रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ प्रभाव
अथ दर्शन-लक्षण—(दोहा)
(१२१) ए दोऊ दरसैं दरसु, होहिं सकाम सरीर ।
दरसन चारि प्रकार को, बरनत हैं कबि धीर ।१।
शब्दार्थ—चारि प्रकार = साक्षात् या प्रत्यक्ष-दर्शन, चित्र-दर्शन, स्वप्न-
दर्शन और श्रवण-दर्शन ।
(१२२) एक जु नीके देखियै, दूजें दरसन चित्र ।
तीजें सपने देखियै, चौथैं श्रवननि मित्र ।२।
शब्दार्थ—नीकें देखियै = अर्थात् प्रत्यक्ष ।
सूचना—'सरदार' की टीका में एक दोहा इसके बाद यह भी दिया
गया है—
दरसन नीके दरसि यहि, दंपति प्रवि सुख मान ।
ताहि कहत साक्षात हैं, केसवदास सुजान ।
साक्षात् दर्शन--(दोहा)
(१२३) नींद भूख दुति देह की, गई सुनतहीं जाहि ।
को जानै ह्वै है कहा, केसव देखें नाहि ।३।
शब्दार्थ—देखें = देखने पर ।
सूचना--'सरदार' की टीका में इसके बाद भी एक दोहा और दिया
गया है और कहा गया है कि केशव का नहीं जान पड़ता—
देखन को प्रिय रूप दृग, तजे सकल जगकाज ।
कोटि जतनहूँ कै रही, रहे नैन गड़ि लाज ॥
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न साक्षात् दर्शन, यथा—(सवैया)
(१२४) कहि केसव श्रीबृषभानु-कुमारि सिँगार सिँगारि सबै सरसै।
सबिलास चितै हरिनायक त्यों रतिनायक-सायक से बरसें ।
कबहूँ मुख देखति दर्पन लै उपमा मुख की सुखमा सरसै ।
जनु आनँदकंद सँपूरन चंद दुरयो रबि-मंडल में दरसै ।४।
शब्दार्थ—सिँगार सिँगार सबै सरसै = सब प्रकार के शृंगार सजकर
सुशोभित होती है । सबिलास = भंगिमासहित, शृंगारी चेष्टाओं से युक्त ।
१--कबि-मति । २--नीकें-नीकेंहि, नीको । दूजें-दूजो । तीर्जे-
तीजों । सपने०-सपनो जानियें । चौथैं-चौथो । श्रवननि०-श्रवन सु मित्र ।
४-सिँगार०-सिँगारि सिंगार । लै-मैं । संपूरन-सुपूरन ।