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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

१०० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—गुन लाल = लाल डोरा । सारस = कमल । दुरे = छिपे हुए ।
दरसी = दिखाई पड़ी । परसी = स्पर्श की । पैनी=तीखी ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, उस ( नायिका ) ने
अपने मस्तक पर की उन लटों को लाल डोरे से गुहा जिनमें मोतियों की
सुखदायिनी लड़ियाँ लिपटी हुई थीं। (गुहने के बाद ) वह कमलनैत्रवाली
हाथ में दर्पण लेकर उसे (उसकी शोभा को ) आलस्यपूर्वक (देर लगाकर)
देखने लगी। (उसकी इस क्रिया को) श्रीकृष्ण छिपे हुए देख रहे थे ।
वह उस समय उन्हें ऐसी दिखाई पड़ी और उनकी मति को ऐसी अत्यंत
तीखी (उत्कृष्ट, अनोखी ) उपमा ने स्पर्श किया, मानो सूर्य-मंडल (लाल
मणि के दर्पण ) में चंद्रमंडल ( मुख ) हो और त्रिवेणी धँसी हो (जा
पहुँची हो) (केशकलाप श्यामवर्ण होने से यमुना, लाल डोरे सरस्वती और
मोती उज्ज्वल वर्ण होने से गंगा की शोभा दे रहे थे ) ।
अलंकार—उक्तविषया वस्तूत्प्रेक्षा ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश साक्षात् दर्शन, यथा—( सवैया )
(१२७) इक तौ उर और उरोज अनूपम तैसे मनोहर हार महा री ।
सखि चित्त चलै तरुनीनिहूँ को तरुनैन की केसव बात कहा री ।
हितु सों हित की कहि आवति है पर कौ लगि होउँ री कौतुकहारी
अब अंचल दै नँदलाल बिलोकत री दधि नोखी बिलोवनहारी।७।
शब्दार्थ—चित्त चलै तरुनीनिहूँ को = स्त्रियों का भी मन आकृष्ट हो
जाता है । तरुनैन की = तरुण युवकों ( पुरुषों) की । हितु = मित्र, संगिनी ।
अंचल दै = अंचल से ढक । नोखी = अनोखी, विचित्र । बिलोवनहारी =
मथनेवाली ।
भावार्थ---( सखी की उक्ति नायिका से ) एक तो तेरे उर (वक्षःस्थल)
और स्तन यों ही अनुपम हैं और इतने पर ( इन उरोजों पर ) हार भी तद-
नुरूप अत्यंत मनोहर पड़े हुए हैं । तेरी यह शोभा देखकर युवती स्त्रियों का
मन भी चलायमान हो जाता है ( तेरी शोभा पर आकृष्ट हो जाता है ),
फिर तरुण पुरुषों की तो बात ही क्या ! अपनी संगिनी से भलाई की बात
कहनी ही पड़ती है । (आखिर ) मैं कब तक तमाशबीन ( तेरा यह तमाशा
देखनेवाली ) बनी रहूँ ? अब तो ( इन स्तनों को ) अंचल से ढक, नंदलाल
( श्रीकृष्ण खड़े खड़े ) उसकी छटा देख रहे हैं (और तू दही मथने का बहाना
करके उन्हें देखने का मौका दे रही है) तू तो अनोखी दही मथनेवाली निकलो!
अलंकार--काव्यार्थापत्ति और अनुगुण ।
७—उर-तरु । आवति०-है बनि आवति, है परि आवति, ही परि
आवति । होउं०-होहुँ रो, होंव री ।

चतुर्थ प्रभाव १०१
सूचना--मुद्रित प्रति में यह दोहा भी है--
प्रकट काम को कल्पतरु, कहि न सकति मति मूढ़ ।
चित्रहु में हरि-मित्र की, अति अद्भुत गति गूढ़ ॥
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न चित्रदर्शन, यथा-( सवैया )
(१२८) लोचन ऐंचि लिये इत कों मन की गति जद्यपि नेहनही है ।
आनन आइ गए श्रम-सीकर रोम उठे तन कंप लही है ।
तासों कहा कहियै कहि केसव लाज-समुद्र में बूड़ि रही है ।
चित्रहु में हरि-मित्रहि देखत यौं सकुची जनु बाँह गही है । ८।
शब्दार्थ--नही=नधी, जुड़ी, युक्त । श्रम-सीकर = पसीने की बूंदें ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति सखी से ) यद्यपि नायिका ने चित्र पर से
अपनी दृष्टि इधर की ओर खींच ली है तथापि मन की गति अब भी स्नेहयुक्त
है। क्योंकि उसके मुख पर पसीने की बूँदें आ गई हैं। रोएँ खड़े हो गए हैं
और शरीर ने कंप ग्रहण कर लिया है। उससे कहा भी जाय तो क्या कहा
जाय जो स्वयम् लज्जा के समुद्र में डूब रहा हो। चित्र में भी अपने प्रिय
श्रीकृष्ण को देखकर वह इस प्रकार सकुच गई है मानो उन्होंने प्रत्यक्ष ही
उसकी बाँह पकड़ ली हो ।
अलंकार-द्वितीय विभावना ।
सूचना- इसके बाद यह सवैया भी मुद्रित प्रति में है, जिसे सरदार ने
केशव का नहीं माना है-
तैं जनु मोहन कों चितयो कछु ऐसें कही जनु मोसों कही है ।
लाज तजै नहिं खेलत ही मन की गति गूढ़ कहाँ लौं लही है ।
केसव चित्रित मंदिर आजु दिखावत ही मति रीझि रही है ।
चित्रहु में हरि-मित्रहि देखत यों सकुची जनु बाँह गही है ।
(१२६) श्रीराधिकाजू को प्रकाश चित्रदर्शन, यथा-( कवित्त )
केसौदास नेहदसा दीपक सजोय कैसे,
ज्योति ही के ध्यान तम-तेजहि नसायहूँ ।
आँखिन सों बाँधे अन्न काहू की बुझानी भूख,
पानी की कहानी रानी प्यास क्यों बुझायहै ।
ए री मेरी इंदुमुखी इंदीवर-नंनी लखें,
इंदिरा के मंदिर में संपति सिधायहै।
ऐसे दिन ऐसं ही गंवावति गँवारि कहा,
चित्र देखें मित्र के मिले को सुख पायहै । ६।
८-गति-मति । तन-उर, श्रति, उठि। कंप०-कंप गही, कंपत ही । ६-
संजोय-संजोग । तम-तप । अन्न-अन्य । बुझानी-न भागी । रानी०-प्यास कंसे
के । इंदीवर०--इंदीबरनैन । में--क्यों । सिधायहे--समाइ है । देखें--बिना ।

