रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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हो ) ; उससे मौन नहीं रहा गया । उस (नायिका) ने व्याकुल होकर कहा—
'प्रियतम, कैसी रेखा है, देखें तो' ।
अलंकार—विशेषोक्ति ( बुलावतहूँ न बोलै ), पर्यायोक्ति (दूसरी) ।
(७८) अथ मध्या के चतुर्भेद—( दोहा )
मध्या आरुढ़जोबना, प्रगल्भवचना जानि ।
प्रादुर्भूतमनोभवा, सुरतिबिचित्रा आनि ।३२।
शब्दार्थ—आनि = अन्य ।
(७६) अथ मध्या-आरूढ़यौवना-लक्षण—(दोहा)
मध्या आरुढ़जोबना, पूरन जोबनवंत ।
भाग सुहाग भरी सदा, भावति है मन कंत ।३३।
यथा—( कवित्त )
(८०) चंद को सो भाग भाल, भ्रुकुटी कमान ऐसी,
मैन कैसे पैने सर नैननि बिलासु है ।
नासिका सरोज, गंधबाह से सुगंधबाह,
दारधौं से दसन केसौ बीजुरी सो हासु है ।
भाई ऐसी ग्रीव-भुज, पान सो उदर अरु,
पंकज से पाइ गति हंस की सी जासु है ।
देखी है गुपाल एक गोपिका मैं देवता सी,
सोने सो सरीर सब सोंधे की सी बासु है ।३४।
शब्दार्थ—चंद को भाग = चंद्र के भाग सा, आधे चंद के समान ।
भाल = ललाट । कमान = धनुष । मैन = मदन, कामदेव । पैने = तेज,
तीक्ष्ण । सर = बाण । बिलासु = खेल, नेत्रों की गति । गंधबाह = सुगंध को
वहन करनेवाली, सुगंधित वायु । सुगंधबाह = सुगंध का प्रवाह ( मुखवास ) ।
दारधों = अनार । दसन = दाँत । भाई = खराद पर से उतारी हुई (सुडौल) ।
पान = पत्ता ( पीपल का ) । पंकज = कमल । देवता = देवबाला । सोंधे =
सुगंध । बासु = वास, सुगंध ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायक से ) हे गोपाल, मैंने एक देवबाला
सी ( अत्यंत रमणीय ) गोपिका देखी है । उसका भाल चंद्राधं के समान है,
भौंहें धनुषाकार हैं, नेत्रों का विलास काम के तीक्ष्ण बाणों के समान है ।
नासिका कमल सी, मुखवास सुगंधित पवन के समान है । दाँत अनार के दाने
के समान हैं और हास बिजली के समान है । ग्रीवा और भुजाएँ खराद पर से
उतारी हुई सी हैं । उदर (पीपल के) पत्र के समान है, चरण कमल की भाँति
३२ - जानि-जान । आनि-मान । ३४ - ऐसी-की सी । कीसो-कैसो ।