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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 440 में से

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असली कोकशास्त्र ११
मन्त्री ने कहा,—और क्या ? आप स्पष्ट क्यों नहीं कह देतीं,
आप क्या चाहती हैं ?
उस स्त्री ने कहा,—फूल का जीवन कब सार्थक माना जाता है?
मन्त्री ने कहा,—जब वह भोग में आ जाय ।
रमणी ने कहा,—हाँ, आप कुछ समझदार मालूम होते हैं।
सम्भवतः आप मेरे दृष्टान्त से दार्ष्टान्त को भी समझ गये
होंगे ?
कोका पंडित थोड़ी देर तक मन ही मन सोचकर बोले,—हाँ,
तुम्हारे अभिप्राय को मैंने कुछ समझा । क्या तुम पुष्प की भाँति
अपने आप को सार्थक करना चाहती हो ?
स्त्री ने कुछ जवाब नहीं दिया । महाराज बड़े गौर से उन दोनों
की बातें सुन रहे थे । उन्होंने कोका पंडित से कहा,—इन बातों
का कुछ मतलब समझ में नहीं आया ।
कोका पंडित ने कहा,—महाराज, यह कामिनी काम-विह्वला
दिखायी दे रही है । कामान्ध होकर इसने उपरोक्त बातें कही हैं।
महाराज ने कहा,—तो इसका उपाय क्या किया जा सकता
है ? क्या इसका पति नहीं है ? यह काम तो उसी का है, इसका
राज-द्वार से क्या सम्बन्ध ?
मन्त्री ने कहा,—आपका कहना सत्य है। किन्तु जब उसकी
सन्तुष्टि नहीं होती, तब वह राजद्वार में न कहे तो और कहाँ
कहे ?