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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 286 में से

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पृष्ठ 94

तृतीय प्रभाव ६५
अलंकार - दृष्टान ।
सूचना - लीथोवाली और छपी प्रतियों में यह छंद नहीं है, पर हस्त-
लिखित प्रतियों में है ।
अथ प्रौढ़ा-धीराधीरा-लक्षण- ( दोहा )
(१११) मुख रूखी बातैं कहै, जिय मैं पिय की भूख ।
धीराधीरा जानिये, जैसी मीठी ऊख । ६५।
यथा-( सवैया )
(११२) हो मन मैलो न जौ लौं कछू अब छोड़हु बोलिबो बोल हँसौहैं ।
केसव औरनि सों रसरासि रसयो रसबाद सबै हम सौं हैं ।
देखहु धौं इक बार सँकोचनि आरस-लोचन आरसी सौंहैं ।
आए जू वैसेई-साज सौं आजु सु भूलि गई पिय काल्हि की सौंहैं ।
शब्दार्थ- मैलो = मलिन, उदासीन । रसरासि = आनंदपूर्णा बातें ।
रसयो=की । रसबाद = ( प्रेम के ) झगड़े । संकोच = लज्जा । सौंहै =
सामने । सौंहैं = शपथें ।
भावार्थ - (नायिका की उक्ति नायक से) हे प्रिय, (जान पड़ता है कि )
आपको कल की शपथें भूल गईं ? क्योंकि आप आज भी वैसे ही साज (वेष)
से यहाँ आए हैं ? मेरा मन आपके प्रति तब तक उदासीन ही रहेगा जब तक
आप अपने ये, हँसीवाले बोल बोलना नहीं छोड़ देते । आप औरों ( सौतों )
से तो आनंदपूर्णा बातें किया करते हैं, सारे झगड़े केवल मेरे ही साथ होते
हैं। एक बार जरा अपने संकोच और आलस्य से भरे नेत्रों को दर्पण के
सामने देख आइए ( फिर मुझसे बातें कीजिए ) । ( रात्रि के जागरण की
गवाही आपका चेहरा दे रहा है ) ।
इति स्वकीया ।
अथ परकीया-लक्षण- ( दोहा )
(११३) सब तें पर परसिद्ध जग, ताकी जु प्रिया होइ ।
परकीया तासों कहैं, परम पुराने लोइ । ६७।
शब्दार्थ - सब तें लोक और वेद दोनो से । पर=अन्य ( परपुरुष ) ।
परसिद्ध प्रसिद्ध, प्रख्यात । लोइ = लोग ।
अथ परकीया के भेद- ( दोहा ) •
(११४) परकीया द्वै भाँति पुनि, ऊढ़ा एक अनूढ़ ।
जिन्हें देखि सुनि होत बस, संतत मूढ़ अमूढ़ । ६८।
शब्दार्थ-ऊढ़ा=विवाहिता । अनूढ़ = अनूढ़ा, अविवाहिता । अमूढ़ पंडित ।
६५ - धीराधीरा-धीर अधीरा । ६६ - हो-हौं । मैलो-मैले । जो लौं-बोलौं ।
रसयो-रसो । ६७-जग-जो । ६८-जिन्हें जिनहीं । सुनि-सब । सब-हैं ।