सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 286 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 93

६४ रसिकप्रिया
समुझाइ कहौं समुझी सब केसव झूठी सबै हमसौ जु कही हैं ।
मान कियो अपमान करौ तौ हँसौ अब कै हँसिबे कौ रही हैं ।६२।
शब्दार्थ—हितु कै = प्रेमपूर्वक । अरु = (अड़) हठ । अब कै = इस
बार (एक बार) ।
भावार्थ—(नायक-नायिका का संवाद) (नायक) 'प्रेमपूर्वक इधर
देखो'। (नायिका) 'सब देख चुकी'। (नायक) 'अच्छा प्रेम की बातें ही
सुनो'। (नायिका) 'हाँ, मैंने सब सुन लिया'। (नायक) 'यह तो कुछ
और ही बात है'। (नायिका) (अगर मेरा हठ समझते हो तो) कसम
खाओ (खाकर बतलाओ) कि वहाँ (सपत्नी के यहाँ) 'तुमने क्या
क्या कर्म किए हैं'? (नायक) 'मैंने तो समझाकर कह दिया'।
(नायिका) मैंने समझ लिया कि आपने मुझसे सब झूठी बातें कही हैं ।
(नायक) (मैं समझ गया) 'तुमने मान किया है'। (नायिका) (ऐसा
कहकर तो आप मेरा) 'अपमान कर रहे हैं'। (नायक) (अगर ऐसी बात नहीं
है) 'तो इस बार हँसो तो'। (नायिका) 'मैं तो हँस चुकी (मै नहीं हँसूंगी)' ।
अथ प्रौढ़ा-अधीरा-लक्षण— (दोहा)
(१०६) पति को अति अपराध गनि, हतन कहैं हित मानि ।
कहत अधीरा प्रौढ़ तिहि, केसवदास बखानि ।६३।
यथा— (सवैया)
(११०) हौं सुख पाइ सिखाइ रही सिख सीखे न ए सखितैं हूँ सिखाई ।
मैं बहुतै दुख पाइहू देख्यौ पै केसव क्यौंहूँ कुटेव न जाई ।
दंड दियैं बिनु साधुनिहूँ सँग छूटति क्यों खल की खलताई ।
देखहु दै मधु की पुट कोटि मिटै न घटै बिष की बिषमाई ।६४।
शब्दार्थ—मधु=शहद । बिषमाई=भयंकरता, कटुता ।
भावार्थ—(नायिका नायक की उपस्थिति में सखी से कह रही है) मैं
सुखपूर्वक (बिना अपनी अपनी अप्रसन्नता व्यक्त किए) सिखाचुकी, पर इन्होंने
शिक्षा नहीं ग्रहण की (कहना नहीं माना), तूने भी तो सीख दी (क्या
परिणाम हुआ ! कुछ नहीं) । मैंने (इनकी टेव बदलने के लिए) बहुत कष्ट
उठाकर भी देख लिया, पर इनकी बुरी बान किसी प्रकार छूटती ही नहीं ।
साधुओं के संग में रहने पर भी खलों की दुष्टता बिना दंड दिए छूटती नहीं ।
विष में शहद का चाहे करोड़ों पुट दिया जाय पर विष की कटुता (शहद
की मिष्टता से) दूर नहीं हो सकती ।
६२—देखहु-देखो जू । सब हो-निबही । सब ही-सब है । अरु-अब ।
जु-जू । तही-तुही । कहो-कह्यो । समुझी ०-समुझाइ कै । सब-हम । कियौ-
किए । करौ तो-करै जो । ६३—हतन-हितन । कहै-करै । तिहि-तिय । ६४-
पाइ-खाइ । सखि-सिख । बहुत दुख पाइ-बहुतेहूँ सबाइ । दंड-देहु ।