर्वक ही धनोपार्जन करना
चाहिये ।
धर्मपूर्वक जो अर्थ सञ्चित किया जाता है, उसी से सब काम
नायें पूरी करनी चाहियें । जो इस क्रम से वर्त्तता है, वही पुरुष
मोक्ष को प्राप्त होता है ।
काम के अर्थ इच्छा और रति लिये जाते हैं । धर्म की खोज
के लिये अनेक शास्त्र लिखे गये । अर्थोपार्जन करने के लिये भी
अनेक उपाय बतलाये गये । मोक्ष प्राप्ति के लिये भी अनेक साधन
शास्त्रों में वर्णन किये गये । इनमें किसी को भी किसी प्रकार का
विवाद एवं शंका करने की गुञ्जाइश नहीं मिली ।
किन्तु काम के सम्बन्ध में जब कभी विचार किया जाय तो
इसे बड़ी उपेक्षा की दृष्टि से यह कहकर टाल देते हैं कि इसमें
रक्खा ही क्या है ? यह तो सहज-प्रकृति है । यह बिना समझाये-
बुझाये ही सबको आ जाता है । किन्तु देखा जाय तो उनका यह
बड़ा ही अनर्गल विचार दिखायी देता है । क्योंकि जब किसी छोटे
से छोटे काम को भी करने के लिये मनुष्य तैयार होता है तो उसके
लिये उसे सैकड़ों सामान इकट्ठे करने पड़ते हैं । जैसे भोजन को
ही ले लीजिये । क्या मनुष्य गेहूँ उबाल कर खाने से पेट नहीं भर
सकता ? वह उसकी रोटी क्यों बनाता है । जब केवल नमक से
ही दाल का काम चल सकता है तब छौंकने की क्या जरूरत ?
गेहूँ, चना, घी, चीनी, दूध आदि पदार्थों से मनुष्य को सभी स्वाद