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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 414 में से

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( ७ )
सर्वोपरि माना जाता है । यह ग्रन्थ प्रत्येक विषय पर अपनी नवीन मान्यता, नया
मतस्थापन देता चलता है—काव्यलक्षण से लेकर अलंकारनिरूपण तक आद्यन्त यही
क्रम है और इनकी यह मान्यता आज भी आलोचकों के लिए महत्त्वपूर्ण बनी हुई है ।
विषय-विवेचन—
( १ ) काव्य-प्रयोजन—काव्य में प्रवृत्त होने के लिए उसके प्रयोजनों को
जान लेना आवश्यक है । सर्वप्रथम इसमें प्रवृत्त होने वाला कवि होता है, जो इसकी
रचना करता है । उसके बाद सहृदय उसे सुनते या पढ़ते हैं । इन दोनों को इसका
प्रयोजन ज्ञात रहना आवश्यक है । इसीलिए रसगङ्गाधर में कहा गया है—"कवि-
सहृदययोरावश्यकतया"१। कवि के आशय को सभी नहीं समझ सकते हैं, उसे केवल
सहृदय ही समझते हैं । 'कवेः समानं हृदयं येषां ते सहृदयाः'—कवि के समान हृदयवाला
सहृदय२ होता है, जो उसके हृदय की बात को समझ जाता है । कविपरम्परागत
अनेक बातें ऐसी हैं जो प्रसिद्ध होने के कारण कही नहीं जाती हैं, संकेत से ही समझी
जा सकती हैं, पर उस प्रसिद्धि से परिचित ही उसे समझ सकता है, सहृदय कहला
सकता है । अतः काव्य पढ़ने से पहले सहृदय बनना, कवि के अन्तर में छिपे भावों
को पकड़ने की कला का ज्ञान रखना आवश्यक है । इन दोनों के लिए यहाँ पाँच
प्रयोजन कहे गये हैं और इत्यादि कहकर प्राचीनोक्त अन्य प्रयोजनों में भी अपनी सम्मति
दिखायी गयी है । उक्त पाँचों नाम हैं—( १ ) कीर्त्ति—यशःप्राप्ति, जो केवल कवि
के लिए है, ( २ ) परमाह्लाद—परमानन्द की प्राप्ति ( कवि और सहृदय दोनों के
लिए ), ( ३ ) गुरुप्रसाद—गुरु की प्रसन्नता से विद्या-व्यवहार का ज्ञान ( दोनों के
लिए ), ( ४ ) राजप्रसाद—इससे दोनों को धनागम, ( ५ ) देवताप्रसाद—इससे
दोनों का अमङ्गल-निवारण होता है ।
मम्मट ने काव्य के ६ प्रयोजन दिखाये हैं—
३काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये ।
सद्यःपरनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ॥
तदनुसार—( १ ) यशःप्राप्ति, ( २ ) अर्थप्राप्ति, ( ३ ) लोकव्यवहारज्ञान,
( ४ ) अमङ्गलनाश, ( ५ ) सद्यः परमानन्द की प्राप्ति, ( ६ ) कान्तासम्मित वाक्य
से उपदेशप्राप्ति । इनमें तृतीय और षष्ठ का समावेश पण्डितराज के इत्यादि पद से कर
लेना चाहिए ।
१. रसगङ्गाधर, पृ० ७ ।
२. अथवा—'प्रशस्तं हृदयं येषां ते सहृदयाः, प्राशस्त्यञ्च काव्यवासनापरि-
पक्वत्वम्, कविहृदयप्रवेशसामर्थ्यवत्त्वं वा' ।
३. काव्यप्रकाश के आरम्भ में ।