रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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भावार्थ—हे मित्र, विचित्रसुरता नायिका वह है जिसकी रति विचित्र हो ।
कवियों के लिए भी इसका वर्णन कठिन है, पर इसका चरित्र सुनने से आनंद-
दायक होता है ।
यथा—( कबित्त )
(८६) केसौदास सबिलास मंदहासजुत अवि-
लोकनि अलापनि को आनँद अपार है ।
बहिरति सात पुनि अंतरति सात पुनि,
रति बिपरीतनि को बिबिध बिचार है ।
छूटि जाति लाज तहाँ भूषन सुदेस केस,
टूटि जात हार सब मिटत सिँगार है ।
कूजि कूजि उठैं रतिकूजतनि सुनि खग,
सोई तौ सुरत सखी और बिबहार है ।४०।
शब्दार्थ—सबिलास = विलासपूर्वक । अलाप = बोली, वाणी । बहिरति
= बहिंरति, बाह्य रति ( इनका उल्लेख आगे है ) । अंतरति = अंतर्रति, आंतर-
आभ्यंतर रति । बिपरीत रति = ( नायक नायिका के ) विपर्यय से रतिक्रीड़ा ।
सुदेस = सुंदर । रतिकूजतनि = कामक्रीड़ा की ध्वनियों को ( सुनकर ) ।
कूजि कूजि० = उस ध्वनि को सुनकर पक्षी धोखा खाकर उसे पक्षी का कूजना
समझकर उस ध्वनि के प्रत्युत्तर में स्वयम् कूँजने लगते हैं । और बिबहार है =
और ( रति ) तो व्यावहारिक अर्थात् साधारण है, मामूली है।
अथ सात बहिंरति-वर्णन—( दोहा )
[८७] आलिंगन, चुंबन, परस, मर्दन नख-रद-दान ।
अधरपान सो जानियै, बहिरति सात सुजान ।४१।
शब्दार्थ—परस = स्पर्श । नख-रद-दान = नखदान ( नखक्षत ) और
रद ( दंत ) दान ( दंतक्षत ) ।
अथ सात अंतररति-वर्णन—( दोहा )
[८८] थिति, तिर्यक, सनमुख, बिमुख, अध, ऊरध, उत्तान ।
सात अंतरति समुझियै केसवराइ सुजान ।४२।
शब्दार्थ—अंतरति = संभोग के आसन । थिति = स्थित ( खड़े ) । तिर्यक
= तिरछे ( करवट ) । बिमुख = उलटे । अध = अधोमुख । ऊरध = ऊर्ध्वमुख ।
उत्तान = उताने, चित्त ।
४०—पुनि-सुभ, अरु, भाँति । सात-पांच । अंतरति-अंतरित । पुनि-
सुनि । तहाँ-जहाँ । ४१—जानियै-समुझियै । ४२—समुझियै-जानियै ।
उत्तान-उभान । केसवराइ-केसव सकल ।