रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
८० रसिकप्रिया
शब्दार्थ — मनुहारि कियें = चिरौरी करने पर । पलिका = पलंग । भय-
भीनै=भयभीत । कोरहिं=क्रोड़ में, गोद में । कोरिक=करोड़, बहुत अधिक ।
उससे=निकलने पर ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) हे सखी उस (नायिका) ने
(नायक द्वारा) पैरों पड़ने और चिरौरी करने पर (किसी प्रकार) भयभीत
होकर पलंग पर पर रखा । (पुनः) करोड़ों कसमें खाने पर (किसी प्रकार) गोद
में सो गई । तब साहस करके उन्होंने (नायक ने) मुख से मुख छुलाया । क्षण
मात्र के इस सुख में उन्होंने सभी सुख प्राप्त कर लिए । उस (नायिका) के
एक ही उच्छ्वास के निकलने से और सभी सुगंधें बिदा हो गईं । (दब गईं—
उसके मुख की सुवास के सर्वोत्कृष्ट होने के कारण ) ।
अलंकार—हेतु ।
मुग्धा के सुख-लक्षण—( दोहा )
(७४) मुग्धा सुरख करै नहीं, सपनेहूँ सिख मानि ।
छल-बल कीनें होति है, सुख-सोभा की हानि ! २८।
शब्दार्थ — कीनें = करने से ।
यथा—( कवित्त )
(७५) सुख दै सखीनि बीच दै कै सौंहैं चाइ कै,
खवाइ कछू स्वाइ बस कीनी बरबसु है ।
कोमल मृनालिका सी मल्लिका की मालिका सी,
बालिका जु डारी मीड़ि मानुसु कि पसु है ।
जानै न बिभात भयो केसव सुनै को बात,
देखौ आनि गात जात भयो किधौं असु है ।
चित्र सी जु राखी वह चित्रिनी बिचित्र यह,
देखौ धौं नए रसिक या में कौन रसु है । २६।
शब्दार्थ—सुख दै = सुख की सामग्रियां जुटाकर । बीच दै = मध्यस्थ
बनाकर । सौंह = शपथ । खवाइ कछू = कुछ मादक द्रव्य खिलाकर । बर-
बसु = बल से, जबरन । मृनालिका = कमलनाल । मल्लिका = बेला ।
मीड़ि = मसलकर । मानुसु = मनुष्य । बिभात=प्रभात, प्रातःकाल । आनि =
आकर । गात = ( गात्र ) शरीर । असु = प्राण । धौं = क्यों नहीं । रसु =
आनंद ।
२८—सिख-सुख । २६—चाइ-साइ । कि-के । वह-यह । यह-अति;
गति । देखौ-कहि; कहो ।
६ तृतीय प्रभाव ८१
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायक से) आपने बरबस उसे (नायिका को)
सुख देकर (सुख की सामग्रियाँ जुटाकर), सखियों को मध्यस्थ बनाकर, शपथ
खाकर, कुछ नशीली वस्तुएँ खिलाकर तथा सुलाकर अपने वश में किया ।
फिर कमलनाल सी कोमल एवम् बेले की माला की भाँति (सुकुमार एवम्
सुगंध ) वाला को मसल डाला । आप मनुष्य हैं या पशु ? (क्योंकि आपके
कर्म कठोर हैं, निर्दयतापूर्ण हैं) आपको अभी तक यही पता नहीं चला कि
प्रभात हो गया है (अभी तक आपने उसे मुक्त नहीं किया) । मेरी बात ही
नहीं सुन रहे हैं। जरा इसके शरीर को तो देखिए, जान पड़ता है प्राण निकल
से गए हैं। उस चित्रिनी (नायिका) को आपने विचित्र गति (ढंग) से
रखा है, वह तो चित्र-सी (स्थिर निर्जीव) हो गई है। हे नए रसिक, देखते
क्यों नहीं ? आपको ऐसा कृत्य करने में कौन-सा आनंद मिला ?
अलंकार—विषम ।
मुग्धा को मान— ( दोहा )
(७६) मुग्धा मान करै नहीं, करै तौ सुनहु सुजान ।
त्यों डरपाइ छुड़ाइयै, ज्यों डरपै अज्ञान ।३०।
शब्दार्थ—डरपाइ = भयभीत करक ।
यथा— ( सवैया )
(७७) बोलै न बाल बुलावतहूँ नख-रेख लिखै भुव प्रेम-परेखौ ।
आपनो हाथ बिलोकि-बिलोकि कह्यो तब केसव बुद्धिबिसेखौ ।
छोटी-बड़ी बिधि-रेख लिखी जुग आयु की रेख सुं कौन जु लेखौ ।
प्रेम तें बोल सह्यो न पर्यो अकुलाइ कह्यो पिय कैसी है देखौ ।३१।
शब्दार्थ—वाल = नायिका । भुव = भूमि । प्रेम-परेखौ = प्रेम की परीक्षा
में, प्रेम के मान में । बुद्धिबिसेखौ = विशेषबुद्धिवाले (नायक) ने । बिधि =
ब्रह्मा । जुग = दो । सु = वह । लेखै = समझी जाए । देखौ = देखा जाए ।
भावार्थ—(मुग्धा ने सखियों के कहने से मान किया है, नायक चतुराई
से उसे भयभीत करके मान छुड़ा रहा है) नायिका (नायक के) बुलाने पर
भी नहीं बोलती, प्रेम का मान ठानकर नखों से पृथ्वी पर रेखाएँ खींच रही
है। यह देखकर चतुर नायक ने अपना हाथ देख-देखकर यह कहना आरंभ
किया कि ब्रह्मा ने छोटी-बड़ी दो रेखाएँ बनाई हैं। इनमें आयु की रेखा कौन
सी मानी जाय ? प्रेम के कारण नायिका इन वचनों को सह न सकी (वह
डर गई कि कहीं आयु की रेखा छोटी ही न हो, नायक की आयु कम ही न
३०—करै-करहि । सुनहु०-सुनौ-निदान । त्यों-यों न्यों । ३१-परेखौ,
लेखौ आदि-परेखें, लेखें आदि ।
८२ रसिकप्रिया
हो ) ; उससे मौन नहीं रहा गया । उस (नायिका) ने व्याकुल होकर कहा—
'प्रियतम, कैसी रेखा है, देखें तो' ।
अलंकार—विशेषोक्ति ( बुलावतहूँ न बोलै ), पर्यायोक्ति (दूसरी) ।
(७८) अथ मध्या के चतुर्भेद—( दोहा )
मध्या आरुढ़जोबना, प्रगल्भवचना जानि ।
प्रादुर्भूतमनोभवा, सुरतिबिचित्रा आनि ।३२।
शब्दार्थ—आनि = अन्य ।
(७६) अथ मध्या-आरूढ़यौवना-लक्षण—(दोहा)
मध्या आरुढ़जोबना, पूरन जोबनवंत ।
भाग सुहाग भरी सदा, भावति है मन कंत ।३३।
यथा—( कवित्त )
(८०) चंद को सो भाग भाल, भ्रुकुटी कमान ऐसी,
मैन कैसे पैने सर नैननि बिलासु है ।
नासिका सरोज, गंधबाह से सुगंधबाह,
दारधौं से दसन केसौ बीजुरी सो हासु है ।
भाई ऐसी ग्रीव-भुज, पान सो उदर अरु,
पंकज से पाइ गति हंस की सी जासु है ।
देखी है गुपाल एक गोपिका मैं देवता सी,
सोने सो सरीर सब सोंधे की सी बासु है ।३४।
शब्दार्थ—चंद को भाग = चंद्र के भाग सा, आधे चंद के समान ।
भाल = ललाट । कमान = धनुष । मैन = मदन, कामदेव । पैने = तेज,
