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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 286 में से

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पृष्ठ 86

तृतीय प्रभाव ८७
शब्दार्थ—पय = जल । पावक = अग्नि, बाड़वाग्नि । पीक = पान की
हियें = हृदय में । नखचंद नए = नवीन नखक्षत । चित्र = लेप या चंदन से
बने चित्र । उजागर = प्रकट ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) सुंदरता ( कांति ) ही जल है,
महावर और पान की लगी पीक ही बाड़वाग्नि है, हृदय (छाती) में (ताजा)
लगे हुए नखक्षत ही नए चंद्र ( द्वितीया का चंद्रमा ) है, चित्रित चंदन ही
अमृत है, अंजन ही विष है, मणियों के टूटे हुए हार ( ही रत्न फैले हुए )
हैं, नेत्रों में भरी हुई नींद ही मदिरा है, जिसके नशे में बेहोश होकर वे इधर
उधर घूम रहे हैं । अतः नागरी ( प्रवीण नायिका ) और नागर ( प्रवीण
नायक ) कामक्रीड़ा करने के बाद प्रभात के समय प्रत्यक्ष सागर के वेश में
दिखाई पड़ रहे हैं।
अथ मध्याधीरादि-भेद—( दोहा )
[६१] सिगरी मध्या तीन बिधि, धीरा और अधीर ।
धीराधीरा तीसरी, बरनत हैं कबि धीर ।४५।
शब्दार्थ—सिगरी = सब ।
[६२] धीरा बोलै बक्र बिधि, बानी बिषम अधीर ।
पिय सों देइ उराहनो, सो धीरा न अधीर ।४६।
शब्दार्थ—वक्रविधि = व्यंग्य वाणी से । विषम = टेढ़ी, कड़ी, चुभती ।
अधीर = अधीरा । धीरा न अधीर = धीराधीरा ।
अथ मध्या धीरा, यथा—[ सवैया ]
[६३] ज्यों ज्यों हुलास सों केसवदास बिलास निवास हियें अवरेख्यो ।
त्यों त्यों बढ्यो डर कंप, कछू भ्रम भाँति भयो किधौं सीत बिसेख्यो ।
मुद्रित होत सखी बरहीं मेरे नैन-सरोजनि साँच कै लेख्यो ।
तैं जू कह्यो मुख मोहन को अरबिंद सो है सु तौ चंद सो देख्यो ।४७।
शब्दार्थ—हुलास = आनंद । विलास-निवास = रतिविलासों का निवास
( स्थल ) । हियें = हृदय ( वक्षस्थल ) में । अवरेख्यो = लक्षित किया ।
भ्रम = चक्कर । भाँति = समान, सा । बिसेख्यो = विशेष रूप में बढ़ गया ।
मुद्रित होत = बंद होते हुए । बरहीं = बलपूर्वक । लेख्यो = समझा ।
भावार्थ—( नायिका की उक्ति सखी से ) हे सखी, उल्लासपूर्वक ज्यों-
ज्यों मैंने उनके वक्षःस्थल पर के रतिचिह्नों को ध्यान से देखा त्यों त्यों मेरे
हृदय में कंप होने लगा, कुछ चक्कर सा आने लगा, किंवा ठंडक की अधिकता
४५--हैं कबि० ∙ सुकबि अमीर । ४६—सों-को । ४७—बढ्यो-भयो ।
भाँति-भीत ।