१०२ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—नेहु = तेल; प्रेम । दसा = अवस्था; बत्ती । सँजोय =
जला, बाल । ज्योति ही के = प्रकाश के ही । तम-तेज = अंधकार का
आधिक्य; मन का मालिन्य । अन्न = अन्न, भोजन । आँखिन० = सिर्फ अन्न
ही आँख से देखते रहने से । इंदुमुखी = चंद्रमुखी । इंदीवर० = कमल के से
नेत्रवाली । इंदिरा = लक्ष्मी । गँवारि = मूर्ख, पगली ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका से) तू स्नेह-दशा (प्रेम की अवस्था;
तेल और बत्ती ) से दीपक जला (प्रियतम से मिल) केवल ज्योति ( प्रिय के
शरीर की कांति ) का ध्यान करने से तम का तेज ( अंधकार की प्रचंडता,
उदासी की अधिकता ) कैसे नष्ट कर सकेगी । क्या आँखों में अन्न बाँध लेने
से ( आँखों से अन्न देखते रहने से) किसी की भूख मिटी है ( या तेरी ही भूख
मिट जायगी ) । सिर्फ पानी की कथा कहने से, मेरी रानी, प्यास कैसे
बुझेगी ? ऐ मेरी चंद्रमुखी कमलनयनी सखी क्या लक्ष्मी का चित्र ही लिख
देने से घर में संपत्ति भर जाएगी ? इन दिनों को (जब कि प्रियतम से मिलने
के अनेक अवसर प्राप्त हो सकते हैं) ऐ पगली इस प्रकार ( केवल चित्र देखने
में) तू बिताए दे रही है । क्या प्रिय का चित्र देखने से ही तुझे प्रिय से मिलने
का सुख प्राप्त हो जाएगा ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न चित्रदर्शन, यथा -- ( कवित्त )
(१३०) रूठिबे को तूठिबे को मृदु मुसक्याय कै,
बिलोकिबो को भेद कछू कह्यौ न परतु है ।
केसौदास बोले बिनु बोलनि के सुनें बिनु,
हिलनि मिलनि बिनु मोहि क्यों सरतु है ।
कौ लगि अलोनो रूप प्याय प्याय राखौं नैन,
नीर देखें मीन कैसे धीरज धरतु है ।
चित्रिनी बिचित्र चित्र नीकें ही चित्तैयै मन,
चित्र में चिताएँ चित्त चौगुनो जरतु है ।१।०।
शब्दार्थ—रूठिबे को = खीझने का । तूठिबे को = रीझने का । हिलनि =
निकट जाना । मिलनि=भेंटना, आलिंगन करना । मोहि = मुग्ध होकर ।
सरतु है = पूरा होता है । अलोनो रूप = सजीव लावण्य से रहित सौंदर्य
( चित्र में लिखा होने के कारण ) । नीके ही = सँभलकर । चिताएँ = सचेत
करने से, संतोष दिलाते रहने से; सुलगाने से ।
भावार्थ-(नायक की स्वगत उक्ति) उस (प्यारी) के खीझने-रीझने,कोमल
मुसकान के साथ देखने का रहस्य कुछ कहा नहीं जा सकता । बिना उससे
१०—कह्यौ-कहि । मोहि-मोह । देखें-बिना । चित्र०-किन नीकेई ।
में चिताएं-चित्तए तें, चिताए में ।

चतुर्थ प्रभाव १०३
बोले तथा बिना उसकी बोली सुने एवम् बिना उससे हिले मिले केवल मुग्ध
होकर रह जाने से ही तो काम चल नहीं सकता। अपने नेत्रों को कब तक
अलोना रूप (चित्र के दर्शन से) पिला पिलाकर शांत रक्खूँ। (केवल चित्र
में उसकी छाया देख लेने से नेत्रों की तृप्ति नहीं होती)। क्या जल (पानिप,
शोभा) देख लेने पर मछली (आँख) धैर्य धारण कर सकती है? (चित्र
देखने पर उसको प्रत्यक्ष देखने की उत्कट इच्छा होना नेत्रों के लिए स्वाभा-
विक है)। ऐ मन, उस चित्रिणी का विचित्र चित्र सँभलकर देख, चित्र देख
देखकर संतोष करते रहने से तो चित्त चौगुना जलता है (अभिलाष उत्कट
होता जाता है)।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश चित्रदर्शन, यथा-( सवैया )
(१३१) अंतरिच्छ-गच्छनीनि यच्छनि सुलच्छनीनि,
अच्छी अच्छी अच्छनीनि छबि छमनीय है।
किंनरी नरी सुनारि पन्नगी नगी कुमारि,
आसुरी सुरीनिहूँ निहारि नमनीय है।
भोगिन की भामिनी कि देह धरे दामिनी कि,
काम ही की कामिनी कि ऐसी कमनीय है।
चित्रहू में चित्तहि चुरावति है केसौदास,
राम की सी रमनी रमा सी रमनीय है।११।
शब्दार्थ- अंतरिच्छ-गच्छनी = आकाशचारिणी। यच्छनी = यक्षिणी ।
सुलच्छनी = शुभलक्षणसंयुक्ता । अच्छनीनि = नेत्रोंवाली । छमनीय है =
क्षमा करने योग्य है, क्षमा करने की योग्यता रखती है। किंनरी = किंनरों
की स्त्रियां । नरी = मानवी । सुनारि = सुंदर स्त्रियाँ । पन्नगी = नागकुमारी ।
नगी = पर्वतकन्याएँ । निहारि = देखकर, देखने पर । भोगिन की भामिनी =
पातालवासियों की स्त्री । कि = अथवा । नमनीय = नमस्कार 'करने योग्य ।
देह धरे = मूर्तिमती । दामिनी = बिजली । काम कामिनी = कामदेव की स्त्री
रति । कमनीय = सुंदर । राम कैसी रमनी = सीता सी । रमा = लक्ष्मी ।
रमनीय = मन को लुभानेवाली ।
भावार्थ- (नायक-वचन सखी प्रति ) आकाशचारिणी, सुलक्षणा
यक्षिणी सुनयनाओं की शोभा को भी यह क्षमा करनेवाली है (इसकी शोभा
ऐसी है कि वे ईर्ष्या करती हैं और यह उन्हें अपने सौंदर्याधिक्य के कारण
क्षमा कर देती है-अर्थात् इसकी शोभा उनसे बहुत बढ़ी चढ़ी है) किंनरियां,
सुंदर मानवी स्त्रियाँ, नागकन्याएँ, पर्वतकन्याएँ, असुरपत्नियां और सुरपत्नियां
११-कि-धौ। काम०-कामनीयौ कहा। चुरावति०-चुराए लेति कोऊ यह ।

१०४ रसिकप्रिया
इसकी शोभा देखकर प्रणाम करतीं हैं। पातालवासियों की स्त्रियाँ अथवा
मूर्तिमती विद्युत् अथवा कामदेव की ही कामिनी रति भी क्या ऐसी सुंदर है ?
( नहीं)। यह चित्ररूप में ही चित्त चुराए ले रही है। यह तो रामपत्नी
सीता और लक्ष्मी सी सुंदर है।
अलंकार-प्रतीप और उपमा ( चतुर्थ चरण में )।
अथ स्वप्नदर्शन-लक्षण--( दोहा )
(१३२) केसव दरसन स्वप्न को, सदा दुरयोई होय ।
कबहू प्रगट न जानियै, यह जानै सब कोय ।१२।
शब्दार्थ-दुरघोई= छिपा हुआ अर्थात् केवल प्रच्छन्न ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न स्वप्नदर्शन, यथा- ( सवैया )
(१३३)आतुर ह्वै उठि दौरी अली, जन आतुर ज्यौं गहिये सु गही त्यौं ।
हो मेरी रानी कहा भयो तो कहुँ बूझति केसव बूझियै री ज्यौं ।
डीठि लगी, किधौं प्रेत लग्यो कि लग्यो उर प्रीतम जाहि डरो यौं ।
आनन सीकर सी कहियै धक सोवत तें अकुलाइ उठी क्यों ।१३।
शब्दार्थ-बूझत = पूछते हैं। डीठि = नजर । सीकर = पसीने की बूंदें ।
धक = एकाएक ।
भावार्थ - ( अंतरंग-सखी-वचन नायिका प्रति ) हे सखी. उतावलों की
तरह तू उठकर दौड़ी है और जैसे उतावला जन किसी को पकड़ता है उस
प्रकार तूने मुझे पकड़ रखा है। ऐ मेरी रानी, तुमको क्या हो गया है ? मैं
तुझसे वैसे ही पूछ रही हूँ जैसे (इस अवसर पर) पूछा जाता है। तुझे नजर
लग गई है या भूत-प्रेत लग गया है या प्रियतम ने हृदय से लगाया जिससे
तू इस प्रकार डर गई है। तेरे मुख पर पसीने की बूंदें छाई हैं, तू सी सी कर
रही है। एकाएक सोते से व्याकुल होकर आखिर क्यों उठ पड़ी ?
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न स्वप्नदर्शन, यथा- (कवित्त)
(१३४) नख-पद-पदवी को पावै पढु द्रौपदी न,
एको बिसौ उरबसी उर में न आनिबी ।
लोम सी पुलोमजा न तिल सी तिलोत्तमा न,
मैलहू समान मन मेनका न मानिबी ।
जानियै न कौन जाति अब ही जगाएँ जाति,
जीवन तौ जानिहौं जौ ताहि पहिचानिबी ।
१२-जानियै-देखियै । जानै-जानत । १३-ह्वै-ज्यों। जन-जनि ।
हो-है । बूझति बूझत । बूझिये ०-बूझि रही ह्यौँ ।

