रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 92, कुल 286 में से
संदर्भ में पढ़ें(तश्तरी में) आगे रखे दिए । इसके अनंतर जब उसने (नायिका ने)
श्रीकृष्ण को झलने के लिए अपने हाथ में पंखा लिया तब उन्होंने हाथ पकड़
लिया और हंसकर कहने लगे कि मैंने तो इतना अपराध नहीं किया है (जिसका
मुझे यह दंड दिया जा रहा है) ।
सूचना—चौथे चरण के 'एतो अवराधन कीनों' पाठ से भी अच्छा
अर्थ लग सकता है—श्रीकृष्ण ने हाथ पकड़ लिया और हँसकर कहा कि बहुत
अधिक सेवा (आराधना) हो चुकी (अब बस करो) ।
अथ आकृतिगुप्ता प्रौढ़ा धीरा, यथा—(सवैया)
(१०७) चितवौ चितवाएँ हँसाएँ हँसौ हो बुलाएँ तें बोलौ रहौ नतु मौने ।
सौंह अनेकनि आवहु अंक, करौ रति कों प्रति रैन की रौने ।
ख्वाएँ तें खाहु बरयाइ बिरी जनु आई हौ केसव आज ही गौने ।
मोहन के मन मोहन कों सु कहौ यह धौं सिखई सिख कौने ।६१।
शब्दार्थ—रौने = रोदन ही । अथवा रौना = आगमन । ख्वाएँ = खिलाने
से । बरचाइ = मुश्किल से ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका से) देखने के लिए जब प्रेरित
किया जाता है तब तुम देखती हो, हँसाया जाता है तो हँसती हो, बुलाने से
बोलती हो नहीं तो चुपचाप ही रहती हो । अनेक कसमें खाने पर गोद में
आया (जाया) करती हो । प्रत्येक रात की प्रीति के लिए रोदन सा ठाने
रहती हो (अथवा) प्रीति को रौने के समान संकोचशील किए रहती हो) ।
खिलाने पर भी बड़ी कठिनाई से पान की बीरी खाती हो, मानो आज ही
गौने आई हो । मोहन (जो सबको मोह लेता है) के मन को मोहने के
लिए यह शिक्षा न जाने किसने तुम्हें दी है ।
सूचना—'रौने' का अर्थ 'रौना ही, आगमन ही' करने पर दूसरी पंक्ति
तीसरी के स्थान पर बदल दी जाए तो अच्छा हो । क्योंकि रौना गौने के
अनंतर होता है ।
पुनर्यथा—(सवैया)
(१०८) हित कै इत देखहु देख्यो सबै हित-बात सुनौ जु सुनी सब ही हैं ।
यह तौ कछु और बहै सब ही अरु सौंह करौ ब करी जु तही हैं ।
६०—आगें हूँ-आगेहि । बीरी-बीरा । धरो-धरो । जब-जबै । जब०-
सो जबै हरि । कर-बर । ऐसे-ऐसो । मैं तो-एतो । अपराध न-अवराधन ।
६१—हो-ओ । नतु-तित । ख्वाएँ०-कोइ खवाए तें खाओ बिरी । मोहन
कों-मोहिबे कों ।