तीक्ष्ण । सर = बाण । बिलासु = खेल, नेत्रों की गति । गंधबाह = सुगंध को
वहन करनेवाली, सुगंधित वायु । सुगंधबाह = सुगंध का प्रवाह ( मुखवास ) ।
दारधों = अनार । दसन = दाँत । भाई = खराद पर से उतारी हुई (सुडौल) ।
पान = पत्ता ( पीपल का ) । पंकज = कमल । देवता = देवबाला । सोंधे =
सुगंध । बासु = वास, सुगंध ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायक से ) हे गोपाल, मैंने एक देवबाला
सी ( अत्यंत रमणीय ) गोपिका देखी है । उसका भाल चंद्राधं के समान है,
भौंहें धनुषाकार हैं, नेत्रों का विलास काम के तीक्ष्ण बाणों के समान है ।
नासिका कमल सी, मुखवास सुगंधित पवन के समान है । दाँत अनार के दाने
के समान हैं और हास बिजली के समान है । ग्रीवा और भुजाएँ खराद पर से
उतारी हुई सी हैं । उदर (पीपल के) पत्र के समान है, चरण कमल की भाँति
३२ - जानि-जान । आनि-मान । ३४ - ऐसी-की सी । कीसो-कैसो ।
तृतीय प्रभाव ८३
हैं। चाल हंस की सी है। उसके सोने की भाँति (गौर) शरीर में समस्त सुगंधों
की सी सुगंध है (सोने में सुगंध नहीं होती परंतु इसके शरीर में सुगंध भी है) ।
अलंकार — धर्मलुप्तोपमा की माला ।
सूचना—( १ ) नायिका के सौंदर्य की अधिकता वस्तु से नायक क
मिलाना वस्तु व्यंग्य है । ( २ ) केशव ने 'देवता' शब्द को संस्कृत की ही
भाँति स्त्रीलिंग माना है। ( ३ ) 'बासु' शब्द स्त्रीलिंग है। उसमें उकारांत
रूप मिथ्यासादृश्य से और तुकांत के अनुरोध से है।
अथ प्रगल्भवचना-मध्या-लक्षण—( दोहा )
(८१) प्रगलभवचना जानि तिहि, बरनौ केसवदास ।
बचननि माँझ उराहनो, देइ दिखावै त्रास ।३५।
शब्दार्थ — तिहि = उसको । माँझ = में । उराहनो = उपालंभ ।
यथा—( सवैया )
(८२) कान्ह भलें जु भलें ढँग लागे भलें इन नैननि के रँग रागे ।
जानति हौं सबहीं तुम जानत आपु से केसब लालच लागे ।
जाहु नहीं, अहो जाहु चले, हरि जात जितै दिनहीं बनि बागे ।
देखि कहाँ रहे धोखें परे उबटौगे जू देखौ ब देखहु आगे ।३६।
शब्दार्थ—भलें ढँग लागे = अच्छा ढंग पकड़ा है । नैननि के रंग रागे=
नेत्रों के रंग में अनुरक्त होकर ( जिससे नेत्र मिल जाते हैं उसी के साथ प्रेम
कर बैठते हैं ) । लालच लागे = लोभ में लगे हुए । दिनहीं बनि बागे = जहाँ
प्रतिदिन वेशभूषा बनाकर जाते हैं । उबटौगे = चित्त से उतर जाओगे ।
देखौ ब देखहु आगे = अभी क्या है, आगे देखिए इस करतूत से आप दिन-दिन
चित्त से उतरते ही जाएँगे ।
भावार्थ—(·नायिका नायक की अन्यस्त्री-विषयक प्रीति को लक्षित करके
व्यंग्यपूर्वक उलाहना देती है ) हे कान्ह, आप बड़े भले हैं और आपने अच्छा
ढंग पकड़ा है । यह भी अच्छा ही किया कि नेत्रों के प्रेम में अनुरक्त हुए
(अन्य नायिकाओं से नेत्र मिलाकर उन पर आसक्त हुए), मैं (खूब ) सम-
झती हूँ । स्वयम् लोभ में पड़े हुए आप औरों को भी अपनी तरह (लालची)
समझते हैं । जाइए, जाते क्यों नहीं । जहाँ आप प्रतिदिन • वेशभूषा बनाकर
जाया करते हैं, वहीं जाइए न । आप धोखे में पड़े हुए मुझे क्या देख रहे हैं ।
ऐसी करतूतों से चित्त से उतर गए हैं और उतर जाइएगा । अभी क्या है,
आगे इस प्रकार की करनी से अधिकाधिक चित्त से उतरते ही जाएँगे ।
३५—बरनौं-बरनै । देइ-देखि । ३६—इन्ह-ह्वैहै, ह्रै हैं । जितै-जहाँ ।
दिन- नित । उबटोगे जू०-उभिटे किसे देखिबे ।
८४ रसिकप्रिया
विवेचन—'उबटोगे' का अर्थ सरदार कवि ने भिन्न किया है। उन्होंने
'उबटबो' का अर्थ माना है—किसी बात से जो अभिमान की वृद्धि हो जाए
उसके प्रदर्शन को 'उबटना' कहते हैं। 'हिंदी शब्दसागर' में दूसरा पाठ स्वी-
कृत किया गया है और 'उभिटना' का अर्थ 'ठिठकना, हिचकना, भिटकना'
किया गया है। प्रसंग से 'ठिठकना' ही समुचित हो सकता है। 'आप जिसे
देखने की घात लगाए रुके हैं' ऐसा अर्थ दूसरे पाठ का भासित होता है।
'शब्दसागर' में पाठ यों है—'उभिटे कैसे ! देखिबो देखहुँ आगे'।
अथ प्रादुर्भूतमनोभवा-मध्या-लक्षण—(दोहा)
(८३) प्रादुर्भूतमनोभवा मध्या कहौं बखानि।
तन मन भूषित सोभियै केसव कामकलानि।३७।
शब्दार्थ—सोभियै = शोभित होती है।
यथा—(सवैया)
(८४) आजु मैं देखी है गोपसुता इक, होइ न ऐसी अहीर की जाई।
देखतहीं रहियै दुति देह की देखे तें और न देखी सुहाई।
एक ही बंक बिलोकनि ऊपर वारैं बिलोकि त्रिलोक-निकाई।
केसवदास कलानिधि सो बर बूझियै काम कि मेरो कन्हाई।३८।
शब्दार्थ—जाई = पुत्री। कलानिधि = चंद्रमा। देखे तें = देखने से।
देखी—देखी हुई (सुंदरियाँ)। बर = पति। बूझियै=जान पड़ता है।
शब्दार्थ—(सखी की उक्ति सखी प्रति) हे सखी, आज मैंने एक अतीव
सुंदर गोपकन्या देखी है। अहीर की पुत्री (गोपिका) ऐसी सुंदर नहीं हुआ
करतीं। जिसके शरीर की कांति ऐसी है कि बराबर देखते रहने की ही इच्छा
होती है। अन्य ऐसी देखी हुई सुंदरियाँ उसे देख लेने पर अच्छी ही नहीं
लगतीं। मैं उसकी एक ही टेढ़ी चितवन देखकर, तीनो लोकों की सुंदरता उस
पर न्यौछावर कर देती हूँ। ऐसी सुंदरी का पति या तो चंद्रमा होगा या
कामदेव ? (इस पर सखी ने उत्तर दिया कि नहीं) मेरे श्रीकृष्ण।
सूचना—चौथी पंक्ति में 'कि' के स्थान पर 'की' पाठ मानकर यह अर्थ
भी लगाया जाता है—'संपूर्ण काम की कलाओं की निधि मेरे कन्हाई ही
इसके बर जान पड़ते हैं'।
अलंकार—उत्तर।
अथ सुरतविचित्रा मध्या-लक्षण—(दोहा)