चतुर्थ प्रभाव १०५
बातक सी बानी माँह, भाव सी भवानी माँह,
केसौदास रति में रतीक ज्योति जानिबी ।१४।
शब्दार्थ—पदवी = उच्चता । एकौ बिसौ = थोडा भी । उरवसी = स्वर्ग
की एक अप्सरा । उर में न आनिबी = उसके उर की बराबरी के ध्यान में
नहीं चढ़ती । पुलोमजा = इंद्राणी । तिलोत्तमा = एक अप्सरा । जानू......
पहिचानिबी = यदि उसे पहचान लूँगा तो अपने जीवन को बचा समझूँगा
(तभी जान में जान आएगी । बातक = बात ही बात । भाव = भावना,कल्पना।
भावार्थ—( नायक उक्ति सखी से ) नख और पद की उच्चता का पद
द्रौपदी नहीं प्राप्त कर सकती, उर की समता के लिए उर्वशी मन में नहीं
लाई जा सकती । उसके रोएँ की समता पुलोमजा ( इंद्राणी ) से नहीं हो
सकती, उसके तिल की समता में तिलोत्तमा कुछ नहीं है । उसके मैल के
• समान भी मेनका अप्सरा नहीं मानी जा सकती । न जाने वह किस जाति की
( सुर नर आदि में से ) है । अभी वह मुझे सोते से जगाकर चली जा रही
है । अगर उसे पहचान सका ( वह मिल गई ) तभी मैं अपने प्राणों को बचा
समझूँगा । यही नहीं फिर तो मैं यही समझूँगा कि सरस्वती में छटा की
बात ही बात है, पार्वती में शोभा की कल्पना ही कल्पना है और रति में भी
रत्ती भर ही ज्योति है ।
अलंकार—प्रतीप ।
सूचना—( १ ) यहाँ केवल वर्णमैत्री के लिए उर्वशी, तिलोत्तमा आदि
उपमानों का नाम लिया गया है, किसी विशेष प्रसिद्धि के कारण नहीं ।
( २ ) इसके बाद मुद्रित प्रतियों में निम्नलिखित दो दोहे भी
मिलते हैं जो 'केसवदास' के नहीं माने गए हैं—
भूल होइ जिहि बात की, बिन देखत ही पीव ।
सखी सुनावै गुन सवन, अंग अंग सब जीव ।१।
सील रूप गुन समुझि कै, सखी सुनावै आन ।
केसव ताको कहत हैं, दर्सन स्रवन बखानि ।२।
श्रीराधािकाजू को प्रच्छन्न श्रवणदर्शन, यथा—( सवैया )
(१३५) सौंहैं दिवाइ दिवाइ सखी इक बारक काननि आनि बसाए ।
जानै को केसव कानन तें कित ह्वै कब नैननि माँझ सिधाए ।
लाज के साज धरेई रहे सब नैननि लै मनहीं सों मिलाए ।
कैसी करौं अब क्यों निकसैं री हरैंई हरैं हिय में हरि आए ।१५।
१४—द्रोपदी-पद्मिनी । जीवन०-जान जानिहौं जौ जाहि केहूँ । बातक
सी-बात कैसी । भाव सी--भाव सो । १५--कब--हरि । सब--तब ।

१०६ रसिकप्रिया
शब्दार्थ - सौहैं दिवाय० = शपथें दिला दिलाकर । इक बारक = सिर्फ
एक बार । काननि ० = कानों में ला बसाया । नैननि = नेत्रों ने । हरैं हरैँ =
धीरे धीरे ।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश श्रवणदर्शन, यथा- (कबित्त )
(११६) कौ लौं पीहौ कानरस, रूप की बुझैहै प्यास,
केसौदास कैसैं न नयन भरि पीजिये ।
बीर की सौं मेरी बीर बारी है जु वारौं आनि,
नेक ,किन हसहि बलाय तेरी लीजिये ।
बरसक माँहि यह बैस अलबेली बीतैं,
दैहौ सुख सखिन क्यों अबहीं न दीजिये ।
एरी लड़बावरी अहीरी ऐसी बूझै तोहि,
नाह सों सनेह कीजै नाह सों न कीजिये ।१६।
शब्दार्थ- कौ लौं = कब तक । रस = आनंद; पानी । बीर = सखी ।
बीर = संबोधन । बारी = बालिका, छोटी । वारी आनि = आकर निछावर
होती हूँ । नेक = जरा । लड़बावरी = प्रेम में पागल, अनाड़ी । बूझै = समझ
में आता है, मन में बात उठती है । नाह = नाथ, पति । नाह = नहीं ।
भावार्थ-(बहिरंग सखी की उक्ति नायिका से) तू कब तक कान से रस
(प्रियगुणश्रवण) का पान करती रहेगी, क्या इसी से रूपदर्शन की प्यास बुझ
जाएगी ? यदि नेत्र भर पिया न गया तो पीने ही से क्या ? तेरी शपथ मेरी
प्यारी, क्या तू छोटी है (जो इस तरह की बातें कह रही है ) ? मैं आकर
तुझ पर निछावर हो रही हूँ, जरा हँस तो दे मैं तेरी बला लेती हूँ। हाँ तो
कर दे । कोई वर्ष भर में यह अवस्था निकल जायगी तब सखियों को क्या
सुख दे सकेगी ? इसलिए ऐ अलबेली, अभी यह सुख क्यों नहीं देती ? (प्रिय
से मिल, जिससे सखियों को पुरस्कार आदि की प्राप्ति हो ) हे प्रेमपगली
अहीरी, तेरे बारे में यह बात ( शिक्षा ) मन में आती है कि तू प्रिय से प्रेम
कर, 'नहीं' से प्रेम मत कर ।
अलंकार - विरोधाभास ( अंत में ) ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न श्रवणदर्शन, यथा- (कबित्त )
(१३७) लंघतु है लोक, लोकलीक न उल्लंघी जात,
सबही तूँ समझावै तोहि समझावै को ।
१६- कैंसैं-कैसो । न नयन-जो न नैन, नयननि । पीजिये-पीजई,
लीनजई आदि । है-हौ । वारौं-वारी । किन हसहि-हँसि कहिहौ, हँसि हाँ
करि । माँहि-मांझ । बूझै-बूझौं ।

