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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

( ३ )
शास्त्र के अनुशासन में कवि रहता है, आलोचक से सावधान रहता है और यही वह
सावधानी है, जो भवभूति जैसे महाकवि को निखारा और उच्च स्थान पर बैठाया ।
सुना जाता है कि आलोचकों ने भवभूति के महावीरचरित नाटक के विषय में बहुत
आक्षेप किया था । कवि सम्हल गये और उनका उत्तर दिया—
ये नाम केचिदिह नः प्रथयन्त्यवज्ञां
जानन्ति ते किमपि तान् प्रति नैष यत्नः ।
उत्पत्स्यते हि मम कोऽपि समानधर्मा
कालो महान् निरवधिर्विपुला च पृथ्वी १ ॥
फिर उनके उत्तररामचरित नाटक को देखकर तो आलोचकों को कहना ही
पड़ा—"उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते" । इसी प्रकार महाकवि दण्डी के विषय
में भी किंवदन्ती है कि उन्होंने दशकुमारचरित की पूर्वपीठिका जब लिखी तो आलोचकों
का तीखा प्रहार उन पर पड़ा । वे रुक गये, अपने को सम्हाला, परिश्रम करके आक्षेपों
का समाधान ढूँढ़ा और इसी छानबीन के क्रम में स्वयं एक अलङ्कारशास्त्रीय ग्रन्थ ही
रच डाले—काव्यादर्श, जो इस शास्त्र का एक मूर्धन्य ग्रन्थ हुआ । इसके बाद इन्होंने
दशकुमारचरित की उत्तरपीठिका लिखी, जिसकी सब ओर से प्रशंसा हुई । इसीलिए
उनकी पूर्वपीठिका और उत्तरपीठिका में इतना अन्तर है ।
ऐसे ऐसे महाकवि भी जिनकी कद्र करते हैं, ऊँचा स्थान देते हैं, उन
आलोचकों का महत्त्व इसी से आँका जा सकता है । इन आलोचकों को न केवल
पूर्ववर्ती सभी काव्यों की जानकारी रहती है, अपितु सभी आलोचकों के सिद्धान्तों की
भी जानकारी आवश्यक है। कवि से सूक्ष्म दृष्टि उनकी होती है। जिन भावों को
कवि ने सोचा तक न होगा, उनके ही शब्दों से उन भावों को निकाल कर गुण या
दोष दिखाने में वे पटु होते हैं। सूक्ष्मदर्शिता, निष्पक्षता, निर्भीकता, सारगर्भिता,
सामयिकता, सार्वदेशिकता आदि कतिपय गुण इनमें आवश्यक माने गये हैं। कवि की
आलोचना करने से पहले उन्हें स्वयं कवि बनना आवश्यक है। पक्षपातिता, भीरुता,
लोभ आदि कतिपय दुर्गुण जिस आलोचक में रहे, वह निन्दनीय माना जाता है ।
अतएव आलोचक को संयत रखने के लिए काव्यशास्त्र ( साहित्यविद्या ) परम
आवश्यक है, क्योंकि अनियन्त्रित प्रवाह से परम हानि निश्चित है ।
अनुबन्ध-निबन्धन—
प्रत्येक शास्त्र के आदि में ही उसके विषय, प्रयोजन, सम्बन्ध और अधिकारी
—इन चार अनुबन्धों का निरूपण आवश्यक होता है, क्योंकि इनके ज्ञान के बिना जिज्ञासु
१. मालतीमाधव-प्रस्तावना ।

( ४ )
इसके अध्ययन में प्रवृत्त ही नहीं हो सकते हैं, जबकि उन्हीं के उपयोग के लिए शास्त्र
का प्रणयन होता है । ग्रन्थ के अध्ययन में जिज्ञासु को प्रवृत्ति कराने वाले तत्त्व को ही
अनुबन्ध कहते हैं । किसी भी कार्य में लोग तभी प्रवृत्त होते हैं जब उन्हें उसमें 'इदं
मदिष्टसाधनम्'—'यह मेरा अभीष्ट साधन करने वाला है' इस प्रकार का ज्ञान हो जाय ।
इसे ही इष्टसाध्यताज्ञान कहते हैं । सुमेरु पर्वत लाने में उक्त ज्ञान के रहने पर भी
लोग प्रवृत्त नहीं होते हैं, क्योंकि उसमें कृतिसाध्यताज्ञान नहीं है, अर्थात् जब तक 'इदं
मत्कृतिसाध्यम्'—'यह मुझसे किया जाने योग्य कार्य है' इस प्रकार का ज्ञान भी प्रवृत्ति
के प्रति कारण है और विषमिश्रित स्वादिष्ट भोजन में उक्त दोनों ज्ञान के रहने पर भी
बलवत् अनिष्ट ऐसा ज्ञान होने पर वह इष्ट ही नहीं है । अतः प्रवृत्ति के प्रति मुख्य
दो ज्ञान ही कारण हैं—इष्टसाध्यता ज्ञान और कृतिसाध्यता ज्ञान । अब प्रस्तुत में
प्रयोजन से इष्टसाध्यता ज्ञान होता है और विषय, सम्बन्ध और अधिकारी से कृति-
साध्यता ज्ञान होता है । विषय हुआ प्रतिपादनीय वस्तु, प्रयोजन हुआ फल, अधिकारी
हुआ प्रवृत्त होने योग्य व्यक्ति और सम्बन्ध हुआ प्रतिपाद्य विषय के साथ प्रतिपादक
शास्त्र का संसर्ग ( विषय और ग्रन्थ में प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव सम्बन्ध ) ।
प्रस्तुत साहित्यशास्त्र का विषय है काव्य एवं उसके उपयोगी (गुण, अलंकार,
रीति, रस, भाव, ध्वनि आदि ) पदार्थ । इनका ज्ञान प्राप्त करना ही प्रयोजन है ।
इन विषयों के जिज्ञासु व्यक्ति अधिकारी हैं और इस विषय और शास्त्र में बोध्य-बोधक-
भाव सम्बन्ध है ।
उपर्युक्त आलोचकों, काव्यशास्त्रकारों की संस्कृतवाङ्मय में सुदीर्घ परम्परा
रही है । आचार्य भरतमुनि ( ई० पू० द्वितीय शताब्दी ) से लेकर आज तक इसकी
श्रृंखला बनी हुई है । बीच-बीच में अनेक वाद आये, सम्प्रदाय चले और अपना प्रभाव
छोड़ते गये, यह शास्त्र आगे बढ़ता गया, विषय की सूक्ष्मता आती गयी । सोलहवीं
शताब्दी से प्रत्येक शास्त्र में प्राचीन-नव्य का भेद होने लगा, भाषा परिष्कृत शैली को
पकड़ने लगी । इस शास्त्र में यह बात कुछ बाद में आयी, जिसे लिये हुए सत्रहवीं
शताब्दी में अवतीर्ण हुए पण्डितराज जगन्नाथ अपने प्रौढ़-परिष्कृत ग्रन्थ रसगङ्गाधर
के साथ ।
रसगङ्गाधर
यह साहित्यशास्त्र का मूर्धन्य ग्रन्थ है । रसस्वरूप गङ्गा को धारण करने
वाला—'रसञ्चासौ गङ्गा रसगङ्गा, तस्याः धरः (धारकः), धरतीति धर इति' इस
व्युत्पत्ति के अनुसार यह रसप्रतिपादक के रूप में साक्षात् शिव ( गङ्गाधर ) ही है ।
तदनुसार इसका विषय रस है, जो साहित्यशास्त्र में सर्वप्रधान होने से अपने शास्त्रमात्र
का संग्राहक हो जाता है, इस शास्त्र के सभी तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करता है—

( ५ )
'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति'—प्रधान के अनुसार ही व्यवस्था होती है, इस न्याय के
अनुसार साहित्यशास्त्र का नाम रसशास्त्र १ होता है और इसे ही पण्डितराज जगन्नाथ
ने इस ग्रन्थ का रसगङ्गाधर नाम रखकर सूचित किया है। परन्तु वे परम्परानुसार
प्रचलित नाम "अलङ्कारशास्त्र" कहना२ ही उचित समझते हैं और यह नाम भी
प्राधान्य न्याय३ से ही सङ्गत होता है, क्योंकि इस शास्त्र का आधा से अधिक भाग
अलंकार-विवेचन में ही रहता है। परन्तु आधुनिक युग में 'साहित्य' शब्द अधिक
प्रचलित है, जो ४राजशेखर, श्रीहर्ष, कविकर्णपूर आदि के द्वारा समर्थित है। साहित्य
के प्रसंग में म० म० गङ्गाधर शास्त्री का एक पद्य यहाँ उद्धरणीय है—
नाचान्तं यच्चिरत्नैरपरिचितचरं यच्च वाचालचेलै-
रौचित्यं यन्न मुञ्चेदपि च विरचयेद् यच्चमत्कारिचेतः।
तादृक्प्रौढिप्रकर्षप्रणयभणिति या सूयते काव्यरत्नं
पुण्यैः कस्याप्यगण्यैः परिणमति मुखे सा हि साहित्यरीतिः'५ ॥
इस विवेचन से स्पष्ट हुआ कि साहित्य के सभी तत्त्व रसगङ्गाधर के विवेचनीय
विषय हुए और वे सभी विषय यहाँ सूक्ष्मरूप से विस्तृत विवेचित हुए हैं। पर खेद का
विषय है कि यह ग्रन्थरत्न पूर्णरूप में उपलब्ध नहीं है। अन्तभाग में कुछ खण्डित है,
जिसमें कुछ अलंकारों का विवेचन था । मध्य में भी कुछ प्रकरण त्रुटित जान पड़ते
हैं; यथा—अभिधा और लक्षणा के बाद व्यञ्जनानिरूपण नहीं है, रीतिविवेचन और
दोषनिरूपण नहीं है। यह बात भी ध्यातव्य है कि ग्रन्थ के अध्याय, जिसे आनन कहा
गया है, उसका विभाजन भी उपयुक्त नहीं जान पड़ता है। अतः स्पष्ट है कि प्रति-

