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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 286 में से

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पृष्ठ 85

८६ रसिकप्रिया
सूचना—इसके अनंतर निम्नलिखित दोहा छपी प्रति में मिलता है। यह
खंडित प्रति में भी है, पर पूरी हस्तलिखित और लीथोवाली प्रतियों में नहीं है —
सोरहई सिंगार सब, सोरह सुरत समान।
बुधि बिबेक बल समुझियै, केसव सकल सुजान॥
अथ षोडश शृंगार-वर्णन—( कबित्त )
(८६) प्रथम सकल सुचिमंजन अमल बास,
जावक सुदेश केस-पास को सुधारिबो ।
अंगराग भूषन बिबिध मुखबास राग,
कज्जल-कलित लोल लोचन निहारिबो ।
बोलनि हँसनि मृदु चातुरी चितौनि चारु,
पलपल प्रति पतिब्रत प्रतिपारिबो ।
केसौदास सबिलास करहु कुँवरि राधे,
इहि बिधि सोरह सिगारनि सिंगारिबो ।४३।
शब्दार्थ—सुचि मंजन = पवित्रता से स्नान करना । अमल बास =
स्वच्छ वस्त्र पहनना । जावक = महावर । सुदेस = बढ़िया । केस-पास = केशों
का समूह सँवारना, केशों को भली भाँति बाँधना । अंगराग = शरीर की
शोभा के लिए लेप आदि का प्रयोग [ ये पाँच प्रकार के कहे गए हैं—सिंदूर,
खौर या मस्तक में तिलक, चिबुक में गोदना, मेंहदी और अरगजा या चंदन
का लेप ] भूषन बिबिध = अनेक प्रकार के गहने [ ये भी दो प्रकार के होते
हैं—मणि-सोने के और पुष्पों के ] । मुखबास राग=मुखबास और मुखराग ।
मुखराग दो प्रकार के होते हैं—दंतमंजन और एला-लवंगादि का चर्वण ।
मुखराग = अधरों में रंग लगाना या तांबूल से उन्हें लाल करना । कज्जल-
कलित = काजल से युक्त । लोल = चंचल । निहारिबो = देखना । पल पल
प्रति = प्रतिपल, प्रतिक्षण । प्रतिपारिबो = [ प्रतिपालन ] पालन करना ।
सूचना—हस्तलिखित ( पूरी ) प्रति में और लीथोवाली प्रति में यह
छंद नहीं है ।
अथ सुरतांत—( सवैया )
(६०) सुंदरता पय पावक जावक पीक हियें नखचंद नए हैं ।
चंदन चित्र सुधा, बिष अंजन, टूटि सबै मनिहार गए हैं ।
केसव नैननि नींदमई मदिरा मद घूमत मोहभए हैं ।
केलि कै नागर नागरी प्रात उजागर सागर-भेष भए हैं ।४४।
४३-मंजन-मज्जन । सुधारिबो-सम्हारिबो । निहारिबो-बिहारिबो । मृदु-
चितु । चातुरी-चलनि । प्रतिपारिबो-परिपरिबो । इहि-एही । ४४-नागर ०-
नागरि नागर ।