(८५) अति बिचित्रसुरता सु तौ, जाको सुरत बिचित्र।
बरनत कविकुल कौं कठिन, सुनत सुहावै मित्र।३६।
३७—सोभियै-सोभिजै, सोहियै। ३८—देखे तें-देखतें। बारैं-बारौं।
बूझियै-बूझिहै। कि-की।
तृतीय प्रभाव ८५
भावार्थ—हे मित्र, विचित्रसुरता नायिका वह है जिसकी रति विचित्र हो ।
कवियों के लिए भी इसका वर्णन कठिन है, पर इसका चरित्र सुनने से आनंद-
दायक होता है ।
यथा—( कबित्त )
(८६) केसौदास सबिलास मंदहासजुत अवि-
लोकनि अलापनि को आनँद अपार है ।
बहिरति सात पुनि अंतरति सात पुनि,
रति बिपरीतनि को बिबिध बिचार है ।
छूटि जाति लाज तहाँ भूषन सुदेस केस,
टूटि जात हार सब मिटत सिँगार है ।
कूजि कूजि उठैं रतिकूजतनि सुनि खग,
सोई तौ सुरत सखी और बिबहार है ।४०।
शब्दार्थ—सबिलास = विलासपूर्वक । अलाप = बोली, वाणी । बहिरति
= बहिंरति, बाह्य रति ( इनका उल्लेख आगे है ) । अंतरति = अंतर्रति, आंतर-
आभ्यंतर रति । बिपरीत रति = ( नायक नायिका के ) विपर्यय से रतिक्रीड़ा ।
सुदेस = सुंदर । रतिकूजतनि = कामक्रीड़ा की ध्वनियों को ( सुनकर ) ।
कूजि कूजि० = उस ध्वनि को सुनकर पक्षी धोखा खाकर उसे पक्षी का कूजना
समझकर उस ध्वनि के प्रत्युत्तर में स्वयम् कूँजने लगते हैं । और बिबहार है =
और ( रति ) तो व्यावहारिक अर्थात् साधारण है, मामूली है।
अथ सात बहिंरति-वर्णन—( दोहा )
[८७] आलिंगन, चुंबन, परस, मर्दन नख-रद-दान ।
अधरपान सो जानियै, बहिरति सात सुजान ।४१।
शब्दार्थ—परस = स्पर्श । नख-रद-दान = नखदान ( नखक्षत ) और
रद ( दंत ) दान ( दंतक्षत ) ।
अथ सात अंतररति-वर्णन—( दोहा )
[८८] थिति, तिर्यक, सनमुख, बिमुख, अध, ऊरध, उत्तान ।
सात अंतरति समुझियै केसवराइ सुजान ।४२।
शब्दार्थ—अंतरति = संभोग के आसन । थिति = स्थित ( खड़े ) । तिर्यक
= तिरछे ( करवट ) । बिमुख = उलटे । अध = अधोमुख । ऊरध = ऊर्ध्वमुख ।
उत्तान = उताने, चित्त ।
४०—पुनि-सुभ, अरु, भाँति । सात-पांच । अंतरति-अंतरित । पुनि-
सुनि । तहाँ-जहाँ । ४१—जानियै-समुझियै । ४२—समुझियै-जानियै ।
उत्तान-उभान । केसवराइ-केसव सकल ।
८६ रसिकप्रिया
सूचना—इसके अनंतर निम्नलिखित दोहा छपी प्रति में मिलता है। यह
खंडित प्रति में भी है, पर पूरी हस्तलिखित और लीथोवाली प्रतियों में नहीं है —
सोरहई सिंगार सब, सोरह सुरत समान।
बुधि बिबेक बल समुझियै, केसव सकल सुजान॥
अथ षोडश शृंगार-वर्णन—( कबित्त )
(८६) प्रथम सकल सुचिमंजन अमल बास,
जावक सुदेश केस-पास को सुधारिबो ।
अंगराग भूषन बिबिध मुखबास राग,
कज्जल-कलित लोल लोचन निहारिबो ।
बोलनि हँसनि मृदु चातुरी चितौनि चारु,
पलपल प्रति पतिब्रत प्रतिपारिबो ।
केसौदास सबिलास करहु कुँवरि राधे,
इहि बिधि सोरह सिगारनि सिंगारिबो ।४३।
शब्दार्थ—सुचि मंजन = पवित्रता से स्नान करना । अमल बास =
स्वच्छ वस्त्र पहनना । जावक = महावर । सुदेस = बढ़िया । केस-पास = केशों
का समूह सँवारना, केशों को भली भाँति बाँधना । अंगराग = शरीर की
शोभा के लिए लेप आदि का प्रयोग [ ये पाँच प्रकार के कहे गए हैं—सिंदूर,
खौर या मस्तक में तिलक, चिबुक में गोदना, मेंहदी और अरगजा या चंदन
का लेप ] भूषन बिबिध = अनेक प्रकार के गहने [ ये भी दो प्रकार के होते
हैं—मणि-सोने के और पुष्पों के ] । मुखबास राग=मुखबास और मुखराग ।
मुखराग दो प्रकार के होते हैं—दंतमंजन और एला-लवंगादि का चर्वण ।
मुखराग = अधरों में रंग लगाना या तांबूल से उन्हें लाल करना । कज्जल-
कलित = काजल से युक्त । लोल = चंचल । निहारिबो = देखना । पल पल
प्रति = प्रतिपल, प्रतिक्षण । प्रतिपारिबो = [ प्रतिपालन ] पालन करना ।
सूचना—हस्तलिखित ( पूरी ) प्रति में और लीथोवाली प्रति में यह
छंद नहीं है ।
अथ सुरतांत—( सवैया )
(६०) सुंदरता पय पावक जावक पीक हियें नखचंद नए हैं ।
चंदन चित्र सुधा, बिष अंजन, टूटि सबै मनिहार गए हैं ।
केसव नैननि नींदमई मदिरा मद घूमत मोहभए हैं ।
केलि कै नागर नागरी प्रात उजागर सागर-भेष भए हैं ।४४।
४३-मंजन-मज्जन । सुधारिबो-सम्हारिबो । निहारिबो-बिहारिबो । मृदु-
चितु । चातुरी-चलनि । प्रतिपारिबो-परिपरिबो । इहि-एही । ४४-नागर ०-
नागरि नागर ।
तृतीय प्रभाव ८७
शब्दार्थ—पय = जल । पावक = अग्नि, बाड़वाग्नि । पीक = पान की
हियें = हृदय में । नखचंद नए = नवीन नखक्षत । चित्र = लेप या चंदन से
बने चित्र । उजागर = प्रकट ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) सुंदरता ( कांति ) ही जल है,
महावर और पान की लगी पीक ही बाड़वाग्नि है, हृदय (छाती) में (ताजा)
लगे हुए नखक्षत ही नए चंद्र ( द्वितीया का चंद्रमा ) है, चित्रित चंदन ही
अमृत है, अंजन ही विष है, मणियों के टूटे हुए हार ( ही रत्न फैले हुए )
हैं, नेत्रों में भरी हुई नींद ही मदिरा है, जिसके नशे में बेहोश होकर वे इधर
उधर घूम रहे हैं । अतः नागरी ( प्रवीण नायिका ) और नागर ( प्रवीण
नायक ) कामक्रीड़ा करने के बाद प्रभात के समय प्रत्यक्ष सागर के वेश में
दिखाई पड़ रहे हैं।
अथ मध्याधीरादि-भेद—( दोहा )
[६१] सिगरी मध्या तीन बिधि, धीरा और अधीर ।
धीराधीरा तीसरी, बरनत हैं कबि धीर ।४५।
शब्दार्थ—सिगरी = सब ।
[६२] धीरा बोलै बक्र बिधि, बानी बिषम अधीर ।
पिय सों देइ उराहनो, सो धीरा न अधीर ।४६।
शब्दार्थ—वक्रविधि = व्यंग्य वाणी से । विषम = टेढ़ी, कड़ी, चुभती ।