१. "रसविद्याविदः केचिद् ग्राम्यामाहुस्तु कोमलाम्" । (अलङ्कारसमुद्गः—
इन्द्रपतिः पृ० ६ )
२. "अलङ्कारान् सर्वानपि गलितगर्वान् रचयतु" । (रसगङ्गाधर-आरम्भिक पद्य)
३. ग्राम में सभी जातियों के रहने पर भी मल्लग्राम, ब्राह्मणग्राम आदि नाम
उनकी प्रधानता से ही है ।
४. काव्यमीमांसा—"शब्दार्थयोर्यथावत् सहभावेन विद्या साहित्यविद्या ।
नैषधीयचरित के अन्त में—"साहित्ये सुकुमारवस्तुनि" ।
साहित्यपाथोनिधिमन्थनोत्थं कर्णामृतं रक्षत हे कवीन्द्राः ।
यत्तस्य दैत्या इव लुण्ठनाय काव्यार्थचौराः प्रगुणीभवन्ति ॥ (कर्णपूरः) ।
विश्वनाथ के ग्रन्थ का नाम साहित्यदर्पण भी साहित्यशास्त्र कहने के पक्ष
में है।
५. विभ्रममनीषा—२-२, दरभंगा में प्रकाशित ।

( ६ )
लिपिकारों के द्वारा इस ग्रन्थ के पत्रों में हेराफेरी हुई है । गङ्गाधर ( शिव ) पञ्चानन
कहे गये हैं । तदनुसार इस रसगङ्गाधर के भी पाँच आनन होने चाहिए । यहाँ द्वितीय
आनन के बाद बहुत दूर तक विषय एवं प्रकरण बदलने पर भी आनन-विभाजन नहीं
हुआ है, जो मध्य में ग्रन्थ के कुछ अंश के अप्रास होने की सूचना देते हैं । प्रथम आनन
में काव्य, उसके भेद एवं असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनि ( अभिधामूलध्वनि के प्रथम भेद,
रसध्वनि ) का साङ्गोपाङ्ग विवेचन ( रस, गुण, भावध्वनि, रसाभासादि सहित )
हुआ है । इस आधार पर द्वितीय आनन में संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ( अभिधामूलध्वनि के
द्वितीय भेद, जिसमें वस्तुध्वनि और अलङ्कारध्वनि अन्तर्भूत है ) का, तृतीय आनन में
लक्षणामूलध्वनि का, चतुर्थ आनन में व्यञ्जना का और पञ्चम आनन में अलङ्कारों के
विवेचन की कल्पना की जा सकती है । काव्यदोष का। निरूपण यद्यपि आवश्यक है,
क्योंकि दोष-परित्याग तभी सम्भव है जब उसका परिचय हो, तथापि पण्डितराज ने
अपनी विवशतावश उसका निरूपण नहीं किया होगा । विवशता यह थी कि ग्रन्थारम्भ
में ही इनकी प्रतिज्ञा है कि हम स्वरचित उदाहरण ही देंगे, दूसरे का नहीं और दुष्ट-
काव्य का निर्माण पण्डितराज की लेखनी से हो हो नहीं सकता। इसलिए दोषनिरूपण
इस ग्रन्थ में नहीं रहा होगा । परन्तु अभी जो ग्रन्थ उपलब्ध है, जिस रूप में प्राप्त है,
उसी से सन्तोष करना होगा, उसी पर विचार करना उचित होगा ।
नव्यपरिष्कृत आलोचनात्मक शैली में विषय की सूक्ष्मता से परिचय कराना
पण्डितराज की अद्भुत प्रतिभा का परिचायक है । इस ग्रन्थ के द्वारा इन्होंने साहित्य-
शास्त्र को वह गरिमा प्रदान की जो दर्शनादि शास्त्रों को प्राप्त है । शास्त्रान्तर के
पण्डित, जो इसं विद्या को अन्यथासिद्ध मानकर मखौल उड़ाते थे, इस ग्रन्थ के सूक्ष्म
विवेचन के चक्कर में पड़कर इस शास्त्र के गहन अध्ययन करने को विवश हुए । यही है
इस शास्त्र को पण्डितराज की देन, रसगङ्गाधर का महत्त्व ।
इसमें प्राचीन आचार्यों के मतों की विशद समीक्षा की गयी है और विषय-
विवेचन अतिविस्तृतरूप में यथेच्छ हुआ है । प्राचीन ग्रन्थ पद्यबद्ध या कारिका
के साथ वृत्तियुक्त रहते थे, परन्तु यह ग्रन्थ केवल गद्य में, प्रांजल, परिष्कृत, अवच्छेद-
कतायुक्त गद्य में है । अतः यहाँ विषय को सूक्ष्मरूप में विस्तृत विवेचन का अवसर
प्राप्त हुआ । साहित्यशास्त्रीय विकास के चरम उत्कर्ष के समय इस ग्रन्थ की रचना
हुई, अतः उन सभी विषयों का सम्यक् प्रतिपादन-समीक्षण इसमें हो सका, जिनका
पूर्ववर्त्ती ग्रन्थों में होना सम्भव न था । इन्होंने उदाहरण के रूप में यहाँ स्वरचित
पद्यों का ही उपस्थापन किया है, जिससे यह ग्रन्थ सुरभित हो गया और पण्डितराज
का कवित्वरूप भी उदात्त रूप में प्रकटित हो गया है। ये केवल आलोचक ही नहीं,
वरन् उच्चकोटि के कवि भी थे । इसलिए रसगङ्गाधर का स्थान साहित्यशास्त्र में

( ७ )
सर्वोपरि माना जाता है । यह ग्रन्थ प्रत्येक विषय पर अपनी नवीन मान्यता, नया
मतस्थापन देता चलता है—काव्यलक्षण से लेकर अलंकारनिरूपण तक आद्यन्त यही
क्रम है और इनकी यह मान्यता आज भी आलोचकों के लिए महत्त्वपूर्ण बनी हुई है ।
विषय-विवेचन—
( १ ) काव्य-प्रयोजन—काव्य में प्रवृत्त होने के लिए उसके प्रयोजनों को
जान लेना आवश्यक है । सर्वप्रथम इसमें प्रवृत्त होने वाला कवि होता है, जो इसकी
रचना करता है । उसके बाद सहृदय उसे सुनते या पढ़ते हैं । इन दोनों को इसका
प्रयोजन ज्ञात रहना आवश्यक है । इसीलिए रसगङ्गाधर में कहा गया है—"कवि-
सहृदययोरावश्यकतया"१। कवि के आशय को सभी नहीं समझ सकते हैं, उसे केवल
सहृदय ही समझते हैं । 'कवेः समानं हृदयं येषां ते सहृदयाः'—कवि के समान हृदयवाला
सहृदय२ होता है, जो उसके हृदय की बात को समझ जाता है । कविपरम्परागत
अनेक बातें ऐसी हैं जो प्रसिद्ध होने के कारण कही नहीं जाती हैं, संकेत से ही समझी
जा सकती हैं, पर उस प्रसिद्धि से परिचित ही उसे समझ सकता है, सहृदय कहला
सकता है । अतः काव्य पढ़ने से पहले सहृदय बनना, कवि के अन्तर में छिपे भावों
को पकड़ने की कला का ज्ञान रखना आवश्यक है । इन दोनों के लिए यहाँ पाँच
प्रयोजन कहे गये हैं और इत्यादि कहकर प्राचीनोक्त अन्य प्रयोजनों में भी अपनी सम्मति
दिखायी गयी है । उक्त पाँचों नाम हैं—( १ ) कीर्त्ति—यशःप्राप्ति, जो केवल कवि
के लिए है, ( २ ) परमाह्लाद—परमानन्द की प्राप्ति ( कवि और सहृदय दोनों के
लिए ), ( ३ ) गुरुप्रसाद—गुरु की प्रसन्नता से विद्या-व्यवहार का ज्ञान ( दोनों के
लिए ), ( ४ ) राजप्रसाद—इससे दोनों को धनागम, ( ५ ) देवताप्रसाद—इससे
दोनों का अमङ्गल-निवारण होता है ।
मम्मट ने काव्य के ६ प्रयोजन दिखाये हैं—
३काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये ।
सद्यःपरनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ॥
तदनुसार—( १ ) यशःप्राप्ति, ( २ ) अर्थप्राप्ति, ( ३ ) लोकव्यवहारज्ञान,
( ४ ) अमङ्गलनाश, ( ५ ) सद्यः परमानन्द की प्राप्ति, ( ६ ) कान्तासम्मित वाक्य
से उपदेशप्राप्ति । इनमें तृतीय और षष्ठ का समावेश पण्डितराज के इत्यादि पद से कर
लेना चाहिए ।
१. रसगङ्गाधर, पृ० ७ ।
२. अथवा—'प्रशस्तं हृदयं येषां ते सहृदयाः, प्राशस्त्यञ्च काव्यवासनापरि-
पक्वत्वम्, कविहृदयप्रवेशसामर्थ्यवत्त्वं वा' ।
३. काव्यप्रकाश के आरम्भ में ।