चतुर्थ प्रभाव १०७
छोड़न. कहत तनु तनक न छूटै लाज,
धन मीत राखि दोऊ. कोबिद कहावै को ।
सोच को सँकोचहू को पूरब-पश्चिम पंथ,
केसौदास एक काल एक 'जन धावै को ।
दुख-सुख दूरीदुरा दूरीहूँ तें मेरे मन,
जैसी सुनी तैसी तोहि आँखिन दिखावै को । १७।
शब्दार्थ - कोबिद = पंडित । दूरीदुरा = दूर करके, हटाकर ।
भावार्थ- (नायिका की उक्ति मन से) हे मन, तू लोकों तक का उलं-
घन तो कर जाता है, पर लोकमर्यादा का उल्लंघन किया ही नहीं जा
सकता । तू तो सबको समझाता है, तब तुझे कौन समझाए ? तू शरीर छोड़ने
को कहता है पर लज्जा तो थोड़ी भी तुझसे छूटती नहीं (शरीर क्या छोड़ा
जाएगा ?) । धन को भी और मित्र (की मित्रता) को भी दोनो को बनाए
रखकर कौन पंडित कहला सकता है ? सोच और संकोच का पूर्व और पश्चिम
(विपरीत) मार्ग है। इन दोनो मार्गों पर एक ही समय में एक ही व्यक्ति
कैसे दौड़ सकता है ? इसलिए दुख सुख को दूर करके ऐ मेरे मन, जैसी छवि
उनकी सुन रखी है वैसी दूर से ही सही तुम्हें आँखों से कौन दिखा सकता
है ? (उनके श्रवणदर्शन हो रहे हैं, पर प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होते) ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश श्रवणदर्शन, यथा- (कबित्त)
(१३८) निपट कपट हर प्रेम को प्रकट कर,
बीस बिसे बसीकर कैसैं उर आनियै ।
काम को प्रहरषन कामना को बरषन,
कान्ह को सँकरषन सब जग जानियै ।
किधौं केसौदास महि मोहनी को भूषन है,
किधौं ब्रजबालनि को दूषन बखानियै ।
सुनतहीं छूट्यो धाम बन बन डोलैं स्याम,
राधे तेरो नाम कै उचाटमंत्र मानियै ।१८।
शब्दार्थ - बीस बिसे = पूर्ण रूप से । संकरषन = खींचनेवाला ।
भावार्थ- (सखी की उक्ति नायिका से) यह अत्यंत कपट को हरनेवाला,
प्रेम को प्रकट करनेवाला और पूर्णरूप से वश में करनेवाला है, हृदय में कैसे
धारण किया जा सकता है ? काम को प्रहर्षित करनेवाला, कामनाओं का


१८-महि--मन ।

१०८ रसिकप्रिया
वर्षण करनेवाला, कृष्ण को आकृष्ट करनेवाला है, इसे सब जग (लोग) जान
गया है। यह पृथ्वी में मोहनी (विद्या) के लिए भूषण (अनुकूल) है या
व्रजबालाओं के लिए दूषण (विपरीत) है ? इसके सुनते ही घर छूट गया है
और श्याम वन वन घूम रहे हैं यह तेरा नाम है या उच्चाटन मंत्र ?
सूचना—राधिका के नाम और उच्चाटन मंत्र दोनो पर विशेषण
घटित होंगे।
( दोहा )
(१३६) दरस रमन रमनीनि के, कहे परम रमनीय ।
प्रगटन प्रेम प्रभाव अब, कहौं कछू कमनीय । १६ ।
इति श्रीमन्मन्महाराजकुमार इंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां चतुर्विध-
दर्शनप्रच्छन्नप्रकाशवर्णनं नाम चतुर्थः प्रभावः ।।४।।
पंचम प्रभाव
अथ दंपति-चेष्टा-वर्णन - ( दोहा )
(१४०) तिनके चित की जानि सखि, पिय सों कहै सुनाय ।
कहै रूखी सों प्रीतमै, आपुन तें अकुलाइ । १ ।
श्रीराधिकाजू की सखी को वचन कृष्ण प्रति - ( सवैया )
(१४१) काल्हि की ग्वालि तो आजहू लौं न सँभारति केसव कैसेहूँ देहै ।
सीरी ह्वै जाति, उठै कबहुँ जरि जीव रह्यौ कै रही रुचि-रेहै।
कोरि बिचार बिचारति है उपचारनि के बरसें सखि मेहै।
कान्ह बुरौ जिन मानी तिहारी बिलोकनि में बिस बीस बिसै है । २ ।
शब्दार्थ—ग्वालि = गोपिका । देहै = शरीर को । रुचि = चमक, कांति ।
रेहै = रेखा ही । रही रुचि-रेहै = कांति की रेखामात्र रह गई । कोरि =
करोड़ । मेहै= मेघ ही । बिस = विष ।
भावार्थ- हे कृष्ण, आपने जिस गोपिका को कल देखा था वह आज
तक भी किसी प्रकार अपने शरीर को सँभाल नहीं पा रही है। कभी वह ठंडी
पड़ जात है और कभी जल उठती है। पता नहीं चलता कि उसके शरीर में
प्राण हैं या वह कांति की रेखा मात्र ही रह गई है (प्राण उड़ गए हैं) ।
सखियां उसको होश में लाने के लिए करोड़ों उपाय सोचती हैं, वे उपचार
की वर्षा कर रही हैं (अत्यधिक उपचार कर रही हैं) फिर भी वह होश में
नहीं आ रही है। बुरा मत मानिएगा (मुझे ऐसा जान पड़ता है कि) आपकी
१६—दरस०-दर्सनरस रमनीन के । १- तिन-तिय । २- रह्यो-ह्वो है कै ।

पंचम प्रभाव १०६
चितवन में बीसो बिस्वा ( पूर्ण रीति से, निश्चय ही ) विष भरा हुआ है
( नहीं तो ऐसा क्यों होता ) ।
सूचना—विष खानेवाले का शरीर कभी ठंडा पड़ता है, कभी गरम हो
जाया करता है, कभी जान निकल गई सी जान पड़ती है, इसलिए यहाँ पर
विष के प्रभाव और चितवन के प्रभाव का साम्य दिखलाकर चितवन का विष-
होना कहा गया है ।
अलंकार—रूपक, काव्यलिंग ।
श्रीकृष्णजू को वचन राधिका की सखी प्रति—( कबित्त )
(१४२) प्यास ह्वै रही उदास, भागी भूख गहि त्रास,
केसौदास नींदहू की निंदा नित ठानी है।
मति को मतौ न लेय बिद्या की बिदाई देय,
सोभा सुकी सेय सेय सब सुख सानी है।
बिष से लगत गीत, केलि की न परतीत,
प्रीत डर पाहुनी सी पचि पहिचानी है।
तो बिन कहै को गाथ धीरता न ताके साथ,
मोहिं को मिलावै हाथ लाज के बिकानी है ।३।
शब्दार्थ—नींदहूँ ..ठानी है = अर्थात् निद्रा भी नहीं आती । मतौ =
राय, संमति ।
भावार्थ—( नायक की उक्ति सखी से ) उस ( नायिका ) की प्यास
उदास हो गई है, भूख भयभीत होकर भाग गई है, निद्रा की भी नित्य निंदा
करती है ( अर्थात् प्यास-भूख और नींद नहीं हैं ) । बुद्धि की सलाह नहीं
लेती, विद्या को भी बिदाई दे दी है ( न बुद्धि ठिकाने है और न विद्या से ही
काम ले रही है ) । सोभारूपी सुग्गी को सेने में ध्यान लगाकर सुख का
अनुभव कर लेती है ( अन्यथा दुख ही दुख है) । गीत (गान) तो उसे विष से
जान पड़ते हैं, केलि ( क्रीड़ा ) का भी विश्वास जाता रहा । प्रीति बड़ी कठि-
नाई से नई आई पाहुनी की तरह उसके द्वारा पहचानी गई है । तेरे बिना
समाचार कौन कह सकता है ? उसके पास धीरता नहीं है । मुझे उससे
कौन मिला सकता है ? वह तो इस समय लज्जा के हाथ बिक गई है ।
अथ चेष्टा-लक्षण—( दोहा )
(१४३) पिय सों प्रगटन प्रीति कहँ, जितने करौ उपाय ।
ते सब केसवदास अब बरनों सबनि सुनाय ।४।
३—गहि त्रास--गई बास । नित-दिन । सोभा०- सेज सूनी । सुख--दुख ।
धीरता०--धीरता लै के साथ । ४—करौ-करहि, करत । बरनों--बरनंत ।

११० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—पिय = प्रिय, नायक । प्रगटन प्रीति कहूँ = प्रेम को प्रकट
करने के लिए । करौ = किए जाते हैं ।
(१४४) जब चितवै पिय अनत ही, तब चितवै निहसंक ।
जानि बिलोकत आपु त्यों, अलिहि लगावै अंक ।५।
शब्दार्थ—अनत = अन्यत्र । निहसंक = निःशंक, शंकारहित । आपु त्यों
= अपनी ओर । अलिहि=सखी को । अंक=अँकवार छाती ( से ) ।
(१४५) कबहुँ श्रुति-कंडू करै, आरस सों ऐंड़ाइ ।
केसवदास बिलास सों, बार बार जमुहाइ ।६।
शब्दार्थ—श्रुति-कंडू=कान खुजलाना । आरस = आलस्य । ऐंड़ाइ =
देह तोड़ती है । बिलास = भावभंगिमा, आकर्षक चेष्टा । जमुहाइ = जँभाई
लेती है ।
((१४६) झूठहीं हँसि हँसि उठै, कहै सखी सों बात ।
ऐसें मिसहीं मिस प्रिया, पियहि दिखावै गात ।७।
शब्दार्थ—मिस = बहाना । प्रिया = नायिका ।
(१४७) यों हीं पीय पियानि प्रति, प्रगटत अपनी प्रीति ।
सो प्रच्छन्न प्रकास करि, बुधिबल करत समीति ।८।
शब्दार्थ—पीय = नायक । करि = भेद करके । समीति करत = एकत्र
करते हैं ।
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न चेष्टा, यथा—(कबित्त)
(१४८) चोरि चोरि चित चितवति मुँह मोरि मोरि,
काहैं तें हँसति हियें हरष बढ़ायो है ।
केसौदास की सौं तूँ जँभाति कहा बार बार,
बीरी खाइ मेरी बीर आरस जौ आयो है ।
ऐंड़ सों ऐंड़ाति अति अंचल उड़ात, उर
उघरि उघरि जात गात छबि छायो है ।
फूलि फूलि भेंटति रहति उर भूलि भूलि,
भूलि भूलि कहति कछू तैं आज खायो है ।९।
शब्दार्थ—चोरि चोरि = चुरा चुराकर । ऐंड = गर्व की मुद्रा । उर =
वक्षःस्थल । फूलि फूलि = प्रसन्न हो होकर । उर = हृदय में । भूलि भूलि =
झूम झूमकर ।
५—निहसंक-निरंसक । ७—प्रिया--तिया । ८—यों-त्यों । प्रगटत-- प्रगटै।
करत--कहत । ९—केसौदास-केसोराइ । जो -त्यौं । बीरी०-बिस लाइ मेरी बीर
ओर जोर प्रायो है । उड़ात-उठात । उघरि०-उरज उघरि जात । छायो-पाय ।

११२ रसिकप्रिया
अलंकार—पिहित ।
श्रीकृष्णजू की प्रच्छन्न चेष्टा, यथा—( कबित्त )
(१५०) छोरि छोरि बाँधौ पाग आरस सों आरसी लै,
अनत ही आन भाँति देखत अनैसे हौ ।
तोरि तोरि डारत तिनूका कहौ कौन पर,
कौन के परत पाइ बावरे ज्यौं ऐसे हौ ।
कबहुँ चुटकि देति चटकि खुजावौ कान,
मटकि ऐँडाउ जुरी ज्यौं जँभात तैसे हौ ।
बार बार कौन पर देत मनिमाला मोहि
गावत कछू के कछू आज कान्ह कैसे हौ ।११.
शब्दार्थ—पाग = पगड़ी । आरसी = (आदर्श) दर्पण । अनत = अन्यत्र ।
आन भाँति = दूसरे ढंग से । अनैसे = (अनिष्ट) बेढंगे । तिनूका = तिनका ।
चुटकि = देत = चुटकी बजाते हो । चटकि = जल्दी से । जुरी = ज्वरी, ज्वरग्रस्त ।
जुरी० = ज्वर से पीड़ित व्यक्ति की भाँति जँभाते हो । कौन पर = किसके लिए ।
(१५१) श्रीकृष्णजू की प्रकाश चेष्टा, यथा—( सवैया )
जा लगि लाँच लुगाइनि दै दिन नाच नचावत साँझ पहाऊँ ।
केसव मंत्र करौ बसकारक हारक जंत्र कहाँ लौं गनाऊँ ।
हारि रहे हरि क्योंहूँ मिली न मिलाऊँ जौ ताहि तौ माँगौं सो पाऊँ ।
ठाढ़ी वै जाइ मिलौ मिलिबे कहँ और कछू कनियाँ करि लाऊँ ।१२।
शब्दार्थ—लांच = घूस, रिश्वत । दिन = नित्य, प्रतिदिन । पहाऊँ =
प्रभात, सबेरे । हारक = थका देनेवाले ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायक प्रति ) जिसको आपने वश में करने
के लिए नित्य दूतियों को घूस देकर साँझ-सबेरे नाच नचाया (परेशान किया),
फिर आपने अनेक वशीकरण मंत्रों का प्रयोग किया तथा थका देने वाले जंत्रों
का भी प्रयोग किया, मैं कहाँ तक उनकी गिनती करूँ । आप अब हार मान
बैठे, वह किसी प्रकार मिली नहीं । ऐसी नायिका को यदि मैं आपसे ला
मिलाऊँ तो अवश्य ही जो माँगूँ वह मिलेगा (मुझे इसका पूरा विश्वास है) ।
अच्छा जाइए, वे मिलने को खड़ी हैं, क्या उन्हें गोद में लाना पडेगा ?
११—बांधो-बांधै । कहौ-तुम । ऐँडाउ-पोंडाउ, ऐँड़ात । तैसे-वैसे, जैसे ।
के-को । १२—लांच-लोच । पहाऊं-महांऊं । हारक-हारे के । क्यों हूँ-केहूं ।
सो-सु । जाइ-जाहु । कछू-कहा । लाऊं-ल्याऊं ।

पञ्चम एवं षष्ठ प्रभाव: नायिका-भेद (पद्मिनी, चित्रिणी आदि एवं षोडश हाव-भाव)

८ पंचम प्रभाव ११३
अथ स्वयंदूतत्व-लक्षण-(दोहा)
(१५२) जौ क्योंहूँ न मिलै कहूँ, केसव दोऊ ईठ।
तौ तब अपने आप ही, बुधिबल होत बसीठ ।१३।
शब्दार्थ—ईठ = (इष्ट) मित्र। अपने आप ही = स्वयम् ही। बसीठ =
(अवसृष्ट विसृष्ट) दूत।
(१५३) श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न स्वयंदूतत्व, यथा—(सवैया)
दूरि तें देखिबे कौं ह्वै दीन मनाई हुती लिखि ही लिखि चीठी।
देखें मिल्यो मनु हौं हू मिली मिलि खेलिबे हूँ कों मिली मति मीठी।
ऐसे में और चलाइहौ केसव कैसहूँ कान्ह कुमार द्वै ढीठी।
लागै न बार मृनाल के तार ज्यों टूटैगी लाल हमैं तुम्हें ईठी ।१४।
शब्दार्थ—हुती = थी। मीठी = अच्छी। ढीठी = धृष्टता। बार = देर।
ईठी = मित्रता।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति नायक प्रति) अत्यंत दीन हो होकर दूर
से ही देख लेने के लिए चिट्ठियां लिख लिखकर आपने मनाया। देखने पर
मन मिल गया। मैं भी आपसे मिली। मिलकर खेलने के लिए मधुर मति
भी मिल गई (खेल खेलने की सुहावनी बुद्धि भी जगी)। ऐसे अवसर पर हे
कान्ह कुमार, यदि धृष्टतापूर्वक और कोई चर्चा चलाएँगे (जाने की बात
करेंगे) तो हे लाल, हमारी आपकी मित्रता टूट जायगी, मृणाल तार की
भाँति उसके टूटने में कुछ भी देर न लगेगी (यह आपने चलने का क्या
झगड़ा छोड़ दिया)।
अलंकार—दृष्टांत।
सूचना—प्रमुद्रित प्रतियों में इसके बाद एक सवैया और मिलता है जो
पू० यां हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
पुनः प्रिया को स्वयंदूतत्व, यथा—(सवैया)
छुवौ जनि हाथ सों हाथ किये पल ही पल बाढ़त प्रेमकला।
न जानियै जी मैं कहा बसि जाइ चलै पुनि केसव कौन चला।
भले ही भले निबहै जो भली यह देखिबे ही की हला हू भला।
मिलौ मन तौ मिलिबौई कहूँ मिलिबौ न अलौकिक नंदलला।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश स्वयंदूतत्व, यथा—(सवैया)
(१५४) धाई नहीं घर दाई परी जुर, आई खिलाई की आँखि बहाऊँ।
पौरिये आवै रतौंधी इते पर ऊँचो सुनै सु महा दुख पाऊँ।
१३—लक्षण-वर्णन। होत-होइ, करत। १४—मनाई-पठाई। ढीठी—
डीठी। लागै०—ह्वै है न, तो ह्वै है। मृनाल—मुराति, मुरारि।