अधीर = अधीरा । धीरा न अधीर = धीराधीरा ।
अथ मध्या धीरा, यथा—[ सवैया ]
[६३] ज्यों ज्यों हुलास सों केसवदास बिलास निवास हियें अवरेख्यो ।
त्यों त्यों बढ्यो डर कंप, कछू भ्रम भाँति भयो किधौं सीत बिसेख्यो ।
मुद्रित होत सखी बरहीं मेरे नैन-सरोजनि साँच कै लेख्यो ।
तैं जू कह्यो मुख मोहन को अरबिंद सो है सु तौ चंद सो देख्यो ।४७।
शब्दार्थ—हुलास = आनंद । विलास-निवास = रतिविलासों का निवास
( स्थल ) । हियें = हृदय ( वक्षस्थल ) में । अवरेख्यो = लक्षित किया ।
भ्रम = चक्कर । भाँति = समान, सा । बिसेख्यो = विशेष रूप में बढ़ गया ।
मुद्रित होत = बंद होते हुए । बरहीं = बलपूर्वक । लेख्यो = समझा ।
भावार्थ—( नायिका की उक्ति सखी से ) हे सखी, उल्लासपूर्वक ज्यों-
ज्यों मैंने उनके वक्षःस्थल पर के रतिचिह्नों को ध्यान से देखा त्यों त्यों मेरे
हृदय में कंप होने लगा, कुछ चक्कर सा आने लगा, किंवा ठंडक की अधिकता
४५--हैं कबि० ∙ सुकबि अमीर । ४६—सों-को । ४७—बढ्यो-भयो ।
भाँति-भीत ।
८८ रसिकप्रिया
सी जान पड़ने लगी । मेरे नेत्रकमलों ने बलपूर्वक बंद होते हुए ( आज )
सचमुच इसे समझ लिया कि तू उनके मुख को जो कमल सा कहती थी वह
बात नहीं है, वह तो चंद्रमा की भाँति दिखाई पड़ रहा था ।
सूचना—'कमल' कहने से सखी का तात्पर्य नायिका ने उसे दोषरहित,
स्वस्थानसेवी और समशीलप्रदर्शक मान रखा था, पर आज उसने उसे
'चंद्रवत्' कहकर कलंकी, भ्रमणशील, न्यूनाधिक्य को प्राप्त होनेवाला बतलाया ।
अथ मध्या अधीरा यथा,―( कवित्त )
(६४) तात को सो गात सब बल बल बीर को सो,
मात को सो मुख महामोह मन भायो है ।
थल सो अचल सील, अनिल सो चल चित्त,
जल सो अमल, तेज तेज को सो गायो है ।
केसौदास बसत अकास के प्रकास घोष,
घटघट घरघर घैरु घनो छायो है ।
रति की सी रति, नाथ, रूप रतिनाथ को सो,
कहौ केसौराइ झूठ कौन यहु पायो है ॥४८॥
शब्दार्थ—तात = पिता ( नंद ) । गात = शरीर, देह । बल बीर = भाई
बलदाऊजी । मात = यशोदा । मोह = ममता । थल = ( स्थल ) पृथिवी ।
अचल = अचंचल, क्षमाशील । अनिल = वायु । सील = गुण । अमल =
निर्मल । तेज = प्रभा । तेज = अग्नि । प्रकास = भाँति, ढंग से । घोष = शब्द;
गांव ( ग्वालों का ) । घैरु = ( १ ) घेर, विराव; ( २ ) बदनामी । घनी =
अत्यधिक । रति = कामदेव की स्त्री । रति = प्रीति । रतिनाथ = कामदेव ।
केसौराइ = श्रीकृष्ण । यहु = इस कथन में ।
भावार्थ—(नायिका-वचन नायक से) पिता (नंद) जी की तरह आपका
शरीर है (जैसे वे वृद्धावस्था के कारण काँपते हैं आप भी वैसे ही काँप रहे हैं),
भाई बलदाऊजी का सा बल आपमें है ( वे मदिरा पीकर मतवाले होते हैं
और आप भी मतवाले हैं ) । माता ( यशोदा ) का सा आपका मुख है ( वे
मस्तक पर टीका लगाती हैं आपके मस्तक पर भी टिकुली चिपकी है ) जैसा
महामोह (ममत्व) उनमें है वैसा ही मोह ( मूर्च्छा, जागरण के कारण झपकी
लेना ) आपमें भी है, जो मन को रुचता है । ( पंच तत्त्वों के गुण भी आपमें
मौजूद हैं) । पृथ्वी की भाँति आप अचल गुण वाले हैं (पृथ्वी सर्वंसहा है, आप
भी सब कुछ कही सुनी सह लेते हैं) । पवन की तरह आप चंचल हैं । जल की
भाँति आपका चित्त निर्मल है (जल नीचे की ओर जाता है, आप भी नीचे की
ओर जा रहे हैं ) । अग्नि की सी ही आपकी प्रभा ( मुँह की सुर्खी ) है ।
४८—को सो-कैसो । मुख-मुंह । मोह-मोहूँ । अनिल-अनल ।
तृतीय प्रभाव ८६
आकाश की ही भाँति आपका शब्द और स्थिति घटघट में और घरघर में
भली भाँति व्याप्त है । (आकाश के ही कारण शब्द होता है और प्रत्येक घट
एवम् घर-मठ में उसकी व्याप्ति है—घटाकाश और मठाकाश रूप में । आपकी
बदनामी, गाँव में घटघट (सबके हृदय में) और घरघर व्याप्त है ) । काम की
पत्नी की भाँति आपका प्रेम है ( प्रिय के त्याग पर उसे रोना था आप भी
उस प्रिया के त्याग से दुखी हैं ) । हे नाथ आपका रूप कामदेव की तरह है
( कामदेव अरूप है । आप भी अरूप—बेडंगा रूप—धारण किए हुए हैं) ।
आप ही बतलाइए कि मेरी इन बातों में आपको कौन सी बात झूठ जान
पड़ती है ? ( मैं ठीक ही कह रही हूँ न ! ) ।
अलंकार—उपमाश्रित उल्लेख ।
अथ मध्या धीराधीरा, यथा—(सवैया)
(६५) कान्ह भले जु भले समुझाइहौं मोहसमुद्र कि ज्यौं उमह्यो हो ।
केसव आपनो मानिक सो मन हाथ पराए दै कोनें लह्यो हो ।
नैननिहीं मिलिबो करियै अब बैननि को मिलिबो तौ रह्यो हो ।
जाइ कह्यो तुम जैसे सखीनि सों एह्यो गुपाल मैं ऐसो कह्यो हो ।४६।
शब्दार्थ—उमह्यो हो = उमड़ा था । रह्यो हो = समाप्त हो गया ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति नायक से) हे कान्ह, मैं आपको भली भाँति
समझाऊँगी कि मोहरूपी समुद्र का उमड़ना कैसा हुआ था । क्या किसी ने
माणिक सा अपना मन दूसरे के हाथ देकर (वापस) पाया है ? अब तो नेत्रों
का मिलन रह गया ( कभी कभी दर्शन भर कर लूँगी ) वचनों का मिलन
तो समाप्त हो गया ( आपसे बात न करना ही ठीक है ) । आपने जाकर
सखियों से जैसा ( उलटा सीधा ) कहा है, क्या गोपाल, मैंने ऐसा ही कहा
था ? ( आप इधर उधर की बातें बहुत किया करते हैं) ।
अथ प्रौढ़ा-भेद चतुर्विध—(दोहा)
(६६) सुनि समस्त रसकोबिदा, चित्तविभ्रमा जाति ।
अति आक्रामित नाइका, लब्धायति सुभ भाँति ।५०।
शब्दार्थ—सुनि = सुनो । जाति = भेद !