( ८ )
इसके अतिरिक्त चतुर्वर्ग की प्राप्ति और कलाओं में नैपुण्य—ये प्रयोजन १
विश्वनाथोक्त हैं । इनमें भी धर्म से अमङ्गलनाश, अर्थ से धनप्राप्ति, काम और मोक्ष
से परमानन्द की प्राप्ति को मान लेने पर कलानैपुण्य एक अतिरिक्त प्रयोजन होता है ।
इन प्रयोजनों के सम्पादक काव्य का ही लक्षण अभिप्रेत है । शायद इसीलिए काव्य-
लक्षण से पहले उसका प्रयोजन प्रतिपादित होता है ।
उपर्युक्त प्रयोजनों में केवल परमानन्द ( रसास्वादमूलक ) ही काव्य के प्रयोजन
हैं, शेष प्ररोचक २ उपायमात्र हैं ।
( २ ) काव्य-लक्षण—कवि की रचना काव्य कहलाती है । उसका प्रथम कार्य
चिन्तन सुललित भावों की अवधारणा अर्थरूप ही है, पर उसे व्यक्त करने हेतु उसका
द्वितीय कार्य पदावली-गुम्फन शब्दरूप ही होता है । तदनुसार सुललित भावों को व्यक्त
करने वाली पदावली काव्य है, यही वस्तुस्थिति है । इसे ही आलङ्कारिकों ने अपने-अपने
ढंग से काव्यलक्षण के रूप में व्यक्त किया है । इस विषय में आचार्य दण्डी ने
अग्निपुराण के अनुसार अपना लक्षण दिया—
"शरीरं तावदिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली" ३ ।
तदनुसार अभीष्ट = सहृदयहृदयाह्लादक अर्थ से व्यवच्छिन्न = विलक्षणीकृत
पदसमुदाय को काव्य कहते हैं ।
इनसे भी प्राचीन आचार्य भामह ( ५०० ई० ) ने कहा—"शब्दार्थौ सहितौ
काव्यम्" ४—चमत्कारजनक शब्द और अर्थ को काव्य कहते हैं । उसी समय से यह
विवाद शुरू हुआ कि शब्द ही काव्य है या शब्द और अर्थ काव्य हैं ! सम्पूर्ण उत्तर-
भारत के विद्वान् भामह के अनुयायी हो गये और शब्दार्थों का आज तक समर्थन कर
रहे हैं । इसी तरह दक्षिण भारतीय दण्डी के अनुसरण पर केवल शब्द को काव्य
कहने में अड़े हुए हैं । रुद्रट, वामन, आनन्दवर्धन, मम्मट, भोजराज, वाग्भट आदि
आचार्य शब्दार्थयुगल को काव्य मानने के पक्ष में हैं, जबकि विश्वनाथ और जगन्नाथ
शब्द को ही काव्य कहते हैं-। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि जो भी केवल शब्द
को काव्य कहते हैं, उनके भी मत में अर्थ उसका विशेषण रहता ही है । तब विवाद
रहा दोनों को प्रधान मानने या अर्थ को विशेषण मानने का ही और यह विवाद
अभी भी जारी है ।
१. सरस्वतीकण्ठाभरण से साहित्यदर्पण में उद्धृत ।
२. रसगङ्गाधर की प्रस्तावना—पं० मदनमोहन झा सम्पादित संस्करण ।
३. काव्यादर्श ।
४. काव्यालङ्कार ।

( ९ )
वामन, भोजराज, मम्मट, जयदेव आदि आचार्य काव्यलक्षण में दोषत्याग
और गुणग्रहण निविष्ट करते हैं। कतिपय आचार्य तो काव्यशास्त्रीय रीति, रस,
अलङ्कार तत्त्व भी जोड़ देते हैं । इनका लक्षण इनके द्वारा उक्त प्रयोजनों के साधक
होने के कारण ही इतने बड़े हो चले हैं । विश्वनाथ ने तो इन विस्तृत लक्षणों को
अतिसंक्षिप्त कर दिया और रसात्मक वाक्य को ही काव्य कहा है । परन्तु नीरस
पर्वतादि-वर्णन में उन्हें प्रबन्धगत रस का आश्रयण करना पड़ा है और ऐसे मुक्तक
वर्णन को वे काव्य हो नहीं मानते । परन्तु चमत्कार अनुभूत रहने पर काव्य न मानना
समुचित नहीं है ।
इसके बाद पण्डितराज ने सभी लक्षणों की बारीकी से छानबीन की और
अपना लक्षण दिया—
“रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम् ।”
अपने इस लक्षण का इन्होंने सूक्ष्म परिष्कार भी प्रस्तुत किया है, जो इसी ग्रन्थ
में रहने के कारण यहाँ नहीं दिया जा रहा है । इस परिष्कार में विरोधियों के सभी
आक्षेपों का समाधान हो जाता है ।
विचार कर देखने से ज्ञात होता है कि पण्डितराज ने सर्वप्राचीन लक्षण को
ही मान लिया है, शब्दान्तर से प्रस्तुत किया है, जिसे अग्निपुराणकार व्यास एवं दण्डी
ने कहा था । फर्क इतना ही है कि पदावली के स्थान में शब्द कहा गया है । इष्ट शब्द
से रमणीय ही अभिप्रेत हो सकता है । इस प्रकार हम देखते हैं कि काव्यलक्षण अपने
अनेक रूपों को धारण करते हुए सहस्राधिक वर्षों के बाद फिर जहाँ से प्रारम्भ हुआ
था वहीं पहुँच गया ।
( ३ ) काव्य-कारण—बिना कारण से कार्य नहीं हो सकता है और कारण
का समुचित रूप से रहने पर कार्य अवश्य होता है । काव्यरचना एक कार्य है ।
उसका भी कारण होना चाहिए, जिसे जान लेने पर काव्यकर्ता, प्रेरक, इच्छुक आदि
उस कारण के प्रति यत्नवान् होंगे और काव्यप्राप्ति करने में सफलता पायेंगे । अतः
काव्यशास्त्र के ग्रन्थों में काव्यकारण पर विचार किया जाता है । इस विषय में इन
शास्त्रकारों के दो दल हैं । दण्डी¹ आदि ने प्रतिभा, शास्त्रानुशीलन और अभ्यास इन
तीनों को मिलित रूप से काव्य का कारण माना है, जबकि रुद्रट आदि ने केवल
प्रतिभा को ।
१. नैसर्गिकी च प्रतिभा, श्रुतं च बहुनिर्मलम् ।
अमन्दश्चाभियोगोऽस्याः, कारणं काव्यसम्पदः ॥ ( काव्यादर्श )

