रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र ३
उनकी इन हरकतों को देखकर महाराज का मन उदास हो
गया और किसी अज्ञात भाव के उदय हो जाने से उनके नेत्रों में
जल भर आया। उन्होंने अश्रु-बिन्दु छिपाने के लिये अपना मुख
उस ओर से फेर लिया। मन्त्री निकट ही बैठे हुए थे। उनसे महा-
राज का यह व्यापार नहीं छिपा। उन्होंने कहा—महाराज, आपकी
ऐसी करुण-दशा क्यों दिखायी दे रही है ? कौन दुःखद विचार
आपके हृदय में उत्पन्न हुआ जिससे ऐसे सुन्दर आनन्दप्रद प्रदेश
में रहते हुए भी आपकी आँखों में आँसू छलक आये ? आज तक
आपने कोई बात मुझसे छिपाने की चेष्टा...
बीच ही में रोककर महाराज ने कहा, —यह सच है, मैंने कभी
कोई बात आपसे नहीं छिपायी और इसके छिपाने की भी कोई
आवश्यकता नहीं प्रतीत होती। मन्त्रिन्, आपने वह मृगों का जोड़ा
अपने बच्चों के साथ खेलता हुआ देखा ? देखो, वह निर्जन प्रदेश में
कैसे आनन्द से मनोविनोद कर रहा है। उसके पास दुःख और
त्रास का लेश भी दिखायी नहीं देता। हम राजा हैं, हमारे पास
सेना है, घोड़े हैं, हाथी हैं, तथा ऐशो-आराम के सभी सामान
मौजूद हैं। महल और उनमें रहनेवाली रानी, सेवक सेविकायें भी
हैं। किसी प्रकार की धन-सम्पत्ति की भी कमी नहीं। इतना सब
कुछ होने पर भी सब व्यर्थ है। पुत्र-हीन-गृह श्मशान के समान
प्रतीत होता है। इन मृगों के पास उनमें से कोई भी वस्तु नहीं;
किन्तु ईश्वर-प्रदत्त वस्तुओं का उपभोग करते हुए केवल अपने पुत्रों