अथ समस्त रसकोविदा-लक्षण—(दोहा)
(६७) सो समस्तरसकोबिदा, कोबिद कहत बखानि ।
जो रस भावै प्रीतमहिं, तांही रस की दानि ।५१।
शब्दार्थ—कोबिदा=पंडित । रस = आनंद ।
४६—कि-को, की । उमह्यो-उमडघो, उमहो । हो-है । अब-सब ।
जैसें-जैसों, ऐसो । ५०—चित्र०-चित बिभ्रम या जाति, अक्रामितपति आन ।
लब्धायति०-लुब्धापति०, लब्धापतिहु बखान । ५१—दानि-ज्ञानि ।
६० रसिकप्रिया
यथा—( कबित्त )
(९८) देखी है गुपाल एक गोपिका मैं देवता सी,
सोने तें सलोनी बास साँधे तें सुहाई है।
सोभा ही सुभाउ अवतार लियो घनस्याम,
किधौं यह दामिनीयै कामिनी ह्वै आई है।
देवी कोउ मानवी न दानवी न होइ ऐसी,
भानवी न हावभाव भारती पढ़ाई है।
केसौदास सब सुख-साधन की सिद्धि यह,
मेरे जान मैनहीं सों मैनका की जाईं है।५२।
शब्दार्थ—सलोनी = सुंदर। बास = ( वास ) सुगंध। दामिनीयै =
बिजली ही। भानवी = भानु से उत्पन्न। मेरे = जान पड़ता है। भारती =
सरस्वती। मैन = ( मदन ) कामदेव। मैनका = एक अप्सरा।
भावार्थ—(दूती का वचन नायक से) हे गोपाल, मैंने एक अनुपम सौंदर्य
वाली गोपिका देखी है जो सोने से भी (अधिक) सलोनी है और जिसके
शरीर की सुगंध साक्षात् सुगंध से भी बढ़कर है। हे श्याम, या तो स्वयम् सुहा-
वनी शोभा ने ही उसके रूप में अवतार लिया है, या साक्षात् विद्युत ही स्त्री
बनकर चली आई है। कोई देवी, दानवी, सूर्यसमुद्भूता या मानवी ऐसी नहीं
दिखाई पड़ती। ऐसा जान पड़ता है कि स्वयम् सरस्वती ने ही उसे हावभाव की
शिक्षा दी है। वह सभी सुखों के साधन की सिद्धि रूप है, मुझे ऐसा जान
पड़ता है कि स्वयम् कामदेव ने उसे मेनका अप्सरा से उत्पन्न किया है।
अथ विचित्रविभ्रमा-प्रौढ़ा-लक्षण—(दोहा)
(९९) अति बिचित्रबिभ्रम सु बह, प्रौढ़ा कहत बखानि।
जाकी दीपति दूतिका, पियहि मिलावै आनि ।५३।
यथा—( सवैया )
(१००) है गति मंद मनोहर केसब आनंदकंद हियें उलहे हैं।
भौंह बिलासनि कोमल हासनि अंगसुबासनि गाढ़े गहे हैं।
बंक बिलोकनि कों अवलोकि सु मार ह्वै नंदकुमार रहे हैं।
एई तौ काम के बान कहावत फूलनि के बिधि भूलि कहे हैं। ५४।
शब्दार्थ—कंद=जड़। उलहे = उल्लसित। बिलास = भंगिमा, चलाना।
५२—मैं देवता सो-अनूप रूप। सुभाउ-सुहाई। लियो०--लियो स्याम
कीधौं, घनस्याम कीधौं। मानवी-दानवी। दानवी-मानवी। भानवी-मानवी।
हावभाव-होय भावै। पढ़ाई-पठाई। मैनका-मैनकी। ५३—सु वह-सदा।
कहत-प्रगट। ५४—उलहे-उमहे। एई तो-एक तो। कहे-गहे।
तृतीय प्रभाव ६१
सु = सो । मार = काम ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) उसकी गति मंद और मनोहारिणी
है, आनंदकंद ( श्रीकृष्ण ) जिसे देखकर हृदय से उल्लसित हो रहे हैं।
भ्रूभंगिमा, कोमल हँसी और शरीर की सुगंध ने उन्हें भली भाँति पकड़ लिया
है ( वश में कर लिया है )। उसकी टेढ़ी चितवन देखकर नंदकुमार कामदेव
हो रहे हैं ( और सोच रहे हैं कि ) असल में काम के बाण तो ये ही हैं ।
ब्रह्मा ने भूलकर काम के बाणों को फूलों के बाण कहा है ।
अलंकार—अपह्नति ।
अथ आक्रामितनायिका-प्रौढ़ा-लक्षण—( दोहा )
(१०१) सो आक्रामित नाइका, प्रौढ़ा कहि दै चित्त ।
मनसा बाचा कर्मना, जिनि बस कीनो मित्त ।५५।
शब्दार्थ—दै = देकर, लगाकर । मित्त = मित्र, प्रिय, पति ।
यथा—( सवैया )
(१०२) तो हित गाइ बजावत नाचत बार अनेक सिंगारु बनायो ।
जीहू में आन कौ आनिबो छोड़यो री तौऊ न तेरो भयो मनभायो ।
भावै सो तूँ करिबो करि भामिनि भाग बड़े बस तैं करि पायो ।
कान्ह त्यों सूधें जु चाहति नाहि सु चाहति है अब पाइ लगायो ।५६।
शब्दार्थ—हित = लिए । जीहू में = हृदय में भी । आन = अन्य
( दूसरी स्त्रियों को ) । पाइ लगायो = पैर पड़वाना ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका से ) तेरी प्रसन्नता के लिए वे
( श्रीकृष्ण ) गाकर बाँसुरी बजाते हैं, नाचते हैं, और अनेक बार उन्होंने
अपना शृंगार ( वेशभूषा ) भी बनाया । अब वे हृदय में भी किसी दूसरी स्त्री
का ध्यान ले आना छोड़ चुके हैं । इतने पर भी तेरा मनचाहा नहीं हुआ ।
बड़े भाग्य से तूने उन्हें इस प्रकार वश में कर पाया है, अतः तुझे जो अच्छा
लगे वह कर । कान्ह ऐसे सीधे को तू ( प्रसन्नतापूर्वक ) प्यार तो करती नहीं,
अब चाहती यह है कि वे ( अपनी भूल के लिए ) तेरे पैरों पड़ें ।
अथ लब्धायति-प्रौढ़ा-लक्षण—( दोहा )
(१०३) सो लब्धायति जानियै, केसव प्रगट प्रमान ।
कानि करै पति कुल सबै, प्रभुता प्रभुहि समान ।५७।
५५ कहि दै-कहियै, करिबै । जिनि-जिहि । कीनो-कीन्यो । ५६-छाड्यो
री-छांडिबो । तोऊ०-तेरो तऊ न । करे-को । तैं करि-है करि, चोकड़ि ।
त्यों-ज्यों । नाहिं-नाहीं सो ।
६२ रसिकप्रिया
यथा—( सवैया )
(१०४) आज बिराजत हैं कहि केसव श्रीबृषभानु-कुमारि कन्हाई ।
बानि बिरंचि बहिक्रम काम रची जु बची सु बधूनि बनाई ।
अंग बिलोकि त्रिलोक में ऐसी को नारि नहीं जिन नारि नवाई ।
मूरतिवंत सिंगार-समीप सिंगार कियें जनु सुंदरताई ।५८।
शब्दार्थ-- बानि = ( बाणी ) सरस्वती । बिरंचि = ब्रह्मा । बहिक्रम =
वयःक्रम, वयःसंधि । काम = कामना । नारि = स्त्री । नारि = गर्दन । नवाई =
झुकाई ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) आज श्रीवृषभानु की पुत्री
राधिका और श्रीकृष्ण अत्यंत सुशोभित हो रहे हैं। ब्रह्मा ने वयःसंधि की
कामना से ( उसी वृषभानुकुमारी की सुंदरता से ही कुछ लेकर ) सरस्वती