( १० )
आचार्य भामह¹ के मत से प्रतिभा, शब्दार्थज्ञान, काव्यज्ञों की शिक्षा और अनेक
निबन्धों के अनुशीलन से प्राप्त व्युत्पत्ति काव्य के कारण हैं। वामन के अनुसार लोक-
व्यवहार और शास्त्रों में निपुणता, नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा ( प्रतिभा ) अथवा
जन्मान्तरीय संस्कारात्मक शक्ति-विशेष और काव्यज्ञों के निदेश पर काव्यरचना में
पुनः-पुनः प्रवृत्ति ( अभ्यास ) ये सभी काव्य के कारण हैं। रुद्रट² के अनुसार शक्ति,
व्युत्पत्ति और अभ्यास कारण हैं। मम्मट का भी यही मत है³। जयदेव⁴ केवल प्रतिभा
को कारण मानते हैं और प्रतिभा के सहकारी कारण शास्त्रानुशीलन और अभ्यास को
कहते हैं।
पण्डितराज के मत में केवल प्रतिभा से ही काव्य की सृष्टि होती है और
प्रतिभा का कारण कहीं अदृष्ट ( पूर्वजन्मार्जित ) और कहीं व्युत्पत्ति और अभ्यास है।
बालकवि कर्णपूर बचपन में ही बिना व्युत्पत्ति और अभ्यास के सुन्दर काव्य लिखने
लगे। ऐसे बालकवियों में विरुदावलीकार रघुदेव मिश्र, पुरंजनचरितनाटककार कृष्णदत्त
उपाध्याय आदि प्रसिद्ध हुए। इनके काव्यनिर्माण को देखते हुए स्पष्ट है कि प्रतिभा
का एक स्वतन्त्र कारण धर्मस्वरूप अदृष्ट मानना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में बिना
व्युत्पत्ति और अभ्यास के भी अदृष्ट से एवं बिना अदृष्ट के भी व्युत्पत्ति और अभ्यास
से प्रतिभा की उत्पत्ति से 'कारण⁵ के अभाव में भी कार्य की सत्ता' रूप व्यतिरेक-
व्यभिचार प्राप्त हो जायेगा, जिसके निवारण के लिए "अदृष्ट से उत्पन्न प्रतिभा के प्रति
अदृष्टमात्र कारण" एवं "व्युत्पत्ति और अभ्यास से उत्पन्न प्रतिभा के प्रति व्युत्पत्ति और
अभ्यास कारण" इस तरह अलग-अलग कार्यकारणभाव माना गया है। अब कारण के
भेद से दो प्रतिभाएँ हो जायेगी और कहीं पर अदृष्टजन्य प्रतिभा के अभाव में भी
व्युत्पत्ति और अभ्यासजन्य प्रतिभा से काव्य होने से पूर्ववत् ⁶ व्यभिचार प्राप्त ही रहेगा,
१. काव्यं तु जायते जातु, कस्यचित् प्रतिभावतः ।
शब्दाभिधेये विज्ञाय, कृत्वा तद्विदुपासनम् ॥
विलोक्या न्यनिबन्धांश्च, कार्यः काव्यक्रियादरः ॥ ( काव्यालङ्कार )
२. त्रितयमिदं व्याप्रियते शक्तिर्व्युत्पत्तिरभ्यासः । ( रुद्रट-काव्यालङ्कार )
३. शक्तिर्निपुणता लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात् ।
काव्यज्ञशिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे ॥ ( काव्यप्रकाश )
४. "प्रतिभैव श्रुताभ्याससहिता कवितां प्रति हेतुः" । ( चन्द्रालोक )
५. जब प्रतिभा के दोनों कारण हैं तो इनमें से एक के भी न रहने पर कारण-
भाव हो जायेगा ।
६. उपरिवत् ।

( ११ )
जिसके निवारण के लिए 'अदृष्टजन्य प्रतिभा से उत्पन्न काव्य के प्रति अदृष्टजन्य
प्रतिभा कारण' और व्युत्पत्त्यभ्यासजन्य प्रतिभा से उत्पन्न काव्य के प्रति व्युत्पत्त्यभ्यास-
जन्य प्रतिभा कारण' ऐसा पृथक् कार्यकारणभाव मानना चाहिए ।
राजशेखर का मत है¹ कि समाधि ( मानसिक एकाग्रता ) और अभ्यास (बाह्य
प्रयास ) ये दोनों ही मिलकर शक्ति को प्रकट करते हैं और यही शक्ति काव्य का
कारण है, जो दो प्रकार की होती है—कारयित्री और भावयित्री ।
यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि साहित्यशास्त्र में शक्ति और प्रतिभा
एक ही वस्तु है, जब कि न्यायदर्शन में शक्ति ज्ञानजन्य संस्कार² को और प्रतिभा नव-
नवोन्मेषशालिनी बुद्धि-विशेष को ( जो संस्कार का जनक है ) कहते हैं। वेदान्त में
भी ज्ञान को आत्मा, बुद्धि को अन्तःकरण एवं संस्कार को ज्ञानजन्य माना जाता है।
यहाँ तो "या शब्दग्राममर्थसार्थमलङ्कारतन्त्र-मुक्तिमार्गमन्यदपि तथाविधहृदयं प्रतिभा-
सयति सा प्रतिभा" ऐसा कहते हुए राजशेखर ने प्रतिभा को व्यक्त किया है और
इसे ही भामह, दण्डी, वामन, अभिनवगुप्त, जयदेव और जगन्नाथ प्रतिभा कहते हैं,
जब कि इसी प्रतिभा को रुद्रट, आनन्दवर्धन और मम्मट शक्ति कहते हैं । अतएव
दोनों एक ही तत्त्व हैं, क्योंकि अभिनवगुप्त ने "अव्युत्पत्तिकृतो दोषः शक्त्या संव्रियते
कवेः" इस ध्वनिकार की पंक्ति की व्याख्या में शक्ति को प्रतिभा कहा है ।
इस सम्बन्ध में किसी समन्वयवादी आचार्य का मत उपयुक्त जान पड़ता है
कि काव्य की उत्पत्ति में प्रतिभा, वृद्धि में अभ्यास और सौन्दर्य में व्युत्पत्ति कारण है—
'काव्यं तु जायते शक्तेर्वर्धतेऽभ्यासयोगतः ।
तस्य चारुत्वनिष्पत्तौ व्युत्पत्तिस्तु गरीयसी' ॥
यह मत पण्डितराज के अनुकूल है और उन बालकवियों की काव्योत्पादिका
शक्ति का भी समाधान इससे हो जाता है ।
( ४ ) रसस्वरूप—'रस्यते = आस्वाद्यते इति रसः' इस व्युत्पत्ति के
अनुसार सहृदय सामाजिक जिसे काव्य या नाट्य के द्वारा आस्वादित करे, जिससे
अनिर्वचनीय आनन्द को प्राप्त करे, उसे रस कहते हैं । इस आस्वादन के साधन को
अलङ्कारशास्त्र में विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभाव ( सञ्चारीभाव ) कहते हैं ।
इन तीनों के मेल से प्रकटित स्थायीभाव रस कहलाते हैं । रसरूपताप्राप्ति से पूर्व तक
ये सभी भाव ही कहलाते हैं, तो चित्तवृत्ति ( चित्त में रहने वाले धर्म ) ही होते हैं ।
१. काव्यमीमांसा ।
२. साहित्यिक के अनुसार ही शक्ति को संस्कारस्वरूप मानकर । "शक्तिः,
कवित्वबीजभूतः संस्कारविशेषः" ।

( १२ )
ये स्थायीभाव नौ हैं—रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, घृणा, विस्मय और
निर्वेद । इनके कारण को विभाव कहते हैं, जिसके दो भेद हैं—आलम्बन और
उद्दीपन । यथा—शृङ्गार रस में शकुन्तलादि आलम्बन और एकान्तस्थानादि उद्दीपन
हैं । यद्यपि विभाव स्थायिभाव के उत्पादक नहीं होते हैं, वे ( स्थायी ) तो सहृदयहृदय
में वासनारूप से सूक्ष्म आकार में पहले ही से रहते हैं । विभाव तो उनका विकास
मात्र करता है, तथापि लौकिक विभाव के उत्पादक रहने के कारण अलौकिक
( शास्त्रनिष्ठ ) विभाव को भी वैसा कहना अनुचित न होगा, क्योंकि अविकसित
वस्तु प्रतितियोग्य न रहने के कारण अनुत्पन्न कोटि में ही रहती है ।
सच तो यह है कि लौकिक रत्यादि स्थायीभावों का शकुन्तलादि विभाव
उत्पादक होते हैं, पर काव्यारूढ़ होने पर वे ही अलौकिक विभाव बनकर रसास्वाद के
अवसर पर रस से एकीभाव को प्राप्त करते हैं । यह भी ज्ञातव्य है कि स्थायीभाव
और रस में तादात्म्य रहने के कारण स्थायीभाव के आलम्बन और उद्दीपन ही रम के
भी आलम्बन एवं उद्दीपन होते हैं ।
स्थायीभाव के कार्य को अनुभाव कहते हैं, जो आलम्बन पर आश्रित बाह्य रूप
से प्रकटित होता रहे । जैसे अग्नि धूम को प्रकाशित करता है । यह काव्य में निबद्ध
रहने के कारण अलौकिक होता है । सात्त्विक भाव भी अनुभाव के ही अन्तर्गत आते
हैं । जो विभाव से भी विलक्षणरूप से जल में बुद्बुद के समान प्रकाशित हो तथा कभी
स्थायीभाव में ही विलीन हो जाय—ऐसे रसोपकारक क्षणिक भाव को व्यभिचारीभाव
कहते हैं । निर्वेदादि ३३ व्यभिचारीभाव कहे गये हैं । स्थायीभाव भी अपरिपुष्ट रहने
पर रसान्तर के उपकारक होकर व्यभिचारीभाव कहलाते हैं । सभी भावों में स्थायी-
भाव प्रधान होता है । उक्त नौ स्थायीभाव शृङ्गारादि नौ रसों में परिणत होते हैं ।
रसानुभूति के विषय में सर्वप्राचीन उल्लेख भरतनाट्यशास्त्र का रससूत्र है—
“विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः”—उपर्युक्त दोनों विभाव, अनुभाव
और व्यभिचारिभाव के संयोग से रस की प्रतीति होती है । इस सूत्र की व्याख्या चार
प्रकार की उपलब्ध होती हैं, जो रसस्वरूप के चार सिद्धान्त बने हुए हैं—लोल्लट का
उत्पत्तिवाद, शङ्कुक का अनुमितिवाद, भट्टनायक का भुक्तिवाद और अभिनवगुप्त का
अभिव्यक्तिवाद । इसके अतिरिक्त रस के विषय में पण्डितराज जगन्नाथ ने सात मतों
को प्रस्तुत किया है—( १ ) नव्यमत ( अनिर्वचनीयतावाद ), ( २ ) भावना के
माहात्म्य से मानस बोध ( भ्रमवाद ), ( ३ ) भाव्यमान विभाव ही रस है, ( ४ ) वैसा
अनुभाव, ( ५ ) वैसा व्यभिचारीभाव, ( ६ ) वैसे विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी-
भाव मिलितरूप में और ( ७ ) इनमें से जिस पर चमत्कार रहे वही ।