११४ रसिकप्रिया
कान्ह निबेरहू न्याउ नयो इन आलिन कौ लगि हौं बहराऊँ ।
ए सब मो सँग सोवन आवैं कि मैं इनके सँग सोवन जाऊँ ।१५।
शब्दार्थ—धाई = ( धातृ ) अपना दूध पिलाकर बच्चों को पालनेवाली ।
दाई = परिचारिका । आई = ( आर्या ) अइया । खिलाई = खिलाई हुई,
खाने मात्र पर सेवा करनेवाली । बहाऊँ = आँसू बहानेवाली । पौरियै = द्वार-
पाल को । निबेरहु = निपटा दो ।
भावार्थ—घर में धाय नहीं है । दाई ज्वर में पड़ी है । आई की आँखें
आँसू बहाती रहती हैं ( वह भी देखने में अशक्त है ) द्वारपाल को रतौंधी
आती है ( रात में सूझता ही नहीं ) । ( यही क्यों ) इतने पर भी वह ऊँचा
सुनता है ( बहरा है ), इसलिए बड़ा दुख पा रही हूँ । हे कान्ह, मेरे इस
नए ( विलक्षण ) न्याय का निबटारा करते जाइए । मैं इन सखियों से आखिर
कब तक अपने मन को बहलाती रहूँ । ( दिन में तो किसी प्रकार समय कट
भी जाता है पर रात कैसे कटे ) इसलिए या तो ये सब मेरे साथ सोने के
लिए ( मेरे घर पर ) आया करती हैं या मैं ही इनके यहाँ सोने चली जाया
करती हूँ ( मुझे अकेले बड़ा भय लगता है ) ।
सूचना—'आई' का अर्थ 'आर्या' करके 'बुड्डी' करने के बदले 'आँख
आई' अन्वय भी कर सकते हैं ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न स्वयंदूतत्व, यथा—( कबित्त )
(१५५) आपनेहीं भाइ के ए सोहत सरीक से वे,
केसौदास दास ज्यों चलत चित लीने हैं।
आपुहीं अठाउ कै ये लेत नाउँ मेरो वे तौ,
बापुरे मिलाप कै संलाप करि हीने हैं।
राधिकै सुनाइ कै कहत ऐसें घनश्याम,
सुबल को लै लै नाम कामभयभीने हैं।
साथ लै सखानि अब जैबो बन छाड्यो हम,
खेलिबे को संग सखा साखामृग कीने हैं । १६।
शब्दार्थ—ये = गोपसखा । सरीक = साथ । वे = वानर सखा । चित
लीने = चित्त मिलाकर, उनकी मरजी का ध्यान रखकर । अठाउ = शरारत ।
बापुरे = बेचारे । मिलाप = मेल । संलाप = बातचीत । सुबल = ( स्वबल )
अपनी सेना या अपना बल । साखामृग = बंदर ।
१५—जुर-जुरि । आई-आई । कौ-कि । बहाऊं-महाऊँ । पौरिये-पीरि
पै । रतौंधी-रत्योंधु । बहराऊं-समभाऊँ । मैं इनके ०-हौं इनके सब । १६—
आपनेहीं-आपनेई । भाइ के-भाउ को । चित-चित्तु । आपुहीं-आपुए । कै ये-
कै तो । मेरो-मेरे । संलाप-संताप । राधिकै-प्रिया को । भय-रस ।

पंचम प्रभाव ११५
भावार्थ—( सखी का वचन सखी से ) राधिका को सुना सुनाकर काम-
त्रास से भीत घनश्याम श्रीकृष्ण अपनी वानरी सेना को नाम ले लेकर बुलाते
हैं। (उन्होंने गोप सखाओं का साथ छोड़ दिया है, वानर सखाओं का साथ
किया है, वानर हैं शाखामृग, वृक्षों पर ही अपने झुंड के साथ रहते हैं, उन्हें
आवश्यकता पड़ने पर नाम ले लेकर बुलाना पड़ता है ) । श्रीकृष्ण कहते हैं
कि गोप सखा तो अपने भाइयों के संगी हैं, उनके साथ साथ रहते हैं ( मेरे
साथ रहना उन्होंने छोड़ दिया है )। रहे वे वानर सो वे दास की भाँति
चित्त को समझकर ही साथ रहते हैं । प्रायः वृक्षों पर ही डटे रहते हैं । मैं
चाहूँ या बुलाऊँ तो आते हैं अन्यथा नहीं । गोप सखा नटखटपना स्वयम् करते
थे और नाम मेरा लगाते थे । वे वानर बेचारे तो मिलाप और बातचीत
दोनों से रहित हैं । न तो उनका निरंतर साथ रखा जा सकता है और न वे
वार्तालाप करने के योग्य हैं । गोपों के साथ बन जाना मैंने छोड़ दिया है । रहा
यहाँ समय काटने का प्रश्न सों इन्हीं वानरों को सखा बना लिया है इनसे कुछ
समय तक मन बहलाया, फिर ये डाल पर जा लटकते हैं। मैं अकेले रह जाता हूँ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश स्वयंदूतत्व यथा—( सवैया )
(१५६) बन जैयै चलौ, कोऊ ठाली है केसव हौ तुम हैं तौ अरे अरिहौ ।
कछु खेलियै खेलि न आवत आज ही भूल्यो न भूल्यो गरे परिहौ ।
हितु है हिय, है किधौं नाहीं तऊ हितु नाहिं हिये तु ललां जरिहौ ।
हम सों यह बूझियै ऐसी कहौ ब कही हो कही सु कहा करिहौ ।१७।
शब्दार्थ—जैबै = जाना है । ठाली = बैठी ठाली, फालतू, बेकाम ।
अरिहो = अड़ोगे, बरजोरी करोगे । ही = हृदय । हितु = प्रेम ।
भावार्थ—नायक और नायिका का संवाद वर्णित है—
नायक—बन जाना है, चलो ।
नायिका—यहाँ क्या कोई बैठी ठाली है ? ( जो बन को चले ) ।
नायक—तुम तो हो ।
नायिका—हाँ, हूँ तो क्या बरजोरी करोगे ?
नायक—(नहीं) कुछ खेल खेलें ।
नायिका—खेलना तो आता ही नहीं ।
नायक—(अब तक आता था) क्या आज ही खेलना भूल गया है ।
नायिका—( मान लीजिए कि ) नहीं भूला है ( आता ही है तो क्या )
गले पड़ेंगे ( बरबस खेल खेलेंगे ) ।
१७—जैयै-जैबै, कौं जू । हैं-हौं, ही । अरी--अरे । खेलियै-खेलन ।
भूल्यो ०--भूलो न भूलौ । हिय है--हिय में । तु--तौ । ब--जो । सु--ब ।

