रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र ७
महाराज ने मंत्रीजी से कहा,—मन्त्रीजी, अब हमलोगों की
इच्छा परमात्मा ने पूर्ण कर दी। अब हमें राज-पाट का भार लड़कों
को सौंप देना चाहिये। मेरी समझ में अब लड़के पूर्ण योग्य हो
गये हैं।
थोड़ी देर के बाद कोकापंडित की बुद्धि की परीक्षा के लिये
उन्हें सम्बोधन कर महाराज ने कहा,—जितना प्रेम संतान के प्रति
माता-पिता को होता है, उतना संतान को माता-पिता के प्रति
होता है या नहीं ?
कोका पंडित ने उठकर बड़ी नम्रता के साथ कहा,—राजन्,
यह प्रश्न जितना कठिन है, उतना ही महत्वपूर्ण भी है। मैं
इसका उत्तर अपनी स्वल्प-बुद्ध्यनुसार देता हूँ। संभव है कोई
त्रुटि हो तो उसे महाराज क्षमा करेंगे।
कोका—दोनों में निःस्वार्थ-प्रेम बराबर ही होता है, किन्तु
स्वार्थमय-प्रेम में अवश्य अन्तर होता है।
महाराज ने कहा,—क्या कोई दृष्टान्त देकर समझा सकते हो ?
कोका पण्डित ने कहा,—हाँ इतिहास में ऐसे बहुत से उदा-
हरण आये हैं। जैसे हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को कितने कष्ट
दिये ? सिर्फ इस लिये कि वह ईश्वर के स्थान पर उसी के नाम
की माला फेरे। दूसरा उदाहरण है अर्जुन का। जिसने अपनी सेना
की रक्षा के लिये अपने बूढ़े पितामह भीष्म जी के प्राण उन्हीं से
उपाय पूछ कर लिये। यहाँ दोनों स्थान पर स्वार्थ था। जहाँ स्वार्था-