की रचना की, जो बचा उससे संसार की अन्य सुंदर रमणियों का निर्माण
किया । इसी से उसका अंग देखने पर त्रिलोक में ऐसी कोई स्त्री नहीं दिखाई
देती जिसकी गर्दन न झुक जाए । ऐसा जान पड़ता है मानो साक्षात् शृंगार
( श्रीकृष्ण ) के समीप मूर्तिमयी सुंदरता ( राधिका) ही अपना रूप सँवारे
विराजमान हो ।
अलंकार - उत्प्रेक्षा ।
अथ प्रौढ-धीरा-लक्षणा—( दोहा )
(१०५) आदर माँझ अनादरै, प्रकट करै हित होइ ।
आकृति आप दुरावई, प्रौढ़ा धीरा दोइ ।५६।
शब्दार्थ—हित होइ = हितुआ बनकर ।
प्रौढ़ा सादरा धीरा, यथा- ( सवैया )
(१०६) आवत देखि लिये उठि आगैं ह्वै आपुहि केसव आसनु दीनो ।
आपुहि पाइ पखारि भलें जल, पानी को भाजन लाइ नवीनो ।
बीरी बनाइकै आगैं धरी जब बैहर कौं कर बीजना लीनो ।
बाँह गही हरि, ऐसे कह्यो हँसि मैं तौ इतौ अपराध न कीनो ।६०।
शब्दार्थ—बीरी = पान की गिलौरियाँ । बीजना = (व्यजन) पंखा ।
भावार्थ---(सखी की उक्ति सखी से) श्रीकृष्ण को (सपत्नी के यहाँ से)
आते देखकर ( नायिका ने ) आगे बढ़कर उन्हें लिया और स्वयम् ही ( बैठने
को ) आसन दिया । पानी का नवीन बर्तन लाकर स्वच्छ जल से स्वयम् ही
( परिचारिका द्वारा नहीं ) पैर भी धोए । स्वयम् पान के बीड़े भी बनाकर
५८-बहिक्रम-वही क्रम । बची-बरी । नहीं जिन०-निहारि नितारि
बनाई ।
(तश्तरी में) आगे रखे दिए । इसके अनंतर जब उसने (नायिका ने)
श्रीकृष्ण को झलने के लिए अपने हाथ में पंखा लिया तब उन्होंने हाथ पकड़
लिया और हंसकर कहने लगे कि मैंने तो इतना अपराध नहीं किया है (जिसका
मुझे यह दंड दिया जा रहा है) ।
सूचना—चौथे चरण के 'एतो अवराधन कीनों' पाठ से भी अच्छा
अर्थ लग सकता है—श्रीकृष्ण ने हाथ पकड़ लिया और हँसकर कहा कि बहुत
अधिक सेवा (आराधना) हो चुकी (अब बस करो) ।
अथ आकृतिगुप्ता प्रौढ़ा धीरा, यथा—(सवैया)
(१०७) चितवौ चितवाएँ हँसाएँ हँसौ हो बुलाएँ तें बोलौ रहौ नतु मौने ।
सौंह अनेकनि आवहु अंक, करौ रति कों प्रति रैन की रौने ।
ख्वाएँ तें खाहु बरयाइ बिरी जनु आई हौ केसव आज ही गौने ।
मोहन के मन मोहन कों सु कहौ यह धौं सिखई सिख कौने ।६१।
शब्दार्थ—रौने = रोदन ही । अथवा रौना = आगमन । ख्वाएँ = खिलाने
से । बरचाइ = मुश्किल से ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका से) देखने के लिए जब प्रेरित
किया जाता है तब तुम देखती हो, हँसाया जाता है तो हँसती हो, बुलाने से
बोलती हो नहीं तो चुपचाप ही रहती हो । अनेक कसमें खाने पर गोद में
आया (जाया) करती हो । प्रत्येक रात की प्रीति के लिए रोदन सा ठाने
रहती हो (अथवा) प्रीति को रौने के समान संकोचशील किए रहती हो) ।
खिलाने पर भी बड़ी कठिनाई से पान की बीरी खाती हो, मानो आज ही
गौने आई हो । मोहन (जो सबको मोह लेता है) के मन को मोहने के
लिए यह शिक्षा न जाने किसने तुम्हें दी है ।
सूचना—'रौने' का अर्थ 'रौना ही, आगमन ही' करने पर दूसरी पंक्ति
तीसरी के स्थान पर बदल दी जाए तो अच्छा हो । क्योंकि रौना गौने के
अनंतर होता है ।
पुनर्यथा—(सवैया)
(१०८) हित कै इत देखहु देख्यो सबै हित-बात सुनौ जु सुनी सब ही हैं ।
यह तौ कछु और बहै सब ही अरु सौंह करौ ब करी जु तही हैं ।
६०—आगें हूँ-आगेहि । बीरी-बीरा । धरो-धरो । जब-जबै । जब०-
सो जबै हरि । कर-बर । ऐसे-ऐसो । मैं तो-एतो । अपराध न-अवराधन ।
६१—हो-ओ । नतु-तित । ख्वाएँ०-कोइ खवाए तें खाओ बिरी । मोहन
कों-मोहिबे कों ।
६४ रसिकप्रिया
समुझाइ कहौं समुझी सब केसव झूठी सबै हमसौ जु कही हैं ।
मान कियो अपमान करौ तौ हँसौ अब कै हँसिबे कौ रही हैं ।६२।
शब्दार्थ—हितु कै = प्रेमपूर्वक । अरु = (अड़) हठ । अब कै = इस
बार (एक बार) ।
भावार्थ—(नायक-नायिका का संवाद) (नायक) 'प्रेमपूर्वक इधर
देखो'। (नायिका) 'सब देख चुकी'। (नायक) 'अच्छा प्रेम की बातें ही
सुनो'। (नायिका) 'हाँ, मैंने सब सुन लिया'। (नायक) 'यह तो कुछ
और ही बात है'। (नायिका) (अगर मेरा हठ समझते हो तो) कसम
खाओ (खाकर बतलाओ) कि वहाँ (सपत्नी के यहाँ) 'तुमने क्या
क्या कर्म किए हैं'? (नायक) 'मैंने तो समझाकर कह दिया'।
(नायिका) मैंने समझ लिया कि आपने मुझसे सब झूठी बातें कही हैं ।
(नायक) (मैं समझ गया) 'तुमने मान किया है'। (नायिका) (ऐसा
कहकर तो आप मेरा) 'अपमान कर रहे हैं'। (नायक) (अगर ऐसी बात नहीं
है) 'तो इस बार हँसो तो'। (नायिका) 'मैं तो हँस चुकी (मै नहीं हँसूंगी)' ।
अथ प्रौढ़ा-अधीरा-लक्षण— (दोहा)
(१०६) पति को अति अपराध गनि, हतन कहैं हित मानि ।
कहत अधीरा प्रौढ़ तिहि, केसवदास बखानि ।६३।
यथा— (सवैया)
(११०) हौं सुख पाइ सिखाइ रही सिख सीखे न ए सखितैं हूँ सिखाई ।
मैं बहुतै दुख पाइहू देख्यौ पै केसव क्यौंहूँ कुटेव न जाई ।
दंड दियैं बिनु साधुनिहूँ सँग छूटति क्यों खल की खलताई ।
देखहु दै मधु की पुट कोटि मिटै न घटै बिष की बिषमाई ।६४।
शब्दार्थ—मधु=शहद । बिषमाई=भयंकरता, कटुता ।
भावार्थ—(नायिका नायक की उपस्थिति में सखी से कह रही है) मैं
सुखपूर्वक (बिना अपनी अपनी अप्रसन्नता व्यक्त किए) सिखाचुकी, पर इन्होंने
शिक्षा नहीं ग्रहण की (कहना नहीं माना), तूने भी तो सीख दी (क्या
परिणाम हुआ ! कुछ नहीं) । मैंने (इनकी टेव बदलने के लिए) बहुत कष्ट
उठाकर भी देख लिया, पर इनकी बुरी बान किसी प्रकार छूटती ही नहीं ।
साधुओं के संग में रहने पर भी खलों की दुष्टता बिना दंड दिए छूटती नहीं ।
