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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 414 में से

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( १३ )
इनमें जिस लक्षण में विभावादि तीनों नहीं ( केवल एक ही ) हैं, वह भरत के
रससूत्र से विरुद्ध होने से परम्परा-विरुद्ध है । वे हैं केवल विभाव, केवल अनुभाव और
केवल व्यभिचारिभाव को रस मानने वाले लक्षण । परन्तु इनमें भी अन्य का आक्षेप-
लभ्य रहना तो निश्चित ही है । अतः आक्षेपलभ्य के द्वारा ही रससूत्र का संगमन
कर लेते हैं ।
आचार्य मदनमोहन झा ने विकासवादी क्रम से इन वादों को कालक्रम
( प्राचीनतानुसार ) इस प्रकार वर्णित किया है—( १ ) विभाव ही रस है, ( २ )
अनुभाव, ( ३ ) व्यभिचारिभाव, ( ४ ) तीनों के रहने पर जिसमें चमत्कार हो वही
रस है, ( ५ ) तीनों ही रस हैं, ( ६ ) रससूत्र के अनुसार उत्पत्तिवाद, ( ७ )
अनुमितिवाद, ( ८ ) भुक्तिवाद, ( ९ ) अभिव्यक्तिवाद, ( १० ) नव्यमत ( अनिर्वच-
नीयता ) और ( ११ ) भ्रमवाद ।
परन्तु यह मत उपयुक्त तब होता, यदि किसी प्राचीन ग्रन्थ में इनका उल्लेख
होता । भरत से पहले पाँच मत थे, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । इसका उल्लेख सर्वप्रथम
जगन्नाथ ने ही किया है । अतः ये मत या तो उनके स्वयं उद्भावित हैं या उनके समय
में चल पड़े थे ।
पण्डितराज ने जो इन मतों का क्रम रखा है, उसमें सर्वप्रथम अपना मत, जो
मान्य आचार्य अभिनवगुप्त का है, को रखा है; उसके बाद अन्य मतों का प्रतिपादन भर
उन्हें अभिप्रेत है, खण्डन नहीं, क्योंकि सिद्धान्त से पृथक् अन्य मत स्वतः उपेक्षणीय हो
जाते हैं । जो कोई “नव्यास्तु”¹ से कथित मत को इनका अपना मत कहते हैं, उन्हें
समझना चाहिए कि सिद्धान्त आदि या अन्त में ही रखा जाता है । आदि में सिद्धान्त
देकर उस पर आचार्य अभिनवगुप्त की सम्मति दिखाने से ही उसे निर्णय की पदवी
मिल जाती है ।
यह भी ज्ञातव्य है कि रसनिरूपण के प्रथम पक्ष में ही पण्डितराज ने जो
“भावना-विशेषमहिम्ना” विशेषण दिया है, वह किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में न होने

१. शकुन्तलाविषयिणी रति का सम्बन्ध सहृदय से न रहने के कारण उन्हें
आस्वाद कैसे हो, इस हेतु 'साधारणीकरण' व्यापार मानकर सहृदय के
हृदय में उस रति को प्रविष्ट कराते हैं । पण्डितराज का कथन है कि ये
सब काव्यार्थभावना की ही महिमा से होते हैं, तो फिर हम केवल उसी
'भावना' से शकुन्तलारति को साक्षात् ही सामाजिक में आरोपित कर
क्यों न काम चला लें ? इस हेतु साधारणीकरण व्यापार क्यों मानें ? यही
इनके मत का बीज है ।
२ भू०