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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 286 में से

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पृष्ठ 82

तृतीय प्रभाव ८३
हैं। चाल हंस की सी है। उसके सोने की भाँति (गौर) शरीर में समस्त सुगंधों
की सी सुगंध है (सोने में सुगंध नहीं होती परंतु इसके शरीर में सुगंध भी है) ।
अलंकार — धर्मलुप्तोपमा की माला ।
सूचना—( १ ) नायिका के सौंदर्य की अधिकता वस्तु से नायक क
मिलाना वस्तु व्यंग्य है । ( २ ) केशव ने 'देवता' शब्द को संस्कृत की ही
भाँति स्त्रीलिंग माना है। ( ३ ) 'बासु' शब्द स्त्रीलिंग है। उसमें उकारांत
रूप मिथ्यासादृश्य से और तुकांत के अनुरोध से है।
अथ प्रगल्भवचना-मध्या-लक्षण—( दोहा )
(८१) प्रगलभवचना जानि तिहि, बरनौ केसवदास ।
बचननि माँझ उराहनो, देइ दिखावै त्रास ।३५।
शब्दार्थ — तिहि = उसको । माँझ = में । उराहनो = उपालंभ ।
यथा—( सवैया )
(८२) कान्ह भलें जु भलें ढँग लागे भलें इन नैननि के रँग रागे ।
जानति हौं सबहीं तुम जानत आपु से केसब लालच लागे ।
जाहु नहीं, अहो जाहु चले, हरि जात जितै दिनहीं बनि बागे ।
देखि कहाँ रहे धोखें परे उबटौगे जू देखौ ब देखहु आगे ।३६।
शब्दार्थ—भलें ढँग लागे = अच्छा ढंग पकड़ा है । नैननि के रंग रागे=
नेत्रों के रंग में अनुरक्त होकर ( जिससे नेत्र मिल जाते हैं उसी के साथ प्रेम
कर बैठते हैं ) । लालच लागे = लोभ में लगे हुए । दिनहीं बनि बागे = जहाँ
प्रतिदिन वेशभूषा बनाकर जाते हैं । उबटौगे = चित्त से उतर जाओगे ।
देखौ ब देखहु आगे = अभी क्या है, आगे देखिए इस करतूत से आप दिन-दिन
चित्त से उतरते ही जाएँगे ।
भावार्थ—(·नायिका नायक की अन्यस्त्री-विषयक प्रीति को लक्षित करके
व्यंग्यपूर्वक उलाहना देती है ) हे कान्ह, आप बड़े भले हैं और आपने अच्छा
ढंग पकड़ा है । यह भी अच्छा ही किया कि नेत्रों के प्रेम में अनुरक्त हुए
(अन्य नायिकाओं से नेत्र मिलाकर उन पर आसक्त हुए), मैं (खूब ) सम-
झती हूँ । स्वयम् लोभ में पड़े हुए आप औरों को भी अपनी तरह (लालची)
समझते हैं । जाइए, जाते क्यों नहीं । जहाँ आप प्रतिदिन • वेशभूषा बनाकर
जाया करते हैं, वहीं जाइए न । आप धोखे में पड़े हुए मुझे क्या देख रहे हैं ।
ऐसी करतूतों से चित्त से उतर गए हैं और उतर जाइएगा । अभी क्या है,
आगे इस प्रकार की करनी से अधिकाधिक चित्त से उतरते ही जाएँगे ।
३५—बरनौं-बरनै । देइ-देखि । ३६—इन्ह-ह्वैहै, ह्रै हैं । जितै-जहाँ ।
दिन- नित । उबटोगे जू०-उभिटे किसे देखिबे ।