( १३ )
इनमें जिस लक्षण में विभावादि तीनों नहीं ( केवल एक ही ) हैं, वह भरत के
रससूत्र से विरुद्ध होने से परम्परा-विरुद्ध है । वे हैं केवल विभाव, केवल अनुभाव और
केवल व्यभिचारिभाव को रस मानने वाले लक्षण । परन्तु इनमें भी अन्य का आक्षेप-
लभ्य रहना तो निश्चित ही है । अतः आक्षेपलभ्य के द्वारा ही रससूत्र का संगमन
कर लेते हैं ।
आचार्य मदनमोहन झा ने विकासवादी क्रम से इन वादों को कालक्रम
( प्राचीनतानुसार ) इस प्रकार वर्णित किया है—( १ ) विभाव ही रस है, ( २ )
अनुभाव, ( ३ ) व्यभिचारिभाव, ( ४ ) तीनों के रहने पर जिसमें चमत्कार हो वही
रस है, ( ५ ) तीनों ही रस हैं, ( ६ ) रससूत्र के अनुसार उत्पत्तिवाद, ( ७ )
अनुमितिवाद, ( ८ ) भुक्तिवाद, ( ९ ) अभिव्यक्तिवाद, ( १० ) नव्यमत ( अनिर्वच-
नीयता ) और ( ११ ) भ्रमवाद ।
परन्तु यह मत उपयुक्त तब होता, यदि किसी प्राचीन ग्रन्थ में इनका उल्लेख
होता । भरत से पहले पाँच मत थे, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । इसका उल्लेख सर्वप्रथम
जगन्नाथ ने ही किया है । अतः ये मत या तो उनके स्वयं उद्भावित हैं या उनके समय
में चल पड़े थे ।
पण्डितराज ने जो इन मतों का क्रम रखा है, उसमें सर्वप्रथम अपना मत, जो
मान्य आचार्य अभिनवगुप्त का है, को रखा है; उसके बाद अन्य मतों का प्रतिपादन भर
उन्हें अभिप्रेत है, खण्डन नहीं, क्योंकि सिद्धान्त से पृथक् अन्य मत स्वतः उपेक्षणीय हो
जाते हैं । जो कोई “नव्यास्तु”¹ से कथित मत को इनका अपना मत कहते हैं, उन्हें
समझना चाहिए कि सिद्धान्त आदि या अन्त में ही रखा जाता है । आदि में सिद्धान्त
देकर उस पर आचार्य अभिनवगुप्त की सम्मति दिखाने से ही उसे निर्णय की पदवी
मिल जाती है ।
यह भी ज्ञातव्य है कि रसनिरूपण के प्रथम पक्ष में ही पण्डितराज ने जो
“भावना-विशेषमहिम्ना” विशेषण दिया है, वह किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में न होने

१. शकुन्तलाविषयिणी रति का सम्बन्ध सहृदय से न रहने के कारण उन्हें
आस्वाद कैसे हो, इस हेतु 'साधारणीकरण' व्यापार मानकर सहृदय के
हृदय में उस रति को प्रविष्ट कराते हैं । पण्डितराज का कथन है कि ये
सब काव्यार्थभावना की ही महिमा से होते हैं, तो फिर हम केवल उसी
'भावना' से शकुन्तलारति को साक्षात् ही सामाजिक में आरोपित कर
क्यों न काम चला लें ? इस हेतु साधारणीकरण व्यापार क्यों मानें ? यही
इनके मत का बीज है ।
२ भू०

( १४ )
से इनके मस्तिष्क की उपज है और यह विशेषण इनके द्वारा प्रथमतः प्रतिपादित अन्य
सातों मतों में भी निविष्ट है। इस नवीन उद्भावना को इन्होंने अपने काव्यलक्षण के
परिष्कार में भी दिया है—"कारणं च तदवच्छिन्ने भावनाविशेषः पुनः पुनरनु-
सन्धानात्मा", "चमत्कारजनकभावनाविषयार्थप्रतिपादकशब्दत्वम्"। इस तरह रस-
स्वरूपनिरूपण में "भावनाविशेष" पण्डितराज की अपनी चीज है, जैसा कि इसकी
व्याख्या करते हुए महावैयाकरण दीनबन्धु झा ने लिखा है१—"भावनाविशेषमहिम्ना =
ज्ञानविशेष-सामर्थ्येन, एतेन साधारणीकरणाय व्यापारान्तरकरणमनावश्यकमिति सूचितं
भवति । इदमेव ग्रन्थकृन्मते रसस्वरूपं प्रकाशाद् विशेषश्च"—"पुनः पुनः अनुसन्धानात्मक
ज्ञानविशेष के सामर्थ्य से' इसी विशेषण से सूचित होता है कि साधारणीकरण के लिए
व्यञ्जना या भावकत्व-भोजकत्वव्यापार आदि मानना अनावश्यक हो जाता है और यही
ग्रन्थकार जगन्नाथ के मत से रस का स्वरूप है तथा काव्यप्रकाश से विलक्षण है।
अतः विद्वानों का मत है कि अपनी प्रतिभा से पण्डितराज ने ही सभी मतों की
उद्भावना की है। इनमें कतिपय तो रससूत्र के विरुद्ध होने से और शेष कल्पनामात्र
सिद्ध२ ( अव्यावहारिक ) होने से साहित्यशास्त्रीय विद्वानों को ग्राह्य नहीं हैं। केवल
दार्शनिक दृष्टि से चिन्तित 'नव्यास्तु' मत किसी साहित्यिक के लिए उपयुक्त नहीं हो
सकता। अतः समालोचक इन मतों की उपेक्षा करते आये हैं और स्वयं ग्रन्थकार ने भी
नवीन प्रकार प्रदर्शित करने के कौतूहल से ही इन्हें ग्रन्थ में निविष्ट किया है, सिद्धान्त
नहीं माना है।
रस-विषयक सिद्धान्त मत—
सहृदय के हृदय में वासणारूपेण सदा से स्थित ( नित्य ) रत्यादि स्थायीभाव
ही बाह्य विभावानुभावव्यभिचारिभावों के व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव सम्बन्ध से साधारणरूप
में अनुभूयमान होते हुए अलौकिक आस्वादपदवी को प्राप्त कर रस कहलाता है—यह
परमाचार्य अभिनवगुप्त के मत का सारांश है। पण्डितराज का प्रथम सिद्धान्त इसी की
व्याख्या है। वे व्याख्या द्वारा निम्नांकित कथ्य को व्यक्त करते हैं—
(१) जब विभावादि अनुकूल वर्णों से युक्त चमत्कृत काव्य में निविष्ट रहता है।
(२) यह काव्य सहृदय के हृदय में प्रविष्ट कर गया होता है।
(३) सहृदय बार-बार अनुसन्धान करते हुए विभावादिकों को साधारणीकृत
कर लेते हैं।
१. रसगङ्गाधरीय-रसस्वरूपनिरूपणव्याख्या—'रसिकमनोरञ्जिनी' ग्रन्थ के
परिशिष्ट में—नाग प्रकाशक, दिल्ली—१९९५ ई० ।
२. मैथिलीकाव्यविवेक, पृ० ६४।