११६ रसिकप्रिया
नायक—( तुम्हारी तो बात ही समझ में नहीं आती, तो भी यह बत-
लायो कि ) तुम्हारे हृदय में ( मेरे लिए ) प्रेम तो है न ?
नायिका—क्या जाने है या नहीं ।
नायक—इतने पर भी प्रेम नहीं है ।
नायिका—( मान लीजिए नहीं है ) तो क्या आप झगड़ा करेंगे ?
नायक—मुझसे अब ऐसा व्यवहार और ऐसी बातें कह रही हो ?
नायिका—जो मैंने कहा सो कहा । आप क्या कर लेंगे ?
सूचना—'नायिका के टेढ़े उत्तर सखियों को दिखाने के लिए हैं, वह
नायक को बतला रही है कि मेरी इच्छा विहार की है ।' ऐसा अर्थ सरदार ने
अपनी टीका में किया है। इसलिए 'अरिहौँ' का अन्य अर्थ 'सकोगे', 'गरे
परिहौँ' का अर्थ 'भेंटोगे', 'लरिहौँ' का 'विहार करोगे' आदि किया है।
अलंकार—गूढ़ोक्ति ।
अन्यच्च, यथा—( कबित्त )
(१५७) केसौदास घर घर नाचत फिरत गोप,
एक परे छकि ते मरेई गुनियत है ।
बारुनी के बस बलदाऊ भए सखा सब,
संग लै को जैये दुख सीस धुनियत है ।
मोहिं तौ गए ही बनै दीह दीपमाला पाइ,
गाइन संवारिबे को चित्त चुनियत है ।
जौ न बसौं लोलिनैनि लेरुवा मरहिं सब,
खरिक खरेई आज सूने सुनियत हैं। १८।
शब्दार्थ—छकि = नशे में चूर । बारुनी = मदिरा, शराब । दीहु
दीपमाला = बड़ी दीवाली । सँवारिबे कौं = एकत्र करने के लिए । चुनियत
है = चाहता है । लेरुवा = बछड़े । खरिक = गोशाला ।
भावार्थ—जितने गोप हैं घरघर नाचते फिरते हैं, वे नशा पी पीकर
ऐसे बेहोश हो गए हैं कि उन्हें मरा ही समझना चाहिए । बलदेव तथा सभी
सखा शराब के वश में हैं ( वे सब उसी के नशे में चूर हैं ) । अब मैं साथ में
लेकर जाऊँ भी तो किसे, इसी दुख से सिर पीट रहा हूँ । मेरे जाने से ही
बनेगा, बड़ी दीवाली 'श्रा गई । गायों को एकत्र करना ही उचित है । चंचल
नयनी, यदि मैं गोशाला में आकर नहीं बसता तो बछड़े सबके सब मर जाएँगे
क्योंकि गायों के भी न रहने से गोशाला में अत्यंत सन्नाटा है ।
————————————————————————————————
१८—एक—ऐसे । परे—रहे । भए—कीन्हें । लै को—लै कै, को लै । जैये—
जाउँ । दुख—काहि, देखे । गए हीँ—गहेई । दीह—देह । संवारिबे—सिगारिबे ।
बसौँ—मिलै, मेलौं । मरहिं०—मरेही प्यासे । खरिक—खरक, दखिक ।

पंचम प्रभाव ११७
सूचना—( १ ) 'दीह दीपमाला' से बड़ी दीपावली । छोटी दीवाली
'डिठवन' ( देवोत्थानी हरिप्रबोधनी ) को होती है । 'सूने सुनियत' से सन्नाटा
और एकांत सूचित करना चाहता है । (२) हस्तलिखित पूर्ण प्रति में वह छंद
नहीं है ।
( दोहा )
(१५८) ऊढ़ा पुनि यहि भाँति करि, बहु बिधि हितनि जनाइ ।
आपुन ही तें लाज तजि, पियहि मिलै अकुलाइ ॥१६॥
यथा—(कवित्त)
(१५६) पंथ न थकत पल मनोरथ-रथनि के,
केसौदास जगमग जैसैं गाए गीत मैं ।
पवन बिचार चक्र चक्रमन चित चढ़ि,
भूतल अकास भ्रमै घाम जल सीत मैं ।
कौ लौं राखौं थिर बपु बापी कूप सर सम,
हरि बिनु कीने बहु बासर बतीत मैं ।
ज्ञान-गिरि फोरि तोरि लाज-तरु जाइ मिलौं,
आपु ही तें आपगा ज्यौं आपुनिधि प्रीतमैं ॥२०॥
शब्दार्थ—जैसें गाए गीत मैं = जैसे वे रथ गीतों में गाए गए हैं (अर्थात्
अत्यंत तीव्र ) । पवन = वायु, श्वास । चक्र = पहिया । चक्रमन=चंक्रमण,
घूमना, चलना । वपु = शरीर । बापी = बावड़ी । सर = तालाब । आपगा =
नदी । आपुनिधि = समुद्र । प्रीतमैं = प्रिय को ।
शब्दार्थ—( नायिका की उक्ति ) मनोरथ के रथ का मार्ग क्षण भर
भी रुकता नहीं है । वह उसी प्रकार गतिशील रहता है, जगमगाता मार्ग पर
चलता है, जैसा गीतों में गाया गया है । श्वास और विचार इस रथ के चक्र
(पहिये) हैं । इस रथ पर चढ़कर घूमने के लिए निकलता है चित्त । वह इस
पर बैठा भूतल से आकाश तक धूप, वर्षा और जाड़े में घूमता ही रहता है ।
शरीररूपी जल को बावड़ी, कुएँ और तालाब के जल की भाँति कब तक
स्थिर रखूँ । हरि के वियोग में बहुत दिन मैंने बिताए अब तो ज्ञान के पर्वत
को तोड़ कर ( मार्ग निकालकर ) और लज्जा रूपी वृक्ष को तोड़कर स्वयम्
ही यह देहरूपी नदी प्रियतम समुद्र से जा मिले ( यह इच्छा होती है ) ।
अलंकार—रूपक ।
अन्यच्च, यथा—(सवैया)
(१६०) जाति भई सँग जाति लै कीरति, केसव है कुल सों हित खूट्यो ।
गर्व गयो गुन जोबन रूप को पुन्य सु तौ फल ही पल फूट्यो ।
१६—हितनि-हित-नेह । पियहि-पतिहि । २०—थकत-थकित । रथनि के -
रथन के, रथ नाके । चक्रमन-चक्रमान । फोरि-कोरि ।

११८ रसिकप्रिया
कान्ह-तिहारियै आन कियें कहौं लाज सों नीको ह्वै नातोई टूट्यो ।
छाँड्यो सबै हम हेरि तुम्हें तुम पै तनकौ कपटौ नहिं छूट्यो ।२१।
शब्दार्थ—जाति भई = नष्ट हो गई । खूट्यो = कम हो गया , पुन्य =
पुन्य का घड़ा । आन = शपथ । नीके ह्वै = भली भाँति । हेरि = देखकर ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति) मेरी कीर्ति (आपके प्रेम के कारण)
गई (नष्ट हो गई) और अपने साथ ही मेरी जाति भी लेती गई (जात-बिरा-
दरी से भी पृथक् कर दी गई, अपकीर्ति हुई सो तो हुई ही) । कुल (कुटुंब)
से प्रेम कम हो गया, क्षीण हो गया । गुण, सौंदर्य और यौवन का भी गर्व
चला गया (मैंने इनका तो गर्व भी नहीं किया) । क्षणक्षण पुण्य का घड़ा
भी फूटता ही गया अर्थात् सुख नहीं रहा । हे कान्ह, आपकी शपथ करके
कहती हूँ कि लज्जा से तो बना बनाया नाता ही टूट गया (मैंने लज्जा भी
छोड़ी) । क्या कहूँ, तुम्हें देखकर (तुम पर मुग्ध होकर) मैंने तो सब कुछ
छोड़ दिया, पर तुमसे कुछ भी छोड़ा नहीं गया, यहाँ तक कि थोड़ा सा भी
कपट तुमने नहीं छोड़ा (आप अब भी अन्य स्त्रियों के यहाँ जाते हैं और
मुझसे कपट करके) ।
(दोहा)
(१६१) अधिक अनूढ़ा लाज तें, पिय पै जाइ न आप ।
क्योंहूँ करि सखियै कहै, ताके उर की ताप ।२२।
शब्दार्थ—आप = स्वयम् । क्योंहूँ करि = किसी प्रकार । सखियै = सखी
ही । ताप = गरमी, संताप ।
यथा—(सवैया)
(१६२) जानै को केसव कौने कह्यो कब कान्ह हमारे हिंडोरनि भूलै ।
पान न खाइ, न पान्यो पियै तब तें भरि लोचन लेत समूलै ।
जाहु नहीं चलि बेगि बलाइ ल्यौं लेहु सकेलि कहा यह भूलै ।
जानत हौ वह काम-कली कुँ भिलाई गएँ बहुरयौ फिरि फूलै ?२३।
भावार्थ—(सखी-वचन नायक से) हे कान्ह, न जाने कब किसने उससे
कह दिया है कि कान्ह हमारे भूले पर भूलते हैं । (तभी से) न वह पान
खाती है न पानी पीती है। वह लोचनों को समूल (जड़ से, भली भाँति आँसू
से) भर लेती है। मैं आपकी बला लेती हूँ आप शीघ्र ही उसके पास चले
क्यों नहीं जाते ? उसके निकट जाने में देर करना आपकी भूल है, ऐसा करके
२१—सों-मों । खूट्यो-फूट्यो, झुट्यो । गुन-पुनि । पुन्य०-सो तो सबै ।
फुट्यो-खूट्यो। निहारियै-तिहारि ही । कहौं--कहूँ । नीको-नीके, नीक । ह्वै-ही ।
२२—क्यों हूँ०-कैहूँ करि । उर-तन । २३—पान्यो-पानी । लोचन०—
अखियो लेति । लेउ-लैहो ।

पंचम प्रभाव ११६
आप क्या बटोर लेंगे ? (आपके न जाने) मेरी समझ में यदि कहीं वह काम-
देव की कली कुँम्हला गई तो फिर क्या फूलेगी ? ( कदापि नहीं ) ।
अथ प्रथम-मिलनस्थान-वर्णन—( दोहा )
(१६३) जनी सहेली धाइ घर, सूने घर निसि चार ।
अति भय उत्सव व्याधि मिस न्यौते सु बन-बिहार ।२४।
शब्दार्थ—जनी = दासी । चार = चलना, घूमना । निसि०=रात में
भ्रमण । ब्याधि = रोग ।
( दोहा )
(१६४) इन ठौरनि ही होत है, प्रथम मिलन संसार ।
केसव राजा रंक को, रचि राखे करतार ।२५।
जनी के घर को मिलन, यथा—( कबित्त )
(१६५) बेषु कै कुमारिका को ब्रज की कुमारिकानि,
माँझ साँझ केसौदास त्रास पग पेलिकै ।
काम की लता सी चपला सी प्रेम पासी सी है,
राधिका के बुद्धिबल कंठ भुज मेलिकै ।
दौरि दौरि दुरि दुरि पूरि पूरि अभिलाष,
भाँति भाँति के अनूप-रूप बहु केलि कै ।
जनी के अजिर आज रजनो में सजनी री,
साँची करी स्याम चोरमिहचनी खेलिकै ।२६।
शब्दार्थ—त्रास पग पेलिकै = भय को पैरों से दबाकर, निर्भय होकर ।
चपला = बिजली । प्रेमपासी सी=प्रेम के फंदे की भाँति । मेलिकै = डाल
कर । दुरि दुरि=छिप छिपकर । बहु केलि कै = अनेक क्रीड़ा करके । जनी =
दासी । अजिर = आंगन । चोरमिहचनी खेलिकै = आँखमिचौली खेलकर ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी प्रति ) हे सखी, आज कृष्ण ने स्वयम्
कुमारी का वेश बनाया और संध्या-समय निर्भय होकर ब्रज कुमारियों में जा
मिले । उन्होंने बुद्धि के कौशल द्वारा काम की लता, बिजली एवम् प्रेमपाश
स्वरूप सुंदरी राधिका के गलबाँही डाल दी । आँखमिचौली खेल के बहाने
दौड़ दौड़कर छिप छिपकर और इस प्रकार अभिलाषों की पूति करते हुए
उन्होंने लाखों प्रकार की अद्वितीय कामक्रीड़ा की। (चोर बने हुए) श्रीकृष्णजी
ने, दासी के आंगन में आज रात्रि को ( इस रीति से ) आँखमिचौली के
२४—सूने घर-घरनि संचार । सु बन-बिपिन । २५-इन०-इनहीं
ठौरनि । राखे-राखो । २६—चपला सो०-चल प्रेमपास सी अमल । भाँति
भाँति०-लाख भाँति । करी-कीन्ही ।

१२० रसिकप्रिया
खेल को खेल ( आरोपित या असत् व्यापार ) नहीं रहने दिया, वास्तविक
कर दिया ।
अलंकार—द्वितीय पर्यायोक्ति, उपमा ।
सहेली के घर को मिलन, यथा—( कवित्त )
(१६६) नैनिन के तारनि में राखौ प्यारे पूतरी कै,
मुरली ज्यों लाइ राखौ दसन-बसन में ।
राखौ भुजबीच बनमाली बनमाला करि
चंदन ज्यों चतुर चढ़ाइ राखौ तन में ।
केसौराइ कलकंठ राखौ बलि कठुला कै,
करम करम क्योंहूँ आनी है भवन में ।
चंपक-कली ज्यों कान्ह सूँघि सूँघि देवता ज्यों,
लेहु मेरे लाल, इन्हें मेलि राखौ मन में ।२७।
शब्दार्थ—तारनि = तारों में । पूतरी = आँख की पुतली । ज्यों=तरह ।
लाइ = लाकर । लाइ राखौ = ला रखो, लगा रखो । दसन-बसन = दाँत का
वस्त्र, अधर, ओठ । बनमाली = श्रीकृष्ण । बनमाला = घुटनों तक या
पैरों तक लंबी माला । चतुर = हे चतुर । कलकंठ = सुंदर कंठवाली, मधुर
वाणी बोलनेवाली । कठुला = गले का हार । करम करम = क्रम क्रम से
धीरे धीरे सिखा-पढ़ाकर । आनी है भवन में = इन्हें घर तक ले आई हूँ ।
क्योंहूँ = किसी प्रकार । देवता = देवी । लाल = श्रीकृष्णलाल । मेलि राखौ =
धारण कर लो ।
अलंकार—उपमा ।
धाइ के घर का मिलन, यथा—( कवित्त )
(१६७) हँसत खेलत खेल मंद भई चंददुति,
कहत कहानी और बूझत पहेली-जाल ।
केसौदास नींदबस अपने अपने घर,
हरैं हरैं उठि गए बालिका सकल बाल ।
घोरि उठे गगन सघन घन चहूँ दिसि,
उठि चले कान्ह धाइ बोलि उठी तिहि काल ।
आधी रात्रि अधिक अँध्यारे माँझ जैहौ कहाँ,
राधिका की आधी सेज सोइ रहौ प्यारे लाल ।२८।
२७—केसौराइ-केसोदास । कलकंठ०--गल मेलि राखो कलकंठी कंठा कल
कठुला कै । बलि-करि, कुल । क्योंहूँ--केहूँ । सूँघि०-सोंधी सूंधी, सोंधी सूची ।
ज्यों-सी । २८-खेलत०-खेलत माँझ । घोर-अरु । बस-सिसु । घर--घरै,। गए--
गई । बालिका-ग्वालिका । अँध्यारे-अँधेरी । सोइ-पौढ़ि । प्यारे लाल-नंदलाल ।