रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० रसिकप्रिया
शब्दार्थ — मनुहारि कियें = चिरौरी करने पर । पलिका = पलंग । भय-
भीनै=भयभीत । कोरहिं=क्रोड़ में, गोद में । कोरिक=करोड़, बहुत अधिक ।
उससे=निकलने पर ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) हे सखी उस (नायिका) ने
(नायक द्वारा) पैरों पड़ने और चिरौरी करने पर (किसी प्रकार) भयभीत
होकर पलंग पर पर रखा । (पुनः) करोड़ों कसमें खाने पर (किसी प्रकार) गोद
में सो गई । तब साहस करके उन्होंने (नायक ने) मुख से मुख छुलाया । क्षण
मात्र के इस सुख में उन्होंने सभी सुख प्राप्त कर लिए । उस (नायिका) के
एक ही उच्छ्वास के निकलने से और सभी सुगंधें बिदा हो गईं । (दब गईं—
उसके मुख की सुवास के सर्वोत्कृष्ट होने के कारण ) ।
अलंकार—हेतु ।
मुग्धा के सुख-लक्षण—( दोहा )
(७४) मुग्धा सुरख करै नहीं, सपनेहूँ सिख मानि ।
छल-बल कीनें होति है, सुख-सोभा की हानि ! २८।
शब्दार्थ — कीनें = करने से ।
यथा—( कवित्त )
(७५) सुख दै सखीनि बीच दै कै सौंहैं चाइ कै,
खवाइ कछू स्वाइ बस कीनी बरबसु है ।
कोमल मृनालिका सी मल्लिका की मालिका सी,
बालिका जु डारी मीड़ि मानुसु कि पसु है ।
जानै न बिभात भयो केसव सुनै को बात,
देखौ आनि गात जात भयो किधौं असु है ।
चित्र सी जु राखी वह चित्रिनी बिचित्र यह,
देखौ धौं नए रसिक या में कौन रसु है । २६।
शब्दार्थ—सुख दै = सुख की सामग्रियां जुटाकर । बीच दै = मध्यस्थ
बनाकर । सौंह = शपथ । खवाइ कछू = कुछ मादक द्रव्य खिलाकर । बर-
बसु = बल से, जबरन । मृनालिका = कमलनाल । मल्लिका = बेला ।
मीड़ि = मसलकर । मानुसु = मनुष्य । बिभात=प्रभात, प्रातःकाल । आनि =
आकर । गात = ( गात्र ) शरीर । असु = प्राण । धौं = क्यों नहीं । रसु =
आनंद ।
२८—सिख-सुख । २६—चाइ-साइ । कि-के । वह-यह । यह-अति;
गति । देखौ-कहि; कहो ।