( १५ )
(४) साधारणीकृत विभावादि मिलकर अलौकिक व्यापार ( भावना ) से
आनन्द, जो सहृदय के हृदय में आवरण से ढँका रहता है, उसके उस
आवरण ( पर्दा ) को हटा देते हैं ।
(५) इस अज्ञाननाश से रसानुभूति करने वाला ( प्रमाता ) अपने अन्तःकरण
के परिमितत्व प्रभाव एवं अपने प्रमातृत्व धर्म को त्याग कर साक्षीरूप से
व्यापक हो जाता है, स्वयंप्रकाश हो जाता है और अपने वास्तविक
आनन्दस्वरूप का साक्षात्कार करता है और यही तो रससाक्षात्कार है ।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि पण्डितराज की व्याख्या अभिनवगुप्त का
समर्थन साहित्यिक दृष्टि से करती है। अन्तर केवल दार्शनिक विचार में है। दोनों
आचार्य रस को स्वयंप्रकाश एवं नित्य मानते हैं। फर्क तो इतना ही है कि अभिनव-
गुप्त के मत में चैतन्य विशेषण और स्थायिभाव विशेष्य है, पर पण्डितराज के मत में
स्थायिभाव ही विशेषण और चैतन्य विशेष्य है । अभिनव ने शैवागम दर्शन के अनुसार
प्रकृति के अंश रत्यादि स्थायीभाव में भी चैतन्यप्रतिभास के कारण आनन्द की
स्थिति मानी है। पर पण्डितराज शाङ्करवेदान्त के अनुसार केवल चैतन्य को ही
आनन्दमय मानकर रससिद्धान्त व्यवस्थापित करते हैं और अभिनव के मत में वेदान्ता-
नुसार संशोधन कर देते हैं ।
आगे इसकी विवेचना करते हुए पण्डितराज इसे स्पष्ट ही कर देते हैं। अभि-
नव के मत में व्यंजनाजन्य ज्ञानविषय रत्यादि ही रस है, पर पण्डितराज के मत में—
“रसो वै सः” इत्यादि श्रुति से आत्मा और रस में तादात्म्य ( अभेद ) सिद्ध रहने
के कारण तथा वेदान्तसिद्धान्तानुसार आत्मा के नित्यज्ञानरूप और अन्य के संस्कार
रूप रहने के कारण आत्मा और रस में अभेद उपपन्न नहीं हो सकता है। अतः ज्ञान-
विषयीभूत रत्यादि को रस न मानकर¹ रत्यादिविषयक ज्ञान को ही रस मानना
समुचित है ।
यहाँ ज्ञातव्य है कि रसस्वरूप का सर्वप्रथम विवेचन अग्निपुराण² में हुआ है
१. “भग्नावरणचिद्विशिष्टो रत्यादिः स्थायीभावो रस इति स्थितम्, वस्तुतस्तु
वक्ष्यमाणश्रुतिस्वारस्येन रत्याद्यवच्छिन्ना चिदेव रसः” । ( रसगङ्गाधरः—
रसस्वरूपनिरूपणे )
२. आग्नेयपुराणे—
अक्षरं ब्रह्म परमं सनातनमजं विभुम् ।
वेदान्तेषु वदन्त्येकं चैतन्यं ज्योतिरीश्वरम् ॥
आनन्दः सहजस्तस्य व्यज्यते स कदाचन ।
व्यक्तिः सा तस्य चैतन्यचमत्काररसाश्रया ॥

( १६ )
और वेदान्त दर्शन के अनुसार ही हुआ है, भले ही उसके प्रतिपादन का ढंग भिन्न हो,
पर यह रसस्वरूप वहाँ से चलकर नानारूप में वर्णित-विवेचित होता हुआ अन्त में
पण्डितराज के द्वारा पुनः अपने यथोचित पूर्वस्थान पर आ गया ।
(५) गुणादिनिरूपण—पूर्वविवेचित विषयों के अतिरिक्त रसगङ्गाधर के इस
प्रथम आनन में गुणनिरूपण, भावध्वनिनिरूपण, रसाभासादि और अलक्ष्यक्रमध्वनि के
सम्बन्ध में विशेष विचार—ये विषय सूक्ष्म विवेचन के साथ निरूपित हुए हैं और इस
प्रकार प्रथम आनन असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य काव्य के तथा तत्सम्बद्ध विषयों के निरूपण में
समाप्त हो जाता है । इनका विवेचन पाठक ग्रन्थ में ही देखेंगे । यहाँ इन्हीं शब्दों के
साथ विरत होता हूं ।
पण्डितराज जगन्नाथ
आचार्य जगन्नाथ नैसर्गिक कवित्वसम्पन्न काव्यशास्त्रीय आचार्य थे । आन्ध्रप्रदेश
इनकी जन्मभूमि थी । ये तैलङ्ग ब्राह्मण थे१ । इनके पिता पेरुभट्ट२ महान् विद्वान् थे,
जिन्होंने ज्ञानेन्द्रभिक्षु से वेदान्त, माहेन्द्र पण्डित से न्याय-वैशेषिक, खण्डदेव उपाध्याय से
मीमांसा और शेष वीरेश्वर से व्याकरण का अध्ययन किया था और सर्वविद्याधर थे३ ।
जगन्नाथ ने अपने पिता से अध्ययन किया था और उनके गुरुशेष वीरेश्वर से भी
पढ़ा था४ । ये व्याकरण, दर्शन और साहित्यशास्त्र के उच्च कोटि के विद्वान् थे । ये
प्रतिभाशाली, प्रत्युत्पन्नमति, समयपरीक्षक ( युगद्रष्टा ) और प्रभावशाली पण्डित थे ।
तरुण होते५ ही ये विद्वान् हो गये और विद्वान् होते ही दिल्लीश्वर शाहजहाँ
( १६२८-१६६६ ई० ) के कृपापात्र होकर पण्डितराज की पदवी प्राप्त कर ली—
"मूर्त्तिमतेव नवाबासफखानमनःप्रसादेन द्विजकुलसेवा-हेवाकि-वाङ्मनःकायेन
माथुरकुलसमुद्रेन्दुना६ रायमुकुन्देनादिष्टेन श्रीसार्वभौमसाहिजहान-प्रसादाधिगत-
'पण्डितराय'-पदवीविराजितेन तैलङ्गकुलावतंसेन पण्डितजगन्नाथेन आसफ-
विलासाख्येयमाख्यायिका निरमीयत" । ( 'आसफविलास' के आरम्भ में )
१. आसफविलास—जगन्नाथकृत के आरम्भ में—"तैलङ्गकुलावतंसेन पण्डित-
जगन्नाथेन" ।
२. इनका नाम पेरम भट्ट भी था; द्रष्टव्य—प्राणाभरण एवं रसगङ्गाधर के
आदि में—"श्रीमत्पेरमभट्टसूरितनयः" । ( प्राणाभरण )
३. रसगङ्गाधर का आदि भाग ।
४. अस्मद्गुरु-पण्डितवीरेश्वराणाम्—ममोरमाकुचमर्दन के प्रारम्भ में ।
५. भामिनीविलास में—"दिल्लीवल्लभपाणिपल्लवतले नीतं नवीनं वयः" ।
६. मुकुन्दराय माथुर नामक कायस्थ के द्वारा दरबार में इनका प्रवेश हुआ
था, जो वहाँ के दीवान थे ।

( १७ )
वहाँ कुछ दिन शाहजहाँ तथा उसके पुत्र दाराशिकोह के आश्रय में अपना
नवीनवयः' ( युवावस्था का पूर्वार्ध, ३० वर्ष तक ) सुखपूर्वक बिताया था—
“दिल्लीवल्लभ-पाणिपल्लवतले नीतं नवीनं वयः” ( भामिनीविलास ) । जगदाभरण
में जगन्नाथ ने दाराशिकोह का वर्णन किया है। इस हिसाब से जान पड़ता है कि
१६४० ई० के बाद ये दिल्ली से निकल पड़े, उस समय यदि इनकी आयु ३० वर्ष
मानें तो इनका जन्मसमय १६१० ई० अनुमानित होता है।
ये अप्पयदीक्षित और भट्टोजिदीक्षित के उत्तरसम-सामयिक विरोधी थे तथा
इनके ग्रन्थों पर स्वतन्त्र रूप से खण्डन-ग्रन्थ लिखे थे। अप्पयदीक्षित के भ्रातृपौत्र
एवं शिष्य नीलकण्ठ दीक्षित ने 'कलिगताब्द ४७३८= ( १६३८ ई० ) में नीलकण्ठ-
विजय काव्य की रचना की थी, जिस समय दीक्षितजी परम वृद्ध रहे होंगे। सिद्धान्त-
कौमुदीकार भट्टोजिदीक्षित के गुरु शेषकृष्ण के पुत्र शेषवीरेश्वर पण्डितराज के एवं
उनके पिता पेरुभट्ट के गुरु थे।
बादशाह शाहजहाँ के साथ पण्डितराज ने काश्मीर की यात्रा की थी और वहाँ
के नवाब आसफखान द्वारा बादशाह के सत्कारादि का वर्णन इन्होंने 'आसफविलास' में
किया है।
विद्वान् होते ही जगन्नाथ राजाश्रय को प्राप्त करने बीकानेर गये । वहाँ के
राजा जगत्सिंह की प्रशंसा में इन्होंने जगदाभरण काव्य ( ५३ पद्यमात्र ) की रचना
की। इन्हीं जगत्सिंह के पिता कर्णसिंह के आदेश से मैथिल गङ्गानन्द कवीन्द्र ने
कर्णभूषण ( रसनिरूपण ) ग्रन्थ की रचना की थी।
किंवदन्ती है कि वहाँ से ये जयपुरनरेश जयसिंह की सभा में पधारे। वहाँ
मुल्लाओं के दो आक्षेपों के निराकरण हेतु पण्डितसभा हुई थी, पर समाधान नहीं
हो रहा था। पण्डितराज ने समाधान का वचन दिया और कहा कि 'एक आक्षेप का
उत्तर मैं तुरंत दे सकता हूँ और दूसरे का उत्तर अरबी-फारसी पढ़कर दूंगा' ।
वहाँ इन्हें फारसी पढ़ाने की व्यवस्था की गयी और कुछ ही दिनों में ये उस भाषा के
पारङ्गत हो गये। उक्त आक्षेपों का उत्तर देने हेतु इन्हें दिल्ली बादशाह के दरबार
में भेजा गया। इनके समाधान से सभी प्रसन्न हो गये—
आक्षेप—( १ ) राजा जयसिंह आदि वास्तविक क्षत्रिय नहीं हैं, क्योंकि
परशुराम ने जब २१ बार पृथिवी को निःक्षत्रिय कर दिया तो क्षत्रिय आये कहाँ से ?
१. अष्टात्रिंशदुपस्कृतसप्तशताधिकचतुःसहस्रेषु ।
कलिवर्षेषु गतेषु प्रथितः किल नीलकण्ठविजयोऽयम् ॥

