रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ असली कोकशास्त्र
एक दिन महाराज ओर प्रधान-मन्त्री काश्मीरी पर्वतों पर
भ्रमण करनेके लिये गये थे । काश्मीर देश ऐसा सुन्दर पहाड़ियों से
घिरा हुआ है, जो दुर्ग की प्राचीर की भाँति उसे चारो ओर से
घेरे हुए हैं । उन पहाड़ियों पर अंगूर, फालसा, अखरोट, बादाम
आदि अनेक प्रकार के मेवे हर समय, मौसिम के लिहाज से लदे
रहते हैं । कन्द-फल-फूल की तो गिनती ही नहीं । ऐसा हरा-भरा
प्रदेश भू-मण्डल पर और कहीं दिखयी नहीं देता, यह अत्युक्ति
नहीं, बल्कि यथार्थ ही है ।
उन पर्वतों की गुफाओं में तपस्वी, योगी, महात्मा भी निवास
करते हैं । जिनको सभी प्रकार की सुविधायें प्राप्त हैं । पीने के
लिये शीतल जल के झरने और खाने के लिये तरह-तरह के मेवे !
ईश्वरीय-सृष्टि देखने के लिये नाना प्रकार के रंग-बिरंगे पशु-पंक्षियों
के कलोल दिखयी देते हैं ।
महाराज और मन्त्री पर्वत प्रदेशों में घूमते हुए जब एक झरने
पर जा बैठे, तब उन्हें एक हिरन-हिरनी का जोड़ा नदी तट पर
दिखायी दिया । उनके साथ दो छोटे-छोटे बच्चे भी उछल-कूद
मचा रहे थे । हिरनी बड़े स्नेह के साथ उन बच्चों की ओर देख
रही थी । बच्चे जब कुछ दूर हट जाते थे, अथवा झाड़ो की ओट
में हो जाते थे तो हिरनी व्याकुल होकर उन्हें ढूँढ़ने के लिये
झाड़ियों का चक्कर लगाती थी । हिरन मन्थर-गति से इधर-उधर
घूम रहा था ।