रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 90, कुल 286 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय प्रभाव ६१
सु = सो । मार = काम ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) उसकी गति मंद और मनोहारिणी
है, आनंदकंद ( श्रीकृष्ण ) जिसे देखकर हृदय से उल्लसित हो रहे हैं।
भ्रूभंगिमा, कोमल हँसी और शरीर की सुगंध ने उन्हें भली भाँति पकड़ लिया
है ( वश में कर लिया है )। उसकी टेढ़ी चितवन देखकर नंदकुमार कामदेव
हो रहे हैं ( और सोच रहे हैं कि ) असल में काम के बाण तो ये ही हैं ।
ब्रह्मा ने भूलकर काम के बाणों को फूलों के बाण कहा है ।
अलंकार—अपह्नति ।
अथ आक्रामितनायिका-प्रौढ़ा-लक्षण—( दोहा )
(१०१) सो आक्रामित नाइका, प्रौढ़ा कहि दै चित्त ।
मनसा बाचा कर्मना, जिनि बस कीनो मित्त ।५५।
शब्दार्थ—दै = देकर, लगाकर । मित्त = मित्र, प्रिय, पति ।
यथा—( सवैया )
(१०२) तो हित गाइ बजावत नाचत बार अनेक सिंगारु बनायो ।
जीहू में आन कौ आनिबो छोड़यो री तौऊ न तेरो भयो मनभायो ।
भावै सो तूँ करिबो करि भामिनि भाग बड़े बस तैं करि पायो ।
कान्ह त्यों सूधें जु चाहति नाहि सु चाहति है अब पाइ लगायो ।५६।
शब्दार्थ—हित = लिए । जीहू में = हृदय में भी । आन = अन्य
( दूसरी स्त्रियों को ) । पाइ लगायो = पैर पड़वाना ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका से ) तेरी प्रसन्नता के लिए वे
( श्रीकृष्ण ) गाकर बाँसुरी बजाते हैं, नाचते हैं, और अनेक बार उन्होंने
अपना शृंगार ( वेशभूषा ) भी बनाया । अब वे हृदय में भी किसी दूसरी स्त्री
का ध्यान ले आना छोड़ चुके हैं । इतने पर भी तेरा मनचाहा नहीं हुआ ।
बड़े भाग्य से तूने उन्हें इस प्रकार वश में कर पाया है, अतः तुझे जो अच्छा
लगे वह कर । कान्ह ऐसे सीधे को तू ( प्रसन्नतापूर्वक ) प्यार तो करती नहीं,
अब चाहती यह है कि वे ( अपनी भूल के लिए ) तेरे पैरों पड़ें ।
अथ लब्धायति-प्रौढ़ा-लक्षण—( दोहा )
(१०३) सो लब्धायति जानियै, केसव प्रगट प्रमान ।
कानि करै पति कुल सबै, प्रभुता प्रभुहि समान ।५७।
५५ कहि दै-कहियै, करिबै । जिनि-जिहि । कीनो-कीन्यो । ५६-छाड्यो
री-छांडिबो । तोऊ०-तेरो तऊ न । करे-को । तैं करि-है करि, चोकड़ि ।
त्यों-ज्यों । नाहिं-नाहीं सो ।