( १८ )

समाधान — परशुराम ने जब पहली बार पृथ्वी को निःक्षत्रिय कर दिया,
तो दूसरी बार के लिए क्षत्रिय कहाँ से आये ? यह २१ बार कहना ही प्रमाणित
करता है कि संहार के बाद भी बहुत क्षत्रिय बचे रहे, जो इन राजाओं के पूर्वज थे ।
आक्षेप ( २ ) अरबी भाषा संस्कृत से प्राचीन है ।
समाधान — मुसलमानों के 'हदास' (धर्मग्रन्थ) में लिखा है कि—'मुसलमान
हिन्दुओं से विपरीत आचरण करें, यही उनका धर्म है' । इस वाक्य से सिद्ध है कि
हिन्दू धर्म मुसलमानों के धर्म से प्राचीन है और यह भी स्वतः सिद्ध है कि उन हिन्दुओं
की भाषा भी अरबी से प्राचीन है ।
दिल्ली दरबार में रहकर पण्डितराज ने एक परम रमणीय यवनी से प्रेम
किया और बादशाह की कृपा १ से वह इन्हें प्राप्त हो गयी । यह समाचार देशभर में
फैल गया और इन्हें पण्डितों ने जातिच्युत घोषित कर दिया । इन पण्डितों में अप्पय-
दीक्षित और भट्टोजिदीक्षित प्रमुख थे । अतः इनसे पण्डितराज का वैरभाव हो गया ।
कुछ दिन बाद वह यवनी, जिसका नाम 'लवङ्गी' था, असमय में ही दिवङ्गता हो
हो गयी और पण्डितराज ने विरक्तभाव से दिल्ली को छोड़ दिया । ये यवनीसम्पर्क से
अपने को स्वयं पापी समझने लगे—
सुरधुनिमुनिकन्ये ! तारयेः पुण्यवन्तं
स तरति निजपुण्यैस्तत्र किं ते महत्त्वम् ।
यदि हि यवनकन्या-पापिनं मां पुनीहि
तदिह तव महत्त्वं, तन्महत्त्वं महत्त्वम् ॥ ( गङ्गालहरी )
कुछ समय पण्डितराज ने नेपाल के समीप कूचविहार ( कामरूप ) के राजा
प्राणनारायण ( १६३३-६६ ई० ) के आश्रय में भी रहे, जहाँ 'प्राणाभरण' की रचना
की । यह ग्रन्थ वही है जिसे पूर्व में 'जगदाभरण' कहा गया है, फर्क इतना ही है कि
यहाँ जगत्सिंह के स्थान में 'प्राणनारायण' रख दिया गया है। इस राजा का वंश इस
प्रकार है—विश्वसिंह—मल्लदेव ( नरनारायण )—लक्ष्मीनारायण—वीरनारायण—
प्राणनारायण । इनमें मल्लदेव के आश्रित काव्यकौमुदीकार देवनाथ ठक्कुर ( काव्य-
प्रदीपकार गोविन्द ठक्कुर के पुत्र ) थे ।
वहाँ से लौटकर ये काशी में रहने लगे । अन्य राजाओं का आश्रय इन्हें तुच्छ
दीखने लगा । ये लिखते हैं—
१. न याचे गजालिं न वा वाजिराजं न वित्तेषु चित्तं मदीयं कदापि ।
इयं सुस्तनी मस्तकन्यस्तहस्ता, 'लवङ्गी'कुरङ्गीदृगङ्गीकरोतु ॥

( १९ )
दिल्लिश्वरो वा जगदीश्वरो वा मनोरथान् पूरयितुं समर्थः ।
अन्यैर्नृपालैः परिदीयमानं शाकाय वा स्याल्लवणाय वा स्यात् ॥
रसगङ्गाधर के मंगलाचरण आदि से ज्ञात होता है कि पण्डितराज वैष्णव थे,
हालांकि अन्य देवताओं की स्तुति भी इनकी प्राप्त हैं। इनका जीवन यद्यपि उल्लासमय
रहा, पर इन पर बड़े-बड़े अनर्थपात हुए—युवावस्था में ही पाणिगृहीती¹ ( स्वजातीया
पत्नी ) और पाणिगृहीता ( यवनी प्रेयसी ) का देहान्त हो गया । युवक पुत्र स्वर्ग-
वासी हो गया² । यवनीसम्पर्क-दोष से पण्डितों द्वारा अपमानित हुए और अन्त में
विरक्त होकर गङ्गा के शरण में गङ्गालहरी की रचना करते हुए गङ्गालाभ कर लिया ।
ये ब्रह्मतेज से युक्त थे । किंवदन्ती है कि जब यवनी इनके शयनकक्ष में आयी
तो उसे हुआ कि मैं जल जाऊँगी और वह लौट गयी । बादशाह के दरबार में पण्डित-
राज के इस ब्रह्मतेज को कम करने का प्रश्न उठ गया । किसी पण्डित के कहने से
इन्हें हुक्के के पानी से नहलाया गया और तब यवनी इनके पास जा सकी ।
पण्डितराज बहुत गर्विले स्वभाव के थे और यह गर्व उनका यथार्थ था, परन्तु
विद्वत्समाज इन्हें शास्त्रोद्धत कहता है। वे न केवल "अलङ्कारान् सर्वान् अपि मलित-
गर्वान् रचयतु" जैसी उक्ति रखते हैं, अपितु अपनी कविता की स्वयं ही अत्यधिक
प्रशंसा करते हैं—
धुर्यैरपि माधुर्यैर्द्राक्षा-क्षीरेक्षु-माक्षिक-सुधानाम् ।
वन्द्यैव माधुरीयं पण्डितराजस्य कवितायाः ॥ ३१ ॥
ये न केवल अप्पयदीक्षित या भट्टोजिदीक्षित का खण्डन दर्पपूर्ण वाणी से करते
हैं, वरन् आनन्दवर्धन, मम्मट आदि की तीखी आलोचना में भी ये पीछे नहीं रहे। परन्तु
अन्तिम अवस्था में इन्हें अपने कृत्यों पर पश्चात्ताप हुआ कि क्यों हमने विद्वानों का
अनादर किया ? क्यों यवनीसम्पर्क किया ? और इस विरक्ति के साथ संसार से ऊब
कर भगवती भागीरथी गङ्गा के शरण में पहुँचे । पर उस समय में भी अपनी प्रकृति
( स्वभाव ) ने इन्हें नहीं छोड़ा और ये गर्व से गङ्गा नदी की सबसे ऊपरी सीढ़ी पर
१. द्रष्टव्य—पण्डितराज का करुणविलास—
धृत्वा पदस्खलनभीतिवशात् करं मे
या रूढवत्यसि शिलाशकलं विवाहे ।
सा मां विहाय कथमद्य विलासिनी ! द्याम्
आरोहसीति हृदयं शतधा प्रयाति ॥
२. रसगङ्गाधर—प्रत्यनीक अलङ्कार के उदाहरण में पुत्रशोक का वर्णन ।

१. काव्य-लक्षण (रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्) एवं काव्य-हेतु प्रतिभा विचार

