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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 286 में से

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पृष्ठ 98

चतुर्थ प्रभाव ६६
स्यें = ओर। रतिनायक-सायक = कामदेव के बाण। उपमा० = मुख की
उपमा इस शोभा को स्पर्श करती है, मुख की शोभा ऐसी जान पड़ती है।
दुरचो = छिपा हुआ। जनु......दरसै = मानो आनंददायक पूर्ण चंद्र रविमंडल
में छिपा हुआ दिखाई पड़ रहा है (दर्पण रविमंडल है, मुख पूर्ण चंद्र है)।
अलंकार - उक्तविषया वस्तूतप्रेक्षा।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश साक्षात् दर्शन, यथा - ( सवैया )
(१२५) पहिले तजि आरस आरसी देखि घरीकु घसे घनसारहि लै।
पुनि पोंछि गुलाब तिलौँछि फुलेल अँगौछे में आछे अँगौछनि कै।
कहि केसव मेद जुबाद सों माँजि इते पर आँजे मैं अंजन दै।
बहुरयो दुरि देखौं तौ देखौं कहा सखि लाज तौ लोचन लागियै हैं।५।
शब्दार्थ-घरीकु = घड़ी भर। घनसार = कपूर। फुलेल = फूलों में वास
कर निकाला गया सुगंधित तेल। तिलौँछि = तेल से (लगाकर) साफ
करके। अँगौछे = (अँगौछे से) पोंछा। आछे = भली भाँति। अँगौछनि
कै = अँगौछों से, रूमाल से। मेद = कस्तूरी। जुबाद = (फारसी) बिलाव
के अंडकोश से निकली हुई एक प्रकार की कस्तूरी।
भावार्थ- (नायिका की उक्ति सखी से) हे सखी, पहले मैंने आलस्य
छोड़कर नेत्रों को दर्पण में देखा और घड़ी भर कपूर लेकर उनमें मला।
इसके बाद भली भाँति गुलाब से उन्हें पोंछा। फुलेल लगाकर उन्हें साफ
किया। भली भाँति अँगौछों से उन्हें पोंछा। इतना ही नहीं प्रत्युत कस्तूरी
और जुबाद से भली भाँति माँजकर (रगड़कर) उनमें अंजन लगाया। इसके
बाद मैंने छिपकर नायक को देखा, पर इतने पर भी नेत्रों में लज्जा लगी ही
(निकली नहीं)।
अलंकार-विशेषोक्ति (पूर्ण कारण के होते हुए भी कार्य न होने से)।
सूचना- 'कविप्रिया' के छठे प्रभाव में गुरु वस्तुओं के वर्णन में यह
सवैया लज्जा का गुरुत्व दिखाने के लिए उदाहरण में दिया गया है।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न साक्षात् दर्शन, यथा- (सवैया)
(१२६) भाल गुही गुन लाज लटैं लपटी लर मोतिन की सुखदंनी।
ताहि बिलोकति आरसी लै कर आरस सों इक सारसनैनी।
केसव कान्ह दुरैं दरसी परसी उपमा मति की अति पैनी
सूरज-मंडल में ससि-मंडल मध्य धँसी जनु जाइ त्रिवैनी।६।
५-घरीकु-कछुक। घसे-घसै, घस्यौ। जुबाद-जिबाद, जब्बाद, जबानि।
बहुरयो-बहुरों, बहुरे। तौ-जो। देखौ०-तौ देखि रो। लागियै है-लागेइ
है, लागि अहै। ६-श्रीकृष्णजू-नायक। सवैया-विजै छंद। मति की-मति कों
मति त। जनु-मनु। जाइ-ताहि, जाहि।