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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 286 में से

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पृष्ठ 88

तृतीय प्रभाव ८६
आकाश की ही भाँति आपका शब्द और स्थिति घटघट में और घरघर में
भली भाँति व्याप्त है । (आकाश के ही कारण शब्द होता है और प्रत्येक घट
एवम् घर-मठ में उसकी व्याप्ति है—घटाकाश और मठाकाश रूप में । आपकी
बदनामी, गाँव में घटघट (सबके हृदय में) और घरघर व्याप्त है ) । काम की
पत्नी की भाँति आपका प्रेम है ( प्रिय के त्याग पर उसे रोना था आप भी
उस प्रिया के त्याग से दुखी हैं ) । हे नाथ आपका रूप कामदेव की तरह है
( कामदेव अरूप है । आप भी अरूप—बेडंगा रूप—धारण किए हुए हैं) ।
आप ही बतलाइए कि मेरी इन बातों में आपको कौन सी बात झूठ जान
पड़ती है ? ( मैं ठीक ही कह रही हूँ न ! ) ।
अलंकार—उपमाश्रित उल्लेख ।
अथ मध्या धीराधीरा, यथा—(सवैया)
(६५) कान्ह भले जु भले समुझाइहौं मोहसमुद्र कि ज्यौं उमह्यो हो ।
केसव आपनो मानिक सो मन हाथ पराए दै कोनें लह्यो हो ।
नैननिहीं मिलिबो करियै अब बैननि को मिलिबो तौ रह्यो हो ।
जाइ कह्यो तुम जैसे सखीनि सों एह्यो गुपाल मैं ऐसो कह्यो हो ।४६।
शब्दार्थ—उमह्यो हो = उमड़ा था । रह्यो हो = समाप्त हो गया ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति नायक से) हे कान्ह, मैं आपको भली भाँति
समझाऊँगी कि मोहरूपी समुद्र का उमड़ना कैसा हुआ था । क्या किसी ने
माणिक सा अपना मन दूसरे के हाथ देकर (वापस) पाया है ? अब तो नेत्रों
का मिलन रह गया ( कभी कभी दर्शन भर कर लूँगी ) वचनों का मिलन
तो समाप्त हो गया ( आपसे बात न करना ही ठीक है ) । आपने जाकर
सखियों से जैसा ( उलटा सीधा ) कहा है, क्या गोपाल, मैंने ऐसा ही कहा
था ? ( आप इधर उधर की बातें बहुत किया करते हैं) ।
अथ प्रौढ़ा-भेद चतुर्विध—(दोहा)
(६६) सुनि समस्त रसकोबिदा, चित्तविभ्रमा जाति ।
अति आक्रामित नाइका, लब्धायति सुभ भाँति ।५०।
शब्दार्थ—सुनि = सुनो । जाति = भेद !
अथ समस्त रसकोविदा-लक्षण—(दोहा)
(६७) सो समस्तरसकोबिदा, कोबिद कहत बखानि ।
जो रस भावै प्रीतमहिं, तांही रस की दानि ।५१।
शब्दार्थ—कोबिदा=पंडित । रस = आनंद ।
४६—कि-को, की । उमह्यो-उमडघो, उमहो । हो-है । अब-सब ।
जैसें-जैसों, ऐसो । ५०—चित्र०-चित बिभ्रम या जाति, अक्रामितपति आन ।
लब्धायति०-लुब्धापति०, लब्धापतिहु बखान । ५१—दानि-ज्ञानि ।