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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 286 में से

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पृष्ठ 87

८८ रसिकप्रिया
सी जान पड़ने लगी । मेरे नेत्रकमलों ने बलपूर्वक बंद होते हुए ( आज )
सचमुच इसे समझ लिया कि तू उनके मुख को जो कमल सा कहती थी वह
बात नहीं है, वह तो चंद्रमा की भाँति दिखाई पड़ रहा था ।
सूचना—'कमल' कहने से सखी का तात्पर्य नायिका ने उसे दोषरहित,
स्वस्थानसेवी और समशीलप्रदर्शक मान रखा था, पर आज उसने उसे
'चंद्रवत्' कहकर कलंकी, भ्रमणशील, न्यूनाधिक्य को प्राप्त होनेवाला बतलाया ।
अथ मध्या अधीरा यथा,―( कवित्त )
(६४) तात को सो गात सब बल बल बीर को सो,
मात को सो मुख महामोह मन भायो है ।
थल सो अचल सील, अनिल सो चल चित्त,
जल सो अमल, तेज तेज को सो गायो है ।
केसौदास बसत अकास के प्रकास घोष,
घटघट घरघर घैरु घनो छायो है ।
रति की सी रति, नाथ, रूप रतिनाथ को सो,
कहौ केसौराइ झूठ कौन यहु पायो है ॥४८॥
शब्दार्थ—तात = पिता ( नंद ) । गात = शरीर, देह । बल बीर = भाई
बलदाऊजी । मात = यशोदा । मोह = ममता । थल = ( स्थल ) पृथिवी ।
अचल = अचंचल, क्षमाशील । अनिल = वायु । सील = गुण । अमल =
निर्मल । तेज = प्रभा । तेज = अग्नि । प्रकास = भाँति, ढंग से । घोष = शब्द;
गांव ( ग्वालों का ) । घैरु = ( १ ) घेर, विराव; ( २ ) बदनामी । घनी =
अत्यधिक । रति = कामदेव की स्त्री । रति = प्रीति । रतिनाथ = कामदेव ।
केसौराइ = श्रीकृष्ण । यहु = इस कथन में ।
भावार्थ—(नायिका-वचन नायक से) पिता (नंद) जी की तरह आपका
शरीर है (जैसे वे वृद्धावस्था के कारण काँपते हैं आप भी वैसे ही काँप रहे हैं),
भाई बलदाऊजी का सा बल आपमें है ( वे मदिरा पीकर मतवाले होते हैं
और आप भी मतवाले हैं ) । माता ( यशोदा ) का सा आपका मुख है ( वे
मस्तक पर टीका लगाती हैं आपके मस्तक पर भी टिकुली चिपकी है ) जैसा
महामोह (ममत्व) उनमें है वैसा ही मोह ( मूर्च्छा, जागरण के कारण झपकी
लेना ) आपमें भी है, जो मन को रुचता है । ( पंच तत्त्वों के गुण भी आपमें
मौजूद हैं) । पृथ्वी की भाँति आप अचल गुण वाले हैं (पृथ्वी सर्वंसहा है, आप
भी सब कुछ कही सुनी सह लेते हैं) । पवन की तरह आप चंचल हैं । जल की
भाँति आपका चित्त निर्मल है (जल नीचे की ओर जाता है, आप भी नीचे की
ओर जा रहे हैं ) । अग्नि की सी ही आपकी प्रभा ( मुँह की सुर्खी ) है ।
४८—को सो-कैसो । मुख-मुंह । मोह-मोहूँ । अनिल-अनल ।