( २० )
बैठ गये और बोले— 'माता गङ्गा के लिए मैं इतनी दूर से आया हूँ तो यह माता पुत्र
के लिए थोड़ी दूर भी ऊपर नहीं होंगी ?' पण्डितराज गङ्गालहरी के एक-एक पद्य
रचते सुनाते थे और गङ्गा एक-एक सीढ़ी ऊपर आ रही थी और अन्तिम पद्य समाप्त
होते ही एक ऐसा तरङ्ग आया जो पण्डितराज को समेटे हुए प्रवाह में विलीन कर
लिया, माता ने पुत्र को गोद में ले लिया ।
पण्डितराज जगन्नाथ की रचनाएँ
१. शृङ्गारविलास — १८० पद्य ।
२. आसफविलास — गद्याख्यान, शाहजहाँ की कश्मीरयात्रा एवं वहाँ के नवाब
आसफखान से मुलाकात ।
३. करुणविलास ( पत्नीवियोग में विलाप ) — १९ पद्य ।
४. प्रास्ताविक विलास — १२२ पद्य ।
५. शान्तिविलास — निर्वेद पद्य-४४ ।
६. जगदाभरण'— ५३ पद्य—बीकानेर के राजा जगत्सिंह की प्रशंसा ।
७. प्राणाभरण — ५३ पद्य—कामरूप (कूचबिहार) के राजा प्राणनारायण की प्रशंसा ।'
यह 'जगदाभरण' में ही नामपरिवर्तन करके प्रस्तुत किया गया है ।
८. यमुनावर्णन — गद्य, अनुपलब्ध, रसगङ्गाधर के मध्यम काव्य के उदाहरण में
इसकी पंक्ति उद्धृत है ।
९. लहरी-पञ्चक—
( १ ) गङ्गालहरी — ५३ पद्य, इसे ही पीयूषलहरी भी कहते हैं— “इमां पीयूष-
लहरीं जगन्नाथेन निर्मिताम्” !
( २ ) यमुनालहरी — १९ पद्य, इसे ही अमृतलहरी कहते हैं ।
( ३ ) करुणालहरी — ५५ पद्य, कृष्ण की स्तुति ।
( ४ ) लक्ष्मीलहरी — ४१ पद्य ।
( ५ ) सुधालहरी — ३० पद्य, सूर्यस्तुति ।
१०. भामिनीविलास — ५८८ पद्य ।
११. चित्रमीमांसाखण्डन — अप्पयदीक्षितकृत चित्रमीमांसा अलंकारशास्त्रीय ग्रन्थ का
खण्डन ।
१२. मनोरमाकुचमर्दन — भट्टोजिदीक्षितकृत प्रौढमनोरमा ( व्याकरणशास्त्रीय व्याख्या-
ग्रन्थ ) का खण्डन ।

( २१ )
१३. रसगङ्गाधर—अलङ्कारशास्त्रीय महान् ग्रन्थ ।
१. पण्डितराज-ग्रन्थावली में इनके सभी ग्रन्थों का आकर्षक प्रकाशन संस्कृत
परिषत्, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद से हुआ है ।
अन्य जगन्नाथ
संस्कृत वाङ्मय में जगन्नाथ नाम के अनेक ग्रन्थकार हो चुके हैं । उनके ग्रन्थ
हैं—सिद्धान्तसम्राट् ( ज्योतिष )—सम्राट् जगन्नाथकृत, सिद्धान्तकौस्तुभ, रेखागणित,
विवादार्णवभङ्ग, रतिमन्मथनाटक, अतन्द्रचन्द्रिकनाटक—मैथिल जगन्नाथकृत, अनङ्ग-
विजयभाण, सभातरङ्ग, अद्वैतामृत, शरभगजविलास, ज्ञानविलास, समुदायप्रकरण
आदि । परन्तु इनमें कोई भी पण्डितराज उपाधि वाले नहीं थे । मिथिला में रघुनन्दन
उपाध्याय पण्डितराज थे, जिन्होंने वादशाह अकबर से तिरहुत राज्य प्राप्त कर अपने
गुरु म० म० महेश ठक्कुर को दे दिया था तथा काव्यप्रकाश की टीका लिखी थी, जो
दरभङ्गा में हस्तलिखित रूप में है ।
रसगङ्गाधर की व्याख्या-सम्पत्ति
रसगङ्गाधर पर निम्नांकित व्याख्याएँ उपलब्ध हैं—
( १ ) गुरुमर्मप्रकाश—म० म० नागेशभट्ट (१७५० ई०) कृत । यह रसगङ्गाधर
पर सर्वप्राचीन टिप्पणी उपलब्ध है, जो इसके खण्डन के उद्देश्य से ही लिखी गयी थी ।
नागेशभट्ट प्रख्यात वैयाकरण थे । ये भट्टोजिदीक्षित के पौत्र हरिदीक्षित के शिष्य होने
के कारण पण्डितराज के विरोधी हुए, क्योंकि भट्टोजि से पण्डितराज का वैरभाव
प्रसिद्ध ही है । नागेश ने अपनी गुरुपरम्परा के समर्थन में ही पण्डितराज का खण्डन
किया है । बहुत स्थलों पर ग्रन्थ के आशय को भी स्फुटित किया है । इसका प्रकाशन
१९३९ ई० में भट्ट मथुरानाथ शास्त्री की सरला टीका के साथ जयपुर से हुआ उत्तरा-
लंकार पर्यन्त और आज तक इतना ही मूल ग्रन्थ भी मिलता है । नागेश की टीका भी
यहीं तक है ।
( २ ) म० म० गङ्गाधर शास्त्री की क्वचित्-क्वचित् टिप्पणी सहित रसगंगाधर
काशी से प्रकाशित हुआ था । इससे पहले यह ग्रन्थ काव्यमाला में मुद्रित हो चुका
था । तृतीय बार रसगङ्गाधर का प्रकाशन भट्ट मथुरानाथ शास्त्री द्वारा जयपुर से हुआ ।
( ३ ) सरला—भट्ट मथुरानाथ शास्त्री की ग्रन्थलापिनी एवं गूढार्थबोधिनी
संक्षिप्त व्याख्या है। यह गुरुमर्मप्रकाश के साथ १९३९ ई० में प्रकाशित हुई और १९४५
तक इसके छः संस्करण निकल गये, इसी से इसकी उपादेयता सिद्ध है ।
( ४ ) हिन्दी अनुवाद—पं० श्रीपुरुषोत्तमशर्मा चतुर्वेदी, नागरी प्रचारिणी
सभा, काशी ।

( २२ )
( ५ ) 'चन्द्रिका'—कविशेखर बदरीनाथ झा—प्रथमानन भाग, शेष भाग पर
पं० मदनमोहन झा—रसगङ्गाधर की आज तक सर्वोत्कृष्ट व्याख्या यही है । ग्रन्थ को
स्पष्ट करते हुए उसका सारभाग पाठकों के समक्ष रख देना, छात्रों एवं विद्वानों के
उपयुक्त सन्तुलित विचार उपस्थित करना एवं साहित्यिक दृष्टि से ग्रन्थ को देखना
इत्यादि कतिपय विशेषताएँ इसे लोकप्रिय बनाती हैं । चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी
से १९५५ ई० में प्रकाशित ।
( ६ ) 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या—पं० मदनमोहन झा—यह व्याख्या उपर्युक्त
'चन्द्रिका' संस्कृत व्याख्या के साथ प्रकाशित है । यह सूक्ष्म विवेचना के क्रम में बहुत
स्थलों पर विस्तृत हो गयी है ।
( ७ ) मधुसूदनीप्रकाश संस्कृत-हिन्दी व्याख्या—आचार्य मधुसूदन मिश्र—काशी
हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ।
( ८ ) रसचन्द्रिका—पं० श्रीकेदारनाथ ओझा—यह व्याख्या सम्पूर्णानन्द
संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से १९७७ ई० में प्रकाशित हुई । इसमें ग्रन्थ का
अवतरण, शब्दार्थस्फोरण एवं दार्शनिक दृष्टि से विषय का निरूपण किया गया है ।
कुछ स्थलों में यह शास्त्रान्तर विचार में अतिविशद हो गयी है, जब कि बहुत स्थलों
पर टिप्पणी बन के रह गई है । इसकी भूमिका केवल टीकाकारों की भर्त्सना में
कृतश्रमा है, जैसा वर्णन विद्वान् के लिए अशोभनीय है । काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ की
व्याख्या में एक भी तच्छास्त्रीय त्रुटि नहीं दिखाई गई है, केवल न्यायशास्त्रीय त्रुटि और
वह त्रुटि भी कहाँ तक समीचीन है इसका निर्णय तो परवर्ती आलोचकों, व्याख्याकारों
के विचार में देखे जा सकते हैं । पर उनकी इस भूमिका से स्पष्ट हो जाता है कि
'चन्द्रिका' व्याख्या की दोषगवेषणा को ही यह श्रेय है कि 'रसचन्द्रिका' व्याख्या का
उसने ही निर्माण करा लिया । माननीय व्याख्याकार के सम्बन्ध में विशेष वक्तव्य
नहीं है—साहित्यशास्त्रीय विषय-विवेचन में भी बहुत स्थलों पर शास्त्रवैपरीत्य इनकी
व्याख्या में है जिनकी गणना हम यहाँ नहीं करना चाहते । पाठक इस रसतरङ्गिणी
व्याख्या में उन्हें ढूँढ़ सकते हैं । चन्द्रिका के बाद रचित होने पर भी 'रसचन्द्रिका'
उसका स्थान नहीं ले सकी, न ही लोकप्रिय हो सकी—यह भी ज्ञातव्य है ।
( ९ ) रसतरङ्गिणी—डॉ० श्रीनारायण मिश्र एवं डॉ० शशिनाथ झा—यह
प्रस्तुत संस्करण संस्कृत-हिन्दी व्याख्यात्मक है । यह छात्रोपयोगी के साथ-साथ गम्भीर
विचारों का प्रतिपादक, जटिल स्थलों का परिचायक, पूर्वव्याख्याताओं द्वारा विषय को
प्रकृत शास्त्र से शास्त्रान्तर की ओर बहकाव का नियन्त्रक और कुव्याख्यान का विखण्डक
के रूप में प्रस्तुत हो रहा है ।