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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 286 में से

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पृष्ठ 89

६० रसिकप्रिया
यथा—( कबित्त )
(९८) देखी है गुपाल एक गोपिका मैं देवता सी,
सोने तें सलोनी बास साँधे तें सुहाई है।
सोभा ही सुभाउ अवतार लियो घनस्याम,
किधौं यह दामिनीयै कामिनी ह्वै आई है।
देवी कोउ मानवी न दानवी न होइ ऐसी,
भानवी न हावभाव भारती पढ़ाई है।
केसौदास सब सुख-साधन की सिद्धि यह,
मेरे जान मैनहीं सों मैनका की जाईं है।५२।
शब्दार्थ—सलोनी = सुंदर। बास = ( वास ) सुगंध। दामिनीयै =
बिजली ही। भानवी = भानु से उत्पन्न। मेरे = जान पड़ता है। भारती =
सरस्वती। मैन = ( मदन ) कामदेव। मैनका = एक अप्सरा।
भावार्थ—(दूती का वचन नायक से) हे गोपाल, मैंने एक अनुपम सौंदर्य
वाली गोपिका देखी है जो सोने से भी (अधिक) सलोनी है और जिसके
शरीर की सुगंध साक्षात् सुगंध से भी बढ़कर है। हे श्याम, या तो स्वयम् सुहा-
वनी शोभा ने ही उसके रूप में अवतार लिया है, या साक्षात् विद्युत ही स्त्री
बनकर चली आई है। कोई देवी, दानवी, सूर्यसमुद्भूता या मानवी ऐसी नहीं
दिखाई पड़ती। ऐसा जान पड़ता है कि स्वयम् सरस्वती ने ही उसे हावभाव की
शिक्षा दी है। वह सभी सुखों के साधन की सिद्धि रूप है, मुझे ऐसा जान
पड़ता है कि स्वयम् कामदेव ने उसे मेनका अप्सरा से उत्पन्न किया है।
अथ विचित्रविभ्रमा-प्रौढ़ा-लक्षण—(दोहा)
(९९) अति बिचित्रबिभ्रम सु बह, प्रौढ़ा कहत बखानि।
जाकी दीपति दूतिका, पियहि मिलावै आनि ।५३।
यथा—( सवैया )
(१००) है गति मंद मनोहर केसब आनंदकंद हियें उलहे हैं।
भौंह बिलासनि कोमल हासनि अंगसुबासनि गाढ़े गहे हैं।
बंक बिलोकनि कों अवलोकि सु मार ह्वै नंदकुमार रहे हैं।
एई तौ काम के बान कहावत फूलनि के बिधि भूलि कहे हैं। ५४।
शब्दार्थ—कंद=जड़। उलहे = उल्लसित। बिलास = भंगिमा, चलाना।
५२—मैं देवता सो-अनूप रूप। सुभाउ-सुहाई। लियो०--लियो स्याम
कीधौं, घनस्याम कीधौं। मानवी-दानवी। दानवी-मानवी। भानवी-मानवी।
हावभाव-होय भावै। पढ़ाई-पठाई। मैनका-मैनकी। ५३—सु वह-सदा।
कहत-प्रगट। ५४—उलहे-उमहे। एई तो-एक तो। कहे-गहे।