रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ रसिकप्रिया
यथा—( सवैया )
(१०४) आज बिराजत हैं कहि केसव श्रीबृषभानु-कुमारि कन्हाई ।
बानि बिरंचि बहिक्रम काम रची जु बची सु बधूनि बनाई ।
अंग बिलोकि त्रिलोक में ऐसी को नारि नहीं जिन नारि नवाई ।
मूरतिवंत सिंगार-समीप सिंगार कियें जनु सुंदरताई ।५८।
शब्दार्थ-- बानि = ( बाणी ) सरस्वती । बिरंचि = ब्रह्मा । बहिक्रम =
वयःक्रम, वयःसंधि । काम = कामना । नारि = स्त्री । नारि = गर्दन । नवाई =
झुकाई ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) आज श्रीवृषभानु की पुत्री
राधिका और श्रीकृष्ण अत्यंत सुशोभित हो रहे हैं। ब्रह्मा ने वयःसंधि की
कामना से ( उसी वृषभानुकुमारी की सुंदरता से ही कुछ लेकर ) सरस्वती
की रचना की, जो बचा उससे संसार की अन्य सुंदर रमणियों का निर्माण
किया । इसी से उसका अंग देखने पर त्रिलोक में ऐसी कोई स्त्री नहीं दिखाई
देती जिसकी गर्दन न झुक जाए । ऐसा जान पड़ता है मानो साक्षात् शृंगार
( श्रीकृष्ण ) के समीप मूर्तिमयी सुंदरता ( राधिका) ही अपना रूप सँवारे
विराजमान हो ।
अलंकार - उत्प्रेक्षा ।
अथ प्रौढ-धीरा-लक्षणा—( दोहा )
(१०५) आदर माँझ अनादरै, प्रकट करै हित होइ ।
आकृति आप दुरावई, प्रौढ़ा धीरा दोइ ।५६।
शब्दार्थ—हित होइ = हितुआ बनकर ।
प्रौढ़ा सादरा धीरा, यथा- ( सवैया )
(१०६) आवत देखि लिये उठि आगैं ह्वै आपुहि केसव आसनु दीनो ।
आपुहि पाइ पखारि भलें जल, पानी को भाजन लाइ नवीनो ।
बीरी बनाइकै आगैं धरी जब बैहर कौं कर बीजना लीनो ।
बाँह गही हरि, ऐसे कह्यो हँसि मैं तौ इतौ अपराध न कीनो ।६०।
शब्दार्थ—बीरी = पान की गिलौरियाँ । बीजना = (व्यजन) पंखा ।
भावार्थ---(सखी की उक्ति सखी से) श्रीकृष्ण को (सपत्नी के यहाँ से)
आते देखकर ( नायिका ने ) आगे बढ़कर उन्हें लिया और स्वयम् ही ( बैठने
को ) आसन दिया । पानी का नवीन बर्तन लाकर स्वच्छ जल से स्वयम् ही
( परिचारिका द्वारा नहीं ) पैर भी धोए । स्वयम् पान के बीड़े भी बनाकर
५८-बहिक्रम-वही क्रम । बची-बरी । नहीं जिन०-निहारि नितारि
बनाई ।