विष में शहद का चाहे करोड़ों पुट दिया जाय पर विष की कटुता (शहद
की मिष्टता से) दूर नहीं हो सकती ।
६२—देखहु-देखो जू । सब हो-निबही । सब ही-सब है । अरु-अब ।
जु-जू । तही-तुही । कहो-कह्यो । समुझी ०-समुझाइ कै । सब-हम । कियौ-
किए । करौ तो-करै जो । ६३—हतन-हितन । कहै-करै । तिहि-तिय । ६४-
पाइ-खाइ । सखि-सिख । बहुत दुख पाइ-बहुतेहूँ सबाइ । दंड-देहु ।
तृतीय प्रभाव ६५
अलंकार - दृष्टान ।
सूचना - लीथोवाली और छपी प्रतियों में यह छंद नहीं है, पर हस्त-
लिखित प्रतियों में है ।
अथ प्रौढ़ा-धीराधीरा-लक्षण- ( दोहा )
(१११) मुख रूखी बातैं कहै, जिय मैं पिय की भूख ।
धीराधीरा जानिये, जैसी मीठी ऊख । ६५।
यथा-( सवैया )
(११२) हो मन मैलो न जौ लौं कछू अब छोड़हु बोलिबो बोल हँसौहैं ।
केसव औरनि सों रसरासि रसयो रसबाद सबै हम सौं हैं ।
देखहु धौं इक बार सँकोचनि आरस-लोचन आरसी सौंहैं ।
आए जू वैसेई-साज सौं आजु सु भूलि गई पिय काल्हि की सौंहैं ।
शब्दार्थ- मैलो = मलिन, उदासीन । रसरासि = आनंदपूर्णा बातें ।
रसयो=की । रसबाद = ( प्रेम के ) झगड़े । संकोच = लज्जा । सौंहै =
सामने । सौंहैं = शपथें ।
भावार्थ - (नायिका की उक्ति नायक से) हे प्रिय, (जान पड़ता है कि )
आपको कल की शपथें भूल गईं ? क्योंकि आप आज भी वैसे ही साज (वेष)
से यहाँ आए हैं ? मेरा मन आपके प्रति तब तक उदासीन ही रहेगा जब तक
आप अपने ये, हँसीवाले बोल बोलना नहीं छोड़ देते । आप औरों ( सौतों )
से तो आनंदपूर्णा बातें किया करते हैं, सारे झगड़े केवल मेरे ही साथ होते
हैं। एक बार जरा अपने संकोच और आलस्य से भरे नेत्रों को दर्पण के
सामने देख आइए ( फिर मुझसे बातें कीजिए ) । ( रात्रि के जागरण की
गवाही आपका चेहरा दे रहा है ) ।
इति स्वकीया ।
अथ परकीया-लक्षण- ( दोहा )
(११३) सब तें पर परसिद्ध जग, ताकी जु प्रिया होइ ।
परकीया तासों कहैं, परम पुराने लोइ । ६७।
शब्दार्थ - सब तें लोक और वेद दोनो से । पर=अन्य ( परपुरुष ) ।
परसिद्ध प्रसिद्ध, प्रख्यात । लोइ = लोग ।
अथ परकीया के भेद- ( दोहा ) •
(११४) परकीया द्वै भाँति पुनि, ऊढ़ा एक अनूढ़ ।
जिन्हें देखि सुनि होत बस, संतत मूढ़ अमूढ़ । ६८।
शब्दार्थ-ऊढ़ा=विवाहिता । अनूढ़ = अनूढ़ा, अविवाहिता । अमूढ़ पंडित ।
६५ - धीराधीरा-धीर अधीरा । ६६ - हो-हौं । मैलो-मैले । जो लौं-बोलौं ।
रसयो-रसो । ६७-जग-जो । ६८-जिन्हें जिनहीं । सुनि-सब । सब-हैं ।
६६ रसिकप्रिया
अथ ऊढ़ा-अनूढ़ा-लक्षण--(दोहा)
(११५) ऊढ़ा होइ बिबाहिता, अबिबाहिता अनूढ़।
तिनके कहौं बिलास अब, केसव गूढ़ अगूढ़। ६९।
शब्दार्थ—गूढ़ = गुप्त। अगूढ़ = प्रकट।
ऊढ़ा, यथा—(सवैया)
(११६) बैठौ सखीनि की सोभै सभा सब ही के सु नैननि माँझ बसै।
बूझै तें बात बरचाइ कहै मन ही मन केसवराइ हँसै।
खेलति है इत खेल उतै पिय चित्त खिलावति यों बिलसै।
काउ जानै नहीं दृग दौरि कबै कित ह्वै हरि आनन छूवै निकसै ७०
शब्दार्थ—सोभै = सुशोभित होती है। सु = सो, वह। सब ही० = सभी
ध्यान से उसे देख रहे हैं। बूझे तें = पूछने पर ही। बरचाइ = बड़ी कठिनाई
से। बिलसै = शोभा पाती है। कोउ...निकसै = न जाने कब उसके नेत्र दौड़-
कर किधर से श्रीकृष्ण के मुख को छूते हुए निकल जाते हैं। (बीच बीच में
वह नायक को बड़ी सफाई से देख लेती है)।
अनूढ़ा, यथा—(सवैया)
(११७) बैठी हुती ब्रजनारिन में बनि श्रीवृषभानुकुमारि सभागी।
खेलति ही सखी चौपर चारु भई तिहिं खेल खरी अनुरागी।
पीछे तें केसव बोलि उठे सुनिकै चित चातुरी आतुरी जागी।
जानी न काहू कबै हरि के सुर-मारगहीं सर सी दृग लागी। ७१।
शब्दार्थ—हुती = थी। बनि = श्रृंगार करके। सभागी = भाग्यवती।
ही = थी। खरी = अत्यंत। बोलि उठे = श्रीकृष्ण आकर बोले। चित =
चित्त में। चातुरी = चातुर्य। आतुरी = आतुरता। सुर-मारगहीं = स्वर के
मार्ग से, जिधर से उनकी वाणी आ रही थी।
भावार्थ—(सखी का वचन सखी से) श्रीवृषभानु की पुत्री भाग्यवती
राधिका ब्रजबालानों के बीच बैठी हुई थीं और हे सखी, सुन्दर चौपड़ खेल
रही थीं। उस खेल में जब वे अत्यंत अनुरक्त (लीन) हो गईं (तब) इसी
बीच में श्रीकृष्ण आए और वे पीछे की ओर से कुछ (बातें) बोल उठे,
जिन्हें सुनकर उन (राधिका) के मन में चतुरता और आतुरता दोनो जग
गईं। किसी को पता ही नहीं चला कि कब श्रीकृष्ण के स्वरमार्ग से (जिधर
से उनकी वाणी की ध्वनि आ रही थी उधर) उनके नेत्र श्रीकृष्ण के नेत्रों में
बाण की भाँति जा लगे।
६९-अविवाहिता-अनव्याहिता। अब-सब। ७०-सु-जु। तें-हि।
केसवराइ-केसवदास। ७१—चारु-चारि। मारगहीं-आर गही।
७ तृतीय प्रभाव ६७
(दोहा)
(११८) काहू सों न कहै कछू, बात अनूढ़ा गूढ़।
सखी सहेली सों कहै, ऊढ़ा गूढ़ अगूढ़।७२।
शब्दार्थ—सखी = अंतरंग सखी। सहेली = बहिरंग सखी। गूढ़ =
गुप्त। अगूढ़ = प्रकट।
सूचना—यह छंद पूर्ण हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
ऊढ़ा वचन, यथा—(सवैया)
(११६) केसवराइ की सौहैं कहै कछू एकनि आपु में होड़ परी।
एक चितै मुसकाइ इतै, उत बात कहैं बहु भाइ भरी।
चारु चकोर बिलोचन भा सो चहूँ दिसि तें अँगुरी पसरी।
सखि काल्हि गई हुती गोकुल हौं सबहीं मिलि द्वैज को चंद करी ७३
शब्दार्थ—सौहैं = शपथ, कसम। एकनि = कुछ लोगों में। आपु में =
आपस में। होड़ = लागडाँट, यहाँ वादविवाद। चहूँ दिसि तें अँगुरी पसरी =
चारो ओर से गोपिकाओं ने अंगुली दिखाकर संकेत किया।
भावार्थ—(ऊढ़ा का वचन बहिरंग सखी से) मैं आज गोकुल गई थी।
वहाँ मुझे देखकर कुछ स्त्रियाँ शपथ कर करके मेरे बारे में आपस में वाद-
विवाद करने लगीं (कोई कहती थी कि यही श्रीकृष्ण की प्रेमिका है और
कोई कहती थी नहीं)। कुछ स्त्रियाँ एक ओर तो मुझे देखकर मुसकाती थीं
और दूसरी ओर अपनी संगिनी स्त्रियों से अत्यंत भावभरी बातें करने लगती
थीं। चारो ओर से उनकी उँगलियाँ मुझे इंगित कर रही थीं। उन सबने
मिलकर तो मुझे द्वितीया का चंद्रमा ही बना डाला था। (जैसे द्वितीया के
चंद्रमा को देखकर दूसरों को दिखाने के लिए लोग उँगली से इंगित करते हैं
उसी प्रकार वे मुझ पर उँगली उठा रही थीं)।
सूचना—यह छंद भी पूर्ण हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
(दोहा)
(१२०) जगनायक की नायिका, बरनी केसवदास।
तिनके दरसन रस कहौं, सुनौ प्रछन्न प्रकास।७४।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइन्द्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां स्वकीया-
परकीयादिभेदवर्णनं नाम तृतीयः प्रभावः।३।
७३—केसवराइ-केसवदास। काल्हि-आजु। ७४—सुनौ-सुनहु, सुनि।
प्रछन्न-प्रच्छन्न।
चतुर्थ प्रभाव
अथ दर्शन-लक्षण—(दोहा)
(१२१) ए दोऊ दरसैं दरसु, होहिं सकाम सरीर ।
दरसन चारि प्रकार को, बरनत हैं कबि धीर ।१।
शब्दार्थ—चारि प्रकार = साक्षात् या प्रत्यक्ष-दर्शन, चित्र-दर्शन, स्वप्न-
दर्शन और श्रवण-दर्शन ।
(१२२) एक जु नीके देखियै, दूजें दरसन चित्र ।
तीजें सपने देखियै, चौथैं श्रवननि मित्र ।२।
शब्दार्थ—नीकें देखियै = अर्थात् प्रत्यक्ष ।
सूचना—'सरदार' की टीका में एक दोहा इसके बाद यह भी दिया
गया है—
दरसन नीके दरसि यहि, दंपति प्रवि सुख मान ।
ताहि कहत साक्षात हैं, केसवदास सुजान ।
साक्षात् दर्शन--(दोहा)
(१२३) नींद भूख दुति देह की, गई सुनतहीं जाहि ।
को जानै ह्वै है कहा, केसव देखें नाहि ।३।
शब्दार्थ—देखें = देखने पर ।
सूचना--'सरदार' की टीका में इसके बाद भी एक दोहा और दिया
गया है और कहा गया है कि केशव का नहीं जान पड़ता—
देखन को प्रिय रूप दृग, तजे सकल जगकाज ।
कोटि जतनहूँ कै रही, रहे नैन गड़ि लाज ॥
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न साक्षात् दर्शन, यथा—(सवैया)
(१२४) कहि केसव श्रीबृषभानु-कुमारि सिँगार सिँगारि सबै सरसै।
सबिलास चितै हरिनायक त्यों रतिनायक-सायक से बरसें ।
कबहूँ मुख देखति दर्पन लै उपमा मुख की सुखमा सरसै ।
जनु आनँदकंद सँपूरन चंद दुरयो रबि-मंडल में दरसै ।४।
शब्दार्थ—सिँगार सिँगार सबै सरसै = सब प्रकार के शृंगार सजकर
सुशोभित होती है । सबिलास = भंगिमासहित, शृंगारी चेष्टाओं से युक्त ।
१--कबि-मति । २--नीकें-नीकेंहि, नीको । दूजें-दूजो । तीर्जे-
तीजों । सपने०-सपनो जानियें । चौथैं-चौथो । श्रवननि०-श्रवन सु मित्र ।
४-सिँगार०-सिँगारि सिंगार । लै-मैं । संपूरन-सुपूरन ।
चतुर्थ प्रभाव ६६
स्यें = ओर। रतिनायक-सायक = कामदेव के बाण। उपमा० = मुख की
उपमा इस शोभा को स्पर्श करती है, मुख की शोभा ऐसी जान पड़ती है।
दुरचो = छिपा हुआ। जनु......दरसै = मानो आनंददायक पूर्ण चंद्र रविमंडल
में छिपा हुआ दिखाई पड़ रहा है (दर्पण रविमंडल है, मुख पूर्ण चंद्र है)।
अलंकार - उक्तविषया वस्तूतप्रेक्षा।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश साक्षात् दर्शन, यथा - ( सवैया )
(१२५) पहिले तजि आरस आरसी देखि घरीकु घसे घनसारहि लै।
पुनि पोंछि गुलाब तिलौँछि फुलेल अँगौछे में आछे अँगौछनि कै।
कहि केसव मेद जुबाद सों माँजि इते पर आँजे मैं अंजन दै।
बहुरयो दुरि देखौं तौ देखौं कहा सखि लाज तौ लोचन लागियै हैं।५।
शब्दार्थ-घरीकु = घड़ी भर। घनसार = कपूर। फुलेल = फूलों में वास
कर निकाला गया सुगंधित तेल। तिलौँछि = तेल से (लगाकर) साफ
करके। अँगौछे = (अँगौछे से) पोंछा। आछे = भली भाँति। अँगौछनि
कै = अँगौछों से, रूमाल से। मेद = कस्तूरी। जुबाद = (फारसी) बिलाव
के अंडकोश से निकली हुई एक प्रकार की कस्तूरी।
भावार्थ- (नायिका की उक्ति सखी से) हे सखी, पहले मैंने आलस्य
छोड़कर नेत्रों को दर्पण में देखा और घड़ी भर कपूर लेकर उनमें मला।
इसके बाद भली भाँति गुलाब से उन्हें पोंछा। फुलेल लगाकर उन्हें साफ
किया। भली भाँति अँगौछों से उन्हें पोंछा। इतना ही नहीं प्रत्युत कस्तूरी
और जुबाद से भली भाँति माँजकर (रगड़कर) उनमें अंजन लगाया। इसके
बाद मैंने छिपकर नायक को देखा, पर इतने पर भी नेत्रों में लज्जा लगी ही
(निकली नहीं)।
अलंकार-विशेषोक्ति (पूर्ण कारण के होते हुए भी कार्य न होने से)।
सूचना- 'कविप्रिया' के छठे प्रभाव में गुरु वस्तुओं के वर्णन में यह
सवैया लज्जा का गुरुत्व दिखाने के लिए उदाहरण में दिया गया है।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न साक्षात् दर्शन, यथा- (सवैया)
(१२६) भाल गुही गुन लाज लटैं लपटी लर मोतिन की सुखदंनी।
ताहि बिलोकति आरसी लै कर आरस सों इक सारसनैनी।
केसव कान्ह दुरैं दरसी परसी उपमा मति की अति पैनी
सूरज-मंडल में ससि-मंडल मध्य धँसी जनु जाइ त्रिवैनी।६।
५-घरीकु-कछुक। घसे-घसै, घस्यौ। जुबाद-जिबाद, जब्बाद, जबानि।
बहुरयो-बहुरों, बहुरे। तौ-जो। देखौ०-तौ देखि रो। लागियै है-लागेइ
है, लागि अहै। ६-श्रीकृष्णजू-नायक। सवैया-विजै छंद। मति की-मति कों
मति त। जनु-मनु। जाइ-ताहि, जाहि।