रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ रसिकप्रिया
अथ ऊढ़ा-अनूढ़ा-लक्षण--(दोहा)
(११५) ऊढ़ा होइ बिबाहिता, अबिबाहिता अनूढ़।
तिनके कहौं बिलास अब, केसव गूढ़ अगूढ़। ६९।
शब्दार्थ—गूढ़ = गुप्त। अगूढ़ = प्रकट।
ऊढ़ा, यथा—(सवैया)
(११६) बैठौ सखीनि की सोभै सभा सब ही के सु नैननि माँझ बसै।
बूझै तें बात बरचाइ कहै मन ही मन केसवराइ हँसै।
खेलति है इत खेल उतै पिय चित्त खिलावति यों बिलसै।
काउ जानै नहीं दृग दौरि कबै कित ह्वै हरि आनन छूवै निकसै ७०
शब्दार्थ—सोभै = सुशोभित होती है। सु = सो, वह। सब ही० = सभी
ध्यान से उसे देख रहे हैं। बूझे तें = पूछने पर ही। बरचाइ = बड़ी कठिनाई
से। बिलसै = शोभा पाती है। कोउ...निकसै = न जाने कब उसके नेत्र दौड़-
कर किधर से श्रीकृष्ण के मुख को छूते हुए निकल जाते हैं। (बीच बीच में
वह नायक को बड़ी सफाई से देख लेती है)।
अनूढ़ा, यथा—(सवैया)
(११७) बैठी हुती ब्रजनारिन में बनि श्रीवृषभानुकुमारि सभागी।
खेलति ही सखी चौपर चारु भई तिहिं खेल खरी अनुरागी।
पीछे तें केसव बोलि उठे सुनिकै चित चातुरी आतुरी जागी।
जानी न काहू कबै हरि के सुर-मारगहीं सर सी दृग लागी। ७१।
शब्दार्थ—हुती = थी। बनि = श्रृंगार करके। सभागी = भाग्यवती।
ही = थी। खरी = अत्यंत। बोलि उठे = श्रीकृष्ण आकर बोले। चित =
चित्त में। चातुरी = चातुर्य। आतुरी = आतुरता। सुर-मारगहीं = स्वर के
मार्ग से, जिधर से उनकी वाणी आ रही थी।
भावार्थ—(सखी का वचन सखी से) श्रीवृषभानु की पुत्री भाग्यवती
राधिका ब्रजबालानों के बीच बैठी हुई थीं और हे सखी, सुन्दर चौपड़ खेल
रही थीं। उस खेल में जब वे अत्यंत अनुरक्त (लीन) हो गईं (तब) इसी
बीच में श्रीकृष्ण आए और वे पीछे की ओर से कुछ (बातें) बोल उठे,
जिन्हें सुनकर उन (राधिका) के मन में चतुरता और आतुरता दोनो जग
गईं। किसी को पता ही नहीं चला कि कब श्रीकृष्ण के स्वरमार्ग से (जिधर
से उनकी वाणी की ध्वनि आ रही थी उधर) उनके नेत्र श्रीकृष्ण के नेत्रों में
बाण की भाँति जा लगे।
६९-अविवाहिता-अनव्याहिता। अब-सब। ७०-सु-जु। तें-हि।
केसवराइ-केसवदास। ७१—चारु-चारि। मारगहीं-आर गही।