सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 286 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 96

७ तृतीय प्रभाव ६७
(दोहा)
(११८) काहू सों न कहै कछू, बात अनूढ़ा गूढ़।
सखी सहेली सों कहै, ऊढ़ा गूढ़ अगूढ़।७२।
शब्दार्थ—सखी = अंतरंग सखी। सहेली = बहिरंग सखी। गूढ़ =
गुप्त। अगूढ़ = प्रकट।
सूचना—यह छंद पूर्ण हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
ऊढ़ा वचन, यथा—(सवैया)
(११६) केसवराइ की सौहैं कहै कछू एकनि आपु में होड़ परी।
एक चितै मुसकाइ इतै, उत बात कहैं बहु भाइ भरी।
चारु चकोर बिलोचन भा सो चहूँ दिसि तें अँगुरी पसरी।
सखि काल्हि गई हुती गोकुल हौं सबहीं मिलि द्वैज को चंद करी ७३
शब्दार्थ—सौहैं = शपथ, कसम। एकनि = कुछ लोगों में। आपु में =
आपस में। होड़ = लागडाँट, यहाँ वादविवाद। चहूँ दिसि तें अँगुरी पसरी =
चारो ओर से गोपिकाओं ने अंगुली दिखाकर संकेत किया।
भावार्थ—(ऊढ़ा का वचन बहिरंग सखी से) मैं आज गोकुल गई थी।
वहाँ मुझे देखकर कुछ स्त्रियाँ शपथ कर करके मेरे बारे में आपस में वाद-
विवाद करने लगीं (कोई कहती थी कि यही श्रीकृष्ण की प्रेमिका है और
कोई कहती थी नहीं)। कुछ स्त्रियाँ एक ओर तो मुझे देखकर मुसकाती थीं
और दूसरी ओर अपनी संगिनी स्त्रियों से अत्यंत भावभरी बातें करने लगती
थीं। चारो ओर से उनकी उँगलियाँ मुझे इंगित कर रही थीं। उन सबने
मिलकर तो मुझे द्वितीया का चंद्रमा ही बना डाला था। (जैसे द्वितीया के
चंद्रमा को देखकर दूसरों को दिखाने के लिए लोग उँगली से इंगित करते हैं
उसी प्रकार वे मुझ पर उँगली उठा रही थीं)।
सूचना—यह छंद भी पूर्ण हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
(दोहा)
(१२०) जगनायक की नायिका, बरनी केसवदास।
तिनके दरसन रस कहौं, सुनौ प्रछन्न प्रकास।७४।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइन्द्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां स्वकीया-
परकीयादिभेदवर्णनं नाम तृतीयः प्रभावः।३।
७३—केसवराइ-केसवदास। काल्हि-आजु। ७४—सुनौ-सुनहु, सुनि।
प्रछन्न-